उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को पदोन्नति देने का मामला आया सामने

उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को पदोन्नति देने का मामला आया सामने

प्राविधिक शिक्षा विभाग के गलियारे में नियम बने खिलौना, बैकडोर से चहेतों का राज!

लखनऊ / 8 सितंबर2026 /अटल हिन्द न्यूज

योगी जी के प्रदेश का प्राविधिक शिक्षा विभाग इन दिनों पढ़ाई-लिखाई या किसी नई तकनीक के आविष्कार के लिए नहीं, बल्कि नियम निर्माण और मरोड़ की अनूठी प्रयोगशाला बनने के कारण चर्चा में है। विभागीय गलियारों में गूंजती चर्चाओं के अनुसार, यहाँ नियमों और शासनादेशों की ऐसी स्वादिष्ट खिचड़ी पकाई जा रही है, जिसे खाकर अपात्र भी रातों-रात पदोन्नति यानी डीपीसी की सीढ़ियां चढ़ने की जुगत में हैं।

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जब सत्ता की मलाई और नियमों की कतई चिंता नहीं
विभाग में इन दिनों एक अजीब सा भ्रम का माहौल है। यहाँ नियम इस बात पर निर्भर नहीं करते कि गजट में क्या लिखा है, बल्कि इस बात पर निर्भर करते हैं कि सत्ता के करीब बैठा अधिकारी किस नियम में अपना निजी फायदा देख रहा है।

हाल ही में हुए घटनाक्रम पर नज़र डालें तो प्रधानाचार्य एवं विभागाध्यक्ष पदों की डीपीसी के लिए राज्य सरकार की 1990 की सेवा नियमावली को आधार बना दिया गया, जबकि विभाग में एआईसीटीई के नियम 3 मई 2018 से लागू हो चुके हैं। इस मनमाफिक फैसले से जब रास्ते खुले, तो कतार में खड़े अन्य कृपा पात्रों के हौसले भी बुलंद हो गए।
2021 की नियमावली बनी गले की फांस, तो रच दी नई खिचड़ी नीति

प्राविधिक शिक्षा सेवा नियमावली 2021 के अनुसार प्रधानाचार्य पद की डीपीसी के लिए अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष, 16 से 20 वर्षों का डिप्लोमा स्तर का शैक्षणिक अनुभव, और श्रेणी 2 का विभागाध्यक्ष होना अनिवार्य है, यानी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा सीधी भर्ती से चयनित अधिकारी ही इसके पात्र होंगे।

अब पेंच यह फंसा कि वर्तमान नियमावली की कठोर शर्तों के कारण कई चहेते और खास अधिकारी डीपीसी की रेस से बाहर हो रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, विभाग में उपलब्ध वैध श्रेणी 2 के योग्य विभागाध्यक्षों को प्रस्तावित सूची में जगह ही नहीं मिली।

जब 2021 की नियमावली से पात्रता नहीं बनी, तो एआईसीटीई 2019 के नियमों की शरण ली गई। लेकिन वहाँ 360 डिग्री स्कोर की शर्त ने पसीना छुड़ा दिया और साथ ही वहाँ डीपीसी के लिए राज्य सरकार की नियमो से इतर छान बीन समिति की व्यवस्था है जिससे पार पाना ऐसे अपात्रों के लिए लगभग असंभव है। जब 16 मार्च 2020 के शासनादेश से भी बात नहीं बनी, तो अधिकारियों ने अपनी अद्भुत मेधा का परिचय देते हुए तीनों नियमावलियों का मिश्रण करके एक स्व-निर्मित खिचड़ी नियमावली तैयार कर ली। इसमें आयु सीमा और अनुभव एआईसीटीई 2019 से ले लिया गया ताकि उम्र की पाबंदी से छूट मिले, और 360 डिग्री स्कोर का झंझट और छान बीन समिति को 2021 की नियमावली से गायब कर दिया गया।

नियम तुम्हारे, सुविधा हमारी! अगर कोई शर्त हमें रोके, तो हम नियम ही बदल देंगे या नया नियम ही ईजाद कर लेंगे, आखिर जब शीर्ष का हाथ सर पर हो, तो दिन को रात और रात को दिन कहना ही तो नया प्रोफेशनल एथिक्स है।
गणित का ऐसा चमत्कार जो दुनिया में कहीं नहीं
2020 के शासनादेश और 2021 की नियमावली में रखी गई आयु सीमा और अनुभव के तालमेल को देखें, तो ऐसा हास्यास्पद गणित प्रस्तुत किया गया है जो शायद इस पूरे ब्रह्मांड में संभव नहीं है।

नियमावली के अनुसार विभागाध्यक्ष बनने के लिए पीएचडी के साथ 12 वर्षों का अनुभव और एमटेक के साथ 15 वर्षों का अनुभव आवश्यक है, जबकि इसके लिए आयु सीमा 28 से 45 वर्ष रखी गई है। इसी प्रकार प्रधानाचार्य बनने के लिए पीएचडी के साथ 16 वर्षों का अनुभव और एमटेक के साथ 20 वर्षों का अनुभव आवश्यक है, जबकि इसके लिए आयु सीमा 35 से 50 वर्ष तय की गई है।

अब जरा इस बेतुके गणित का विस्तार से विश्लेषण कीजिए:
पहला चमत्कार पीएचडी वालों के लिए है। इस नियम के अनुसार विभागाध्यक्ष बनने के लिए अभ्यर्थी की आयु 28 से 45 वर्ष होनी चाहिए और अनुभव 12 वर्ष। इसका मतलब है कि अभ्यर्थी को मात्र 16 वर्ष की उम्र में पीएचडी पूरी करके सरकारी नौकरी में आना होगा, तभी वह 28 वर्ष की आयु में 12 साल का अनुभव पूरा कर पाएगा। वहीं प्रधानाचार्य के लिए आयु सीमा 35 से 50 वर्ष और अनुभव 16 वर्ष है, यानी अभ्यर्थी को 19 वर्ष की उम्र में पीएचडी धारक होकर नौकरी में होना अनिवार्य है।

दूसरा और इससे भी बड़ा चमत्कार एमटेक वालों के लिए रचा गया है। नियम कहता है कि एमटेक योग्यताधारी के लिए विभागाध्यक्ष बनने हेतु 15 वर्षों का अनुभव चाहिए और अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष है। यानी यदि कोई एमटेक अभ्यर्थी 45 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा के भीतर विभागाध्यक्ष बनना चाहता है, तो उसे 12 से 29 वर्ष की आयु के बीच ही सरकारी सेवा में अध्यापक के रूप में नियुक्त हो जाना पड़ेगा।

हद तो तब हो जाती है जब प्रधानाचार्य पद की बात आती है। एमटेक के साथ प्रधानाचार्य बनने के लिए 20 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव अनिवार्य है और अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष रखी गई है। इस गणित के हिसाब से 50 वर्ष की आयु में 20 साल का अनुभव तभी पूरा होगा जब वह अभ्यर्थी मात्र 15 से 30 वर्ष की आयु में एमटेक करके सरकारी नौकरी में विभागाध्यक्ष पद पर कार्यरत हो चुका हो।
15 से 19 साल की उम्र में लोग हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करते हैं, लेकिन प्राविधिक शिक्षा विभाग के इस नए गणितीय आविष्कार के अनुसार अभ्यर्थी को इसी उम्र में एमटेक या पीएचडी करके सरकारी अध्यापक भी बन जाना है। ऐसा अद्भुत और ज्ञानवर्धक टैलेंट हिंदुस्तान में तो नहीं मिल सकता, इसके लिए तो किसी दूसरे ग्रह से ही अभ्यर्थी बुलाने पड़ेंगे।

क्या आंखें मूंदकर बैठा है प्रशासन
विभागीय सूत्रों की मानें तो निदेशालय से लेकर शासन तक दबी ज़ुबान में सब स्वीकार करते हैं कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नियम विरुद्ध है। यदि पदोन्नति देनी ही थी, तो वैधानिक तरीके से नियमों में संशोधन किया जा सकता था। लेकिन सत्ता के रसूख और प्रशासनिक हनक के आगे नियम-कायदे सिर्फ कागजी खिलौना बनकर रह गए हैं।
प्रदेश के मुख्यमंत्री जहाँ राज्य को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से पारदर्शी बनाने की संकल्पना लेकर चल रहे हैं, वहीं विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस तरह के फैसलों से पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। यदि ऐसे ही अपात्रों के हाथ में बागडोर सौंपी जाती रही, तो प्राविधिक शिक्षा के स्तर और इसमें पढ़ने वाले हज़ारों छात्रों के भविष्य का क्या होगा, यह एक बड़ा और गंभीर प्रश्न है।

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