उत्तर प्रदेश के टेक्निकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के इंजीनियर मंत्री का टेक्निकल जीरो परफॉर्मेंस

उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दावा करने वाले प्राविधिक शिक्षा विभाग की जमीनी हकीकत बदहाली की चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। राज्य के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा यह विभाग आज खुद वेंटिलेटर पर सांसें गिन रहा है। विडंबना यह है कि जिस विभाग की कमान एक पढ़े-लिखे और इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले मंत्री के हाथों में है, उसकी परफॉर्मेंस प्रशासनिक और अकादमिक दोनों मोर्चों पर पूरी तरह जीरो साबित हो रही है। पूरा विभाग स्थायी नीति, जिम्मेदार अधिकारियों और शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है। आलम यह है कि शीर्ष पदों से लेकर जमीनी स्तर के संस्थानों तक केवल सन्नाटा और अवैध जुगत का खेल चल रहा है।
निदेशालय में प्रशासनिक व्यवस्था का मज़ाक उड़ रहा है। शासन से निदेशालय के लिए जो कार्यवाहक निदेशक भेजे गए हैं, उनका ग्रेड पे वहां पहले से तैनात उपनिदेशक, सहायक निदेशक, प्रधानाचार्य और संयुक्त निदेशक जैसे अधिकारियों से भी कम है। प्रशासनिक तंत्र का यह सीधा नियम है कि कम ग्रेड पे वाला अधिकारी अपने से उच्च ग्रेड पे वाले अधिकारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं रख सकता। यही वजह है कि निदेशालय में कार्यवाहक निदेशक केवल नाममात्र के लिए बिठाए गए हैं। वास्तव में पूरा विभाग मंत्री जी के करीबी आला अधिकारी श्री आत्म प्रकाश सिंह चला रहे हैं। स्थिति यह बन चुकी है कि वे जो भी फाइल तैयार करते हैं या आदेश जारी करते हैं, कार्यवाहक निदेशक महोदय बिना कोई सवाल पूछे उस पर चुपचाप अपने हस्ताक्षर कर देते हैं।
विभाग का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और यही शून्यता भ्रष्टाचार का नया जरिया बन गई है। संयुक्त निदेशक के सारे पद कार्यवाहक अधिकारियों के भरोसे चल रहे हैं। निदेशालय में एडिशनल डायरेक्टर का पद लंबे समय से रिक्त पड़ा हुआ है। यानी व्यावहारिक रूप से प्रधानाचार्य से ऊपर के स्तर का कोई भी स्थायी और सक्षम अधिकारी इस समय प्राविधिक शिक्षा विभाग में उपलब्ध ही नहीं है। निदेशालय और प्राविधिक शिक्षा परिषद जो राज्य के लाखों छात्रों की परीक्षाओं और डिgeries का संचालन करती है, बिना स्थायी निदेशक और सचिव के चल रही है। इसके अलावा संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद में भी सचिव और संयुक्त सचिवों के पद रिक्त पड़े हैं।
उपसचिव, उपनिदेशक, सहायक निदेशक और पाठ्य पुस्तक अधिकारी जैसे मुख्य प्रशासनिक पदों पर स्थायी अधिकारियों का न होना महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खेल बन चुका है। स्थायी निदेशक, सचिव, प्रधानाचार्य, उपसचिव और उपनिदेशक न होने की आड़ में ही एक प्रभावशाली सिंडिकेट-रैकेट अपना धंधा बेधड़क चला रहा है। यह सिंडिकेट अधिकारियों की कमी के नाम पर और भ्रष्टाचार के दम पर मनचाहे अटैचमेंट, दोहरे चार्ज और तबादलों का काला कारोबार चला रहा है। यही कारण है कि बरसों बीत जाने के बाद भी विभाग अपनी स्थायी प्रशासनिक नियमावली तक नहीं बना पाया है ताकि इस अव्यवस्था का सीधा फायदा सिंडिकेट को लगातार मिलता रहे।
विभागीय नियमों के मुताबिक यदि किसी संस्थान में स्थायी प्रधानाचार्य उपलब्ध न हो, तो वहां मौजूद प्रथम श्रेणी अधिकारी को प्रभार दिया जाना चाहिए। लेकिन नियमों का पालन करने पर भ्रष्टाचार का मौका कैसे मिलेगा? इसीलिए ऐसे प्रभार की ऊंची बोली लगाने वाले को ही कुर्सी सौंप दी जाती है। इसका ताजा उदाहरण हरदोई और सीतापुर के प्रधानाचार्य पद का चार्ज है। दोनों जिलों के बीच लगभग 80 किलोमीटर की दूरी है, फिर भी कार्यवाहक निदेशक श्री प्रभाकर मिश्रा द्वारा एक महिला प्रधानाचार्य श्रीमती कविता त्रिपाठी जी को ही इसके काबिल माना गया। इस मेहरबानी के पीछे का कारण अब किसी से छिपा नहीं है।
स्थायी नियुक्तियों के अभाव में पूरा विभाग कार्यवाहक और चार्ज सिस्टम के सहारे घिसट रहा है। आलम यह है कि एक-एक अधिकारी को 150 से 200 संस्थानों का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। जब अफसर केवल कागजी फाइलों को निपटाने और दस्तखत करने में ही उलझे रहेंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता, निरीक्षण और मॉनिटरिंग पूरी तरह ठप होना स्वाभाविक है। शिक्षण संस्थानों की हालत किसी लावारिस ढांचे जैसी हो चुकी है। राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थानों में प्रधानाचार्यों की संख्या मात्र 20 प्रतिशत ही रह गई है, यानी 80 प्रतिशत संस्थान बिना मुखिया के चल रहे हैं।
इससे भी बदतर स्थिति वित्त पोषित पॉलिटेक्निकों की है, जहां मात्र 10 प्रतिशत शिक्षक ही उपलब्ध हैं। पूरे-पूरे पॉलिटेक्निक में मात्र तीन या चार शिक्षकों के भरोसे 6 से 8 ब्रांचों की कमान सौंपी गई है। अब ऐसी स्थिति में प्रदेश में तकनीकी शिक्षा का विकास किस स्तर का हो रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। राजकीय महिला पॉलिटेक्निक संस्थान भी बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों के अभाव में बदहाली के आंसू बहा रहे हैं।
विशिष्ट संस्थानों की स्थिति तो और भी हास्यास्पद बन चुकी है। महामाया सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना राज्य में आईटी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों से आईटी ब्रांच ही नदारद है। शोध, विकास एवं प्रशिक्षण संस्थान का मूल काम तकनीकी अनुसंधान करना था। आज इसके नाम से रिसर्च और डेवलपमेंट पूरी तरह गायब हो चुका है और यह केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित है।
पॉलिटेक्निक में पढ़ाने के लिए शिक्षक पहले से ही कम हैं। जो थोड़े-बहुत तैनात भी हैं, वे कक्षाओं में पढ़ाने के बजाय सिंडिकेट की सांठगांठ से शासन और निदेशालयों में अवैध अटैचमेंट कराकर मजे काट रहे हैं। एक उच्च शिक्षित इंजीनियरिंग ग्रेजुएट मंत्री के कार्यकाल में तकनीकी शिक्षा विभाग का इस कदर दिशाहीन, भ्रष्ट और खोखला हो जाना प्रदेश के लाखों छात्रों के भविष्य पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।