रेप (बलात्कार )का आनंद लेती हैं लड़कियां बयान देने वाला आरएसएस का मोहनदास गिरफ्तार

इतिहास की पुनरावृत्ति या राजनीतिक रणनीति? टी.जी. मोहनदास के बयान, गिरफ्तारी और RSS के दूरी बनाने के रुख का गहन विश्लेषण
यह घटना आरएसएस और उससे जुड़े व्यक्तियों के बयानों पर विवाद के पुराने पैटर्न की याद दिलाती है, जहां संगठन अक्सर व्यक्तिगत विचारों का हवाला देते हुए दूरी बना लेता है। आलोचक इसे “पहले विचार फैलाओ, फिर खुद को अलग करो” की रणनीति बताते हैं, जबकि समर्थक स्वतंत्र अभिव्यक्ति और संदर्भ का मुद्दा उठाते हैं। मोहनदास के मामले में भी इसी तरह की बहस छिड़ी है।
नई दिल्ली /10 अगस्त 2026/ अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
वैचारिक दूरी और सांगठनिक पल्ला झाड़ने की परंपरा
भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कार्यशैली हमेशा से अध्ययन और तीव्र बहस का विषय रही है। स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम दौर से लेकर स्वतंत्र भारत के कई दशकों के इतिहास में संघ पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि जब भी उसका कोई विचारक, कार्यकर्ता या पूर्व पदाधिकारी किसी गंभीर विवाद, हिंसक बयानबाजी या कानून-व्यवस्था के संकट में फंसता है, तो शीर्ष नेतृत्व अत्यंत तत्परता से स्वयं को उस व्यक्ति के बयानों और कृतियों से पूरी तरह अलग कर लेता है।
ऐतिहासिक रूप से आलोचक इस प्रवृत्ति की तुलना महात्मा गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे के संदर्भ में अपनाए गए संघ के रुख से करते हैं। हालांकि गोडसे अतीत में संघ से जुड़ा रहा था, किंतु गांधी जी की हत्या के बाद संघ ने स्पष्ट किया कि गोडसे का उससे कोई संगठनात्मक संबंध नहीं था। दशकों बाद, केरल के चर्चित दक्षिणपंथी विचारक और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बौद्धिक प्रकोष्ठ (Intellectual Cell) के पूर्व राज्य संयोजक टी.जी. मोहनदास के हालिया मामले में भी वैसी ही सांगठनिक रणनीति देखने को मिल रही है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं के विरुद्ध बेहद उग्र, हिंसक और महिला-विरोधी बयानबाजी के आरोप में केरल पुलिस द्वारा टी.जी. मोहनदास को हिरासत में लिए जाने के बाद, संघ नेतृत्व ने तुरंत बयान जारी कर यह स्पष्ट कर दिया कि मोहनदास किसी भी स्तर पर आरएसएस के प्रतिनिधि या पदाधिकारी नहीं हैं। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर संघ के कैडर निर्माण, वैचारिक संस्थाओं की भूमिका, कानून-व्यवस्था और उसके सांगठनिक चरित्र को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है।
कौन हैं टी.जी. मोहनदास? संघ और भाजपा के थिंक टैंक से उनका सफर
टी.जी. मोहनदास केवल कोई साधारण सोशल मीडिया यूजर या स्वतंत्र टिप्पणीकार नहीं हैं, बल्कि केरल की दक्षिणपंथी बौद्धिक राजनीति में उनका एक लंबा और स्थापित इतिहास रहा है।
भारतीय विचार केंद्रम में भूमिका: टी.जी. मोहनदास वर्षों तक 'भारतीय विचार केंद्रम' (Bharatiya Vichara Kendram) के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे। वे 1997 में इसके महासचिव और वर्ष 2006 में इसके उपाध्यक्ष रहे।
भारतीय विचार केंद्रम का आधार: भारतीय विचार केंद्रम की स्थापना 1982 में तिरुवनंतपुरम (केरल) में आरएसएस के शुरुआती वरिष्ठ प्रचारकों में से एक, प्रख्यात हिंदुत्ववादी विचारक पी. परमेश्वरन द्वारा की गई थी। इस संस्था का औपचारिक उद्घाटन भारतीय मजदूर संघ (BMS) के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने किया था। यह संस्था केरल में आरएसएस के मुख्य थिंक टैंक (वैचारिक मंच) के रूप में जानी जाती है, जिसका मुख्य कार्य बौद्धिक विमर्श का निर्माण करना और हिंदुत्ववादी विचारधारा को अकादमिक व सामाजिक मंच प्रदान करना रहा है।
भाजपा में सांगठनिक जिम्मेदारियां: विचार केंद्रम के अलावा, मोहनदास ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बौद्धिक प्रकोष्ठ (Intellectual Cell) के राज्य संयोजक के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। वे टीवी बहसों और यूट्यूब चैनलों पर दक्षिणपंथी विचारों के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में लगातार सक्रिय रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि के कारण, जब मोहनदास के मुंह से हिंसक बयान निकले, तो राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधी दलों ने इसे केवल एक व्यक्ति का निजी बयान न मानकर उस पूरी वैचारिक पाठशाला का उत्पाद माना जिसमें वे दशकों तक पले-बढ़े थे।
विवाद की शुरुआत: यूट्यूब वीडियो और विवादित बयानबाजी
पूरा मामला 26 जुलाई को उजागर हुआ, जब टी.जी. मोहनदास ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया। यह वीडियो दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं से संबंधित था। इस वीडियो में मोहनदास ने प्रदर्शनकारियों के प्रति अत्यधिक आक्रामक, असंवैधानिक और उकसाने वाली भाषा का प्रयोग किया।
गोली मारने की हिंसक अपील
वीडियो में मोहनदास ने कहा कि यदि प्रदर्शनकारियों से निपटने और कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी उनके हाथों में होती, तो वे बहुत कठोर कदम उठाते। उन्होंने कहा:
"जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे में तुरंत कर्फ्यू लगा दिया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों को तीन बार औपचारिक चेतावनी दी जानी चाहिए और यदि वे पीछे न हटें, तो पुलिसकर्मियों को बिना किसी झिझक के सीधे गोलीबारी (Firing) शुरू कर देनी चाहिए।"
उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की सख्त कार्रवाई से कुछ प्रदर्शनकारी डरकर भाग जाएंगे और कुछ मारे जाएंगे, लेकिन केवल चार घंटे के भीतर पूरी स्थिति शांत और नियंत्रित हो जाएगी।
महिलाओं और प्रदर्शनकारियों पर शर्मनाक टिप्पणी
एक अन्य वीडियो और टिप्पणी में मोहनदास की भाषा और भी अधिक चिंताजनक और महिला-विरोधी हो गई। उन्होंने पुलिस को सलाह देते हुए कहा कि प्रदर्शन स्थल से पुलिस बल को पूरी तरह हटा लिया जाना चाहिए और उस पूरे इलाके को प्रदर्शनकारियों के भरोसे छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा:
"पुलिस को हट जाना चाहिए... वहां बलात्कार (Rape) और हत्याएं होंगी। बलात्कार की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई जाएगी, क्योंकि वे इसे पसंद करते हैं।"
इस तरह की अपमानजनक, अमानवीय और घृणास्पद टिप्पणी ने नागरिक समाज, छात्र संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया।
जन-आक्रोश, पुलिस कार्रवाई और कानूनी धाराएं
टी.जी. मोहनदास के इन बयानों के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही व्यापक स्तर पर जन-आक्रोश फैल गया। विभिन्न छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला और हिंसा को बढ़ावा देने की आपराधिक साजिश करार दिया।
AISF की शिकायत और FIR
वामपंथी छात्र संगठन 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन' (AISF) ने टी.जी. मोहनदास के खिलाफ केरल पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। अपनी शिकायत में AISF ने आरोप लगाया कि मोहनदास का यह वक्तव्य जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे निर्दोष छात्रों और युवाओं के विरुद्ध हिंसा भड़काने, पुलिस बल को गैर-कानूनी हत्याओं के लिए उकसाने और सार्वजनिक शांति को भंग करने का एक सुनियोजित प्रयास है।
साइबर पुलिस का एक्शन और गिरफ्तारी
29 जुलाई: AISF की शिकायत के आधार पर तिरुवनंतपुरम की साइबर पुलिस ने टी.जी. मोहनदास के खिलाफ मामला दर्ज किया। उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की उन धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया जो दंगा भड़काने, समाज में उपद्रव फैलाने और वैमनस्य पैदा करने से संबंधित हैं। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) और केरल पुलिस अधिनियम (Kerala Police Act) की विभिन्न सुसंगत धाराएं भी जोड़ी गईं।
9 अगस्त: गहन प्राथमिक जांच के बाद, तिरुवनंतपुरम पुलिस की एक विशेष टीम ने कोच्चि के मट्टनचेरी स्थित उनके आवास से टी.जी. मोहनदास को हिरासत में ले लिया और पूछताछ के लिए ले गई।
आरएसएस की प्रतिक्रिया: "हमारा इनसे कोई संबंध नहीं"
जैसे ही पुलिस की कार्रवाई तेज हुई और मीडिया व सोशल मीडिया पर आरएसएस तथा भाजपा को कटघरे में खड़ा किया जाने लगा, संघ के नेतृत्व ने त्वरित रूप से खुद को इस पूरे मामले से अलग करने की रणनीति अपनाई।
दक्षिण केरल के संघ के सह-प्रांत कार्यवाह के.बी. श्रीकुमार ने एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा:
"टी.जी. मोहनदास द्वारा दिए गए बयान पूरी तरह से उनके व्यक्तिगत विचार हैं। वे किसी भी स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी नहीं हैं। आरएसएस उनके इन विचारों से रत्ती भर भी सहमति नहीं रखता है। संघ ऐसे हिंसक और गैर-जिम्मेदाराना विचारों की पुरजोर निंदा करता है।"
श्रीकुमार ने यहां तक स्पष्ट किया कि वर्तमान में मोहनदास का संघ की किसी भी शाखा, गतिविधि या सांगठनिक ढांचे से कोई औपचारिक संबंध नहीं है।
आलोचकों का दृष्टिकोण: सांगठनिक पल्ला झाड़ने की पुरानी शैली
आरएसएस के इस रुख पर राजनीतिक विरोधियों, नागरिक संगठनों और विचारकों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आलोचकों का तर्क है कि यह आरएसएस की एक पुरानी और सुपरिचित रणनीति है।
कैडर का निर्माण: पहले विभिन्न बौद्धिक और मैदानी संस्थाओं के माध्यम से कार्यकर्ताओं को कट्टरपंथी और उग्र विचारों में ढाला जाता है।
इस्तेमाल और दूरी: जब वे कार्यकर्ता संघ के वैचारिक एजेंडे के अनुरूप कट्टर बयानबाजी करते हैं या अतिवादी कदम उठाते हैं, तो संघ पर्दे के पीछे रहकर उसका राजनीतिक लाभ उठाता है।
संकट में अस्वीकार्यता: लेकिन जैसे ही मामला कानून, पुलिस, अदालत या जनता के भारी विरोध के दायरे में आता है, संघ शीर्ष स्तर पर औपचारिक बयान देकर उस व्यक्ति से अपना पल्ला झाड़ लेता है और उसे "निजी विचार" या "गैर-पदाधिकारी" घोषित कर देता है।
आलोचकों का कहना है कि यह कार्यशैली कई अर्थों में उन अनफॉर्मल या अनावंजीकृत संगठनों से मिलती-जुलती है, जो औपचारिक रूप से किसी सदस्य का रिकॉर्ड नहीं रखते ताकि कानूनी जवाबदेही से बचा जा सके।
सांगठनिक संरचना और वैचारिक प्रभाव: एक तुलनात्मक अध्ययन
आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों (जिन्हें सामूहिक रूप से 'संघ परिवार' कहा जाता है) की सांगठनिक बनावट इस प्रकार है कि उसमें औपचारिक सदस्यता (Formal Membership) का कोई लिखित दस्तावेज या आईडी कार्ड नहीं होता। इस अनौपचारिक संरचना के अपने फायदे और नुकसान हैं, जिसे निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है:
| पहलू | आरएसएस और संघ परिवार की रणनीति | आलोचकों और कानूनी विशेषज्ञों का दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| सदस्यता (Membership) | कोई औपचारिक पंजीकरण या सदस्यता रजिस्टर नहीं होता। केवल 'शाखा' में उपस्थिति ही जुड़ाव का आधार है। | कानूनी दायित्व और आपराधिक मामलों से संगठन को बचाने के लिए यह एक रणनीतिक व्यवस्था है। |
| वैचारिक मंच (Think Tanks) | 'भारतीय विचार केंद्रम' जैसी संस्थाओं को स्वतंत्र स्वायत्त निकाय बताया जाता है। | ये संस्थाएं सीधे संघ के वरिष्ठ प्रचारकों द्वारा संचालित होती हैं और संघ का मुख्य एजेंडा तय करती हैं। |
| विवादित बयान (Controversial Remarks) | व्यक्तिगत विचार (Personal Opinion) कहकर खारिज कर दिया जाता है। | यह संगठन द्वारा वर्षों से दी गई नफरती और उग्र वैचारिक ट्रेनिंग का ही परिणाम होता है। |
| कानूनी स्थिति (Legal Status) | संगठन पर कोई सीधी आंच नहीं आती; केवल व्यक्ति विशेष पर केस दर्ज होता है। | वैचारिक उकसावे (Ideological Incitement) की नैतिक जवाबदेही से संगठन कभी मुक्त नहीं हो सकता। |
भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर प्रभाव
टी.जी. मोहनदास का यह मामला केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी या एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर हमला: संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण रूप से और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने या उनके खिलाफ हिंसा की वकालत करना सीधे तौर पर संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।
संवेदनहीनता और लैंगिक हिंसा का सामान्यीकरण: महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार जैसी जघन्य हिंसा को किसी आंदोलन को दबाने के साधन के रूप में चित्रित करना समाज की नैतिक चेतना पर गहरा आघात है।
कानून का शासन (Rule of Law): किसी भी सभ्य समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी संविधान और पुलिस प्रक्रिया के तहत होती है। भीड़ या राज्य द्वारा सीधे 'गोली मारने' की वकालत करना अराजकता को न्योता देना है।
टी.जी. मोहनदास की गिरफ्तारी और उसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उनसे दूरी बनाने का घटनाक्रम भारतीय राजनीति के उस दोहरे रवैये को उजागर करता है, जहां उग्र बयानों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश तो की जाती है, लेकिन कानूनी शिकंजा कसते ही संगठन अपने ही पुराने विचारकों को अकेला छोड़ देते हैं।
चाहे नाथूराम गोडसे का ऐतिहासिक संदर्भ हो या आज टी.जी. मोहनदास का मामला, यह घटना यह साबित करती है कि वैचारिक संगठनों को केवल बयानों से पल्ला झाड़ने के बजाय अपने कैडर को दी जाने वाली शिक्षा और वैचारिक दिशा की भी आत्मसमीक्षा करनी चाहिए। लोकतंत्र में हिंसा, नफरत और असंवैधानिक उकसावे के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता, और जब कानून अपना काम करता है, तो राजनीतिक संरक्षण के मुखौटे अंततः उतर ही जाते हैं।