उत्तर प्रदेश प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों की अनदेखी और डीपीसी प्रक्रिया पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों की अनदेखी और डीपीसी प्रक्रिया पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश का प्राविधिक शिक्षा विभाग इन दिनों नियमों के निर्माण और उनमें फेरबदल को लेकर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। विभागीय गलियारों में ऐसी चर्चाएं हैं कि नियमों और शासनादेशों में मनमाने बदलाव किए जा रहे हैं। इन बदलावों के माध्यम से अपात्रों को भी रातों-रात पदोन्नति यानी डीपीसी की सीढ़ियां चढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। विभाग में इन दिनों एक अजीब सा भ्रम और नियमों की मनमानी का माहौल देखने को मिल रहा है। यहाँ नियम इस बात पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं करते हैं कि आधिकारिक गजट में क्या लिखा गया है। नियम केवल इस बात पर निर्भर कर रहे हैं कि सत्ता के करीब बैठा अधिकारी किस नियम में अपना निजी फायदा देख रहा है। हाल ही में सामने आए एक घटनाक्रम के अनुसार प्रधानाचार्य और विभागाध्यक्ष के पदों की डीपीसी के लिए राज्य सरकार की वर्ष 1990 की सेवा नियमावली को आधार बनाया गया है। जबकि तकनीकी रूप से विभाग में एआईसीटीई के नियम 3 मई 2018 से पूरी तरह लागू हो चुके हैं। इस मनमाने फैसले के कारण रास्ते खुले और अन्य कृपा पात्रों के हौसले भी काफी बुलंद हो गए।

वर्ष 2021 की नियमावली के स्थान पर बनाई गई नई खिचड़ी नीति

प्राविधिक शिक्षा सेवा नियमावली 2021 के अनुसार प्रधानाचार्य पद की डीपीसी के लिए अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष तय की गई है। इसके साथ ही 16 से 20 वर्षों का डिप्लोमा स्तर का शैक्षणिक अनुभव और श्रेणी दो का विभागाध्यक्ष होना अनिवार्य किया गया है। इसका मतलब साफ है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा सीधी भर्ती से चयनित अधिकारी ही इसके पात्र होंगे। अब सबसे बड़ा पेंच यह फंसा कि वर्तमान नियमावली की कठोर शर्तों के कारण कई चहेते और खास अधिकारी इस डीपीसी की रेस से बाहर हो रहे थे। वहीं दूसरी तरफ विभाग में पहले से उपलब्ध वैध श्रेणी दो के योग्य विभागाध्यक्षों को प्रस्तावित सूची में कोई जगह नहीं दी गई। जब वर्ष 2021 की नियमावली से पात्रता नहीं बनी तब एआईसीटीई 2019 के नियमों की शरण ली गई। लेकिन वहाँ 360 डिग्री स्कोर की शर्त ने अधिकारियों के पसीने छुड़ा दिए। साथ ही वहाँ डीपीसी के लिए राज्य सरकार के नियमों से इतर छानबीन समिति की व्यवस्था भी है। इस व्यवस्था से पार पाना ऐसे अपात्र अधिकारियों के लिए लगभग असंभव माना जा रहा है। जब 16 मार्च 2020 के शासनादेश से भी बात नहीं बनी तो अधिकारियों ने अपनी अद्भुत मेधा का परिचय दिया। उन्होंने तीनों नियमावलियों का मिश्रण करके एक स्व-निर्मित खिचड़ी नियमावली तैयार कर ली है। इसमें आयु सीमा और अनुभव एआईसीटीई 2019 से ले लिया गया ताकि उम्र की पाबंदी से छूट मिल सके। वहीं 360 डिग्री स्कोर के झंझट और छानबीन समिति को वर्ष 2021 की नियमावली से पूरी तरह गायब कर दिया गया। अधिकारियों की यह नीति साफ दर्शाती है कि नियम तुम्हारे हैं और सारी सुविधाएं हमारी हैं। यदि कोई भी शर्त उन्हें रोकती है तो वे नियम ही बदल देते हैं या नया नियम ईजाद कर लेते हैं।

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नियमों के गणित का ऐसा चमत्कार जो दुनिया में कहीं और संभव नहीं है

वर्ष 2020 के शासनादेश और वर्ष 2021 की नियमावली में रखी गई आयु सीमा और अनुभव के तालमेल को देखा जाए तो एक हास्यास्पद गणित सामने आता है। यह ऐसा गणित है जो शायद इस पूरे ब्रह्मांड में कहीं भी संभव नहीं हो सकता है। नियमावली के अनुसार विभागाध्यक्ष बनने के लिए पीएचडी के साथ 12 वर्षों का अनुभव आवश्यक है। इसके अलावा एमटेक के साथ 15 वर्षों का अनुभव आवश्यक बताया गया है। जबकि इसके लिए आयु सीमा मात्र 28 से 45 वर्ष के बीच रखी गई है। इसी प्रकार प्रधानाचार्य बनने के लिए पीएचडी के साथ 16 वर्षों का अनुभव और एमटेक के साथ 20 वर्षों का अनुभव आवश्यक है। जबकि इसके लिए आयु सीमा 35 से 50 वर्ष तय की गई है। अब जरा इस बेतुके गणित का विस्तार से विश्लेषण किया जाए तो पहला बड़ा चमत्कार पीएचडी धारकों के लिए दिखाई देता है। इस नियम के अनुसार विभागाध्यक्ष बनने के लिए अभ्यर्थी की आयु 28 से 45 वर्ष होनी चाहिए और उसका अनुभव 12 वर्ष होना चाहिए। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि अभ्यर्थी को मात्र 16 वर्ष की उम्र में अपनी पीएचडी पूरी करके सरकारी नौकरी में आना होगा। तभी वह 28 वर्ष की आयु पूरी होने पर 12 साल का अनुभव पूरा कर पाएगा। वहीं प्रधानाचार्य के लिए आयु सीमा 35 से 50 वर्ष और अनुभव 16 वर्ष तय किया गया है। यानी अभ्यर्थी को 19 वर्ष की उम्र में पीएचडी की डिग्री धारक बनकर सरकारी नौकरी में होना अनिवार्य है। दूसरा और इससे भी बड़ा चमत्कार एमटेक योग्यताधारियों के लिए रचा गया है। नियम यह कहता है कि एमटेक योग्यताधारी के लिए विभागाध्यक्ष बनने हेतु 15 वर्षों का अनुभव चाहिए और अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष है। यानी यदि कोई एमटेक अभ्यर्थी 45 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा के भीतर विभागाध्यक्ष बनना चाहता है तो उसे 12 से 29 वर्ष की आयु के बीच ही सरकारी सेवा में अध्यापक के रूप में नियुक्त हो जाना पड़ेगा। हद तो तब हो जाती है जब प्रधानाचार्य पद की बात सामने आती है। एमटेक के साथ प्रधानाचार्य बनने के लिए 20 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव अनिवार्य है और इसके लिए अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष रखी गई है। इस गणित के हिसाब से 50 वर्ष की आयु में 20 साल का अनुभव तभी पूरा हो सकता है। जब वह अभ्यर्थी मात्र 15 से 30 वर्ष की आयु में एमटेक की पढ़ाई पूरी करके सरकारी नौकरी में विभागाध्यक्ष पद पर कार्यरत हो चुका हो। सामान्यतः 15 से 19 साल की उम्र में लोग अपनी हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करते हैं। लेकिन प्राविधिक शिक्षा विभाग के इस नए गणितीय आविष्कार के अनुसार अभ्यर्थी को इसी उम्र में एमटेक या पीएचडी पूरी करके सरकारी अध्यापक भी बन जाना है। ऐसा अद्भुत और ज्ञानवर्धक टैलेंट हिंदुस्तान में मिलना असंभव है। इसके लिए तो किसी दूसरे ग्रह से ही अभ्यर्थियों को बुलाना पड़ेगा।

प्रशासन की चुप्पी और प्राविधिक शिक्षा के भविष्य पर गंभीर सवाल

विभागीय सूत्रों की मानें तो निदेशालय से लेकर शासन स्तर तक दबी जुबान में सभी यह स्वीकार करते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया नियम के विरुद्ध है। यदि सरकार या विभाग को पदोन्नति देनी ही थी तो वैधानिक तरीके से नियमों में संशोधन किया जा सकता था। लेकिन सत्ता के रसूख और प्रशासनिक हनक के आगे सभी नियम-कायदे सिर्फ कागजी खिलौना बनकर रह गए हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री जहाँ एक तरफ राज्य को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से पूरी तरह पारदर्शी बनाने की संकल्पना लेकर चल रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस तरह के फैसलों से पूरी व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान लगा रहे हैं। यदि ऐसे ही अपात्र लोगों के हाथों में विभाग की बागडोर सौंपी जाती रही तो यह बहुत चिंता का विषय है। इससे प्राविधिक शिक्षा के स्तर और इसमें पढ़ने वाले हजारों छात्रों के भविष्य का क्या होगा यह एक बहुत बड़ा और गंभीर प्रश्न बन गया है।

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