मोदी सरकार के यूपीआई पर प्रस्तावित शुल्क लगाने के कदम को वापस लेने की उठी मांग

मोदी सरकार का यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) लेन-देन पर शुल्क लगाने का कदम आम लोगों पर हमला है। सी पी कृष्णन के अनुसार, 6 अगस्त को सरकार ने लोकसभा में यह विधेयक पारित किया, जिससे यूपीआई ऐप्स के ज़रिए किए जाने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की मंज़ूरी मिल गई है। यह विधेयक विपक्ष की राय सुने बिना और बिना किसी बहस के पारित कर दिया गया। इसे तानाशाही तरीके से ध्वनि मत के ज़रिए पारित कराया गया है। इस संशोधन के ज़रिए, कॉर्पोरेटों को फायदा पहुंचाने के लिए, सरकार आम लोगों से शुल्क वसूलकर उन्हें सज़ा दे रही है।
आम जनता पर असर
सत्ताधारियों का दावा है कि ये शुल्क केवल व्यापारियों से ही वसूले जाएंगे। लेकिन असल में, व्यापारियों पर लगाया गया कोई भी शुल्क आखिरकार आम लोगों के सिर पर ही पड़ेगा। करारोपण और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 के तहत भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में बदलाव किया गया है। अब तक, यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लेने पर रोक लगाने वाला एक कानून था। 6 अगस्त को सरकार ने उस कानून में बदलाव किया है। अब, अगर सरकार चाहे तो शुल्क लगा सकती है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, केवल 2,000 रूपये से ज़्यादा के यूपीआई लेन-देन पर 0.3 से 0.5 प्रतिशत का चार्ज लग सकता है।
डिजिटलीकरण की ओर बढ़ावा और ज़बरदस्त बढ़ोतरी
8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा की गई थी। केंद्र सरकार ने दावा किया था कि इससे काला धन, भ्रष्टाचार और नकली नोट की समस्या खत्म हो जाएगी। असल में, इनमें से कोई भी समस्या हल नहीं हुई। इसके साथ ही, केंद्र सरकार ने लोगों को डिजिटलीकरण की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और वादा किया था कि इस पर कभी कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इस भरोसे के कारण लोगों ने इसे बड़े पैमाने पर अपनाया। नवंबर 2016 में, एक महीने में मुश्किल से 3,00,000 लेन-देन हुए थे, जिनका कुल मूल्य 100 रूपये करोड़ था। जुलाई 2026 तक, लेन-देन की संख्या बढ़कर एक महीने में 2,366 करोड़ हो गई, जिनका कुल मूल्य 30 लाख करोड़ रूपये था।
विदेशी कंपनियों का दबदबा और आरबीआई की नाकामी
मुख्य सवाल यह है कि इन लेन-देनों को कौन नियंत्रित करता है? विदेशी कंपनियों का दबदबा है। अमेरिका की वॉलमार्ट के मालिकाना हक वाली फोनपे 50 प्रतिशत और अमेरिका की गूगल पे 33 प्रतिशत लेन-देन संभालती हैं। ये दोनों विदेशी कंपनियाँ मिलकर यूपीआई लेन-देन का 83 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करती हैं। दूसरी ओर, एसबीआई पे, पीएनबी पे और बड़ौदा एम पे जैसे सरकारी बैंकों के ऐप्स बाज़ार में नहीं के बराबर हैं। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने इस एकाधिकार को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है।
1.2 लाख करोड़ रुपयों के शुल्क की लूट
अभी, हर महीने यूपीआई लेन-देन का कुल मूल्य 30 लाख करोड़ रूपये है। एक अनुमान के अनुसार, इनमें से लगभग 65 प्रतिशत लेन-देन 2,000 रूपये से ज़्यादा के हैं। अगर एमडीआर 0.5 प्रतिशत हो, तो यूपीआई शुल्क हर महीने 10,000 करोड़ रूपये और सालाना 1.2 लाख करोड़ रूपये होगा। अगर यह 0.3 प्रतिशत भी हो, तो भी यह हर महीने 6,000 करोड़ रूपये और सालाना 72,000 करोड़ रुपये होगा। इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा फोनेपे और गूगल पे को होगा।
नगद के चलन और शुल्क के नाम पर लूट
नोटबंदी और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने का एक मकसद नगद के चलन को कम करना था। नवंबर 2016 में 18 लाख करोड़ रूपये का नगद चलन में था। लेकिन आज, नगद का चलन 42 लाख करोड़ रूपये को पार कर गया है। सरकार को यह बदलाव तुरंत वापस लेना चाहिए, वरना जनता उसे ऐसा करने पर मजबूर कर देगी।