सावन में जब प्रजा के बीच उतरते हैं राजाधिराज महाकाल, जानिए उज्जैन की इस प्राचीन और भव्य परंपरा के बारे में

सनातन परंपरा में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि आकाश में तारकेश्वर, पाताल में हाटकेश्वर और मृत्युलोक में महाकाल का वास है। उज्जैन का महाकालेश्वर इसलिए श्रद्धा का केंद्र नहीं बना कि वह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, बल्कि इस धाम की पहचान उस विश्वास से बनी है जिसके अनुसार महाकाल आज भी उज्जयिनी के राजा हैं। राजसिंहासन बदलते रहे, सल्तनतें आईं और गईं, पर इस नगरी का अधिपति कभी नहीं बदला।
श्रावण का भगवान शिव से संबंध पुराणों में विस्तार से मिलता है। समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिव ने अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी। विष की तपन शांत करने के लिए देवताओं ने जल अर्पित किया था, और उसी स्मृति में आज भी सावन भर शिवलिंग पर जलाभिषेक होता है। शिवपुराण की कोटिरुद्र संहिता में महाकाल की कथा आती है कि जब अवंती नगरी पर दूषण नामक असुर का अत्याचार बढ़ा, तो भगवान शिव महाकाल रूप में प्रकट हुए और अधर्म का अंत किया।
उज्जैन में पीढ़ियों से यह विश्वास प्रचलित है कि राजा महाकाल हैं और बाकी सब उनकी प्रजा हैं। यही विश्वास महाकाल की सवारी का आधार है, जिसमें राजा अपनी प्रजा का हाल जानने राजमहल से निकलते हैं। सावन के पहले सोमवार आते ही उज्जैन का मिज़ाज बदल जाता है और क्षिप्रा के घाटों पर सुबह की आरती, मंदिरों की घंटियां, हर-हर महादेव का उद्घोष और कांवड़ियों की टोलियां नजर आने लगती हैं।
सावन के सोमवार की दोपहर चढ़ते-चढ़ते शहर का हर रास्ता महाकाल मंदिर की ओर मुड़ जाता है। जब चांदी की पालकी में विराजमान बाबा महाकाल बाहर आते हैं, तो पूरा वातावरण जय श्री महाकाल के उद्घोष से गूंज उठता है। पालकी के साथ आस्था का अथाह सागर चलता है जिसमें सबसे आगे ध्वज, घुड़सवार दल, पारंपरिक बैंड, अखाड़ों के साधु, वैदिक ब्राह्मण, भजन मंडलियां और हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
सवारी जिस गली से गुजरती है, वह कुछ समय के लिए तीर्थ बन जाती है क्योंकि छतों से फूल बरसते हैं, महिलाएं आरती उतारती हैं और व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों के सामने दीप जलाकर राजा का स्वागत करते हैं। उज्जैन की यह परंपरा धर्म के साथ-साथ संस्कृति की भी पहचान है, जिसमें मालवा के लोकवाद्य, अखाड़ों की परंपरा, संतों की उपस्थिति, वैदिक मंत्र और जनभागीदारी शामिल होती है।