उत्तराखंड में मतदाता सूची की सफाई: आदमी घर में बैठा है और सरकारी कागज उसे ढूंढ रहा है

उत्तराखंड में मतदाता सूची की सफाई शुरू होने पर यह सवाल उठ रहा है कि आदमी घर में बैठा है और सरकारी कागज उसे ढूंढ रहा है। पहले जो लोग वोटर थे, अब उन्हें गवाही देनी है कि वे वोटर हैं। मतदाता सूची की सफाई के दौरान यह देखना जरूरी है कि कहीं आईना ही तो नहीं पोंछा जा रहा है। उत्तराखंड में जब मतदाता सूची की सफाई शुरू हुई तो लगा कि लोकतंत्र के पुराने घर में झाड़ू चल रही है। धूल हटनी ही चाहिए, लेकिन झाड़ू लगते-लगाते एक चौंकाने वाला सच सामने आया है।
उधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल इन चार मैदानी जिलों से ही नाम हटाने के करीब 80 से 85 प्रतिशत आवेदन आए हैं। पहाड़ खामोश हैं और मैदानों में हलचल मची हुई है। सवाल सूची की सफाई पर नहीं बल्कि इस असमानता पर है कि आखिर इतनी गंदगी इन्हीं चार जिलों में क्यों मिली है। लोकतंत्र में आंकड़े मौन जरूर होते हैं, मगर कभी-कभी उनका मौन ही सबसे तीखा सवाल बन जाता है।
मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित, दोहरी या गलत प्रविष्टियां होने पर उन्हें हटाना व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है। मगर सफाई और छंटाई में बहुत फर्क होता है क्योंकि घर की धूल हटाई जाती है, घर के लोग नहीं हटाए जाते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों से मैदानों की ओर वर्षों से पलायन हुआ है। लोग यहां बसे, घर बनाए, बच्चों को पढ़ाया, दुकानें खोलीं, मजदूरी और नौकरियां कीं और इसी मिट्टी में अपने जीवन की जड़ें जमाई हैं।
कई वर्षों से वोट देते आए ये लोग अब अचानक संदेह के घेरे में हैं जिससे मामला कागज से आगे बढ़ गया है। तब आदमी को अपने ही घर में यह साबित करना पड़ता है कि वह सचमुच इसी घर का रहने वाला है। फॉर्म-7 इस कहानी का एक छोटा-सा कागज है, लेकिन उसके पीछे एक बहुत बड़ा सवाल है कि आवेदन कौन कर रहा है और किस आधार पर कर रहा है।
कोई इसे घुसपैठ से जोड़ रहा है तो कोई इसे दोहरी प्रविष्टि से जोड़ रहा है। राजनीतिक दल अपने-अपने चश्मे से पूरी तस्वीर को देख रहे हैं और प्रशासन नियम-कायदों के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है। मगर इन सबके बीच आम मतदाता पूरी तरह अकेला खड़ा है। न उसके पास कोई माइक है, न मंच है और न ही अपनी बात कहने का कोई प्रभावशाली सहारा है।
उसके पास सिर्फ उसका अपना नाम है और डर यही है कि अगली सूची में कहीं वही नाम गायब न मिले। जिस बुजुर्ग ने वर्षों तक मतदान किया है, उसका नाम एक दिन गायब मिले तो यह महज कंप्यूटर की कोई गलती नहीं है। यह लोकतंत्र के दरवाजे पर उसके लिए बंद हुआ एक किवाड़ है। चार जिलों में ही इतने सारे आवेदन क्यों आए हैं, इस सवाल का जवाब मिलना बहुत जरूरी है।
मैदानों में आबादी अधिक है और प्रवासी, मजदूर, व्यापारी तथा अलग-अलग जगहों से आकर बसे परिवार भी अधिक हैं। इसलिए सूची में बदलाव की संभावना एक स्वाभाविक बात है। लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह बचता है कि पहाड़ों में नाम कम हट रहे हैं तो क्या वहां सब कुछ अपने आप सही है। क्या कम आवेदन शुद्धता की पूरी गारंटी हैं या फिर मैदानों की भीड़ को ही संदेह की पहली सीढ़ी मान लिया गया है।
पहाड़ का सन्नाटा शुद्धता और मैदान की भीड़ को गड़बड़ी मान लेना बहुत आसान काम है। मगर लोकतंत्र किसी की सुविधा से नहीं चलता है, बल्कि वह सबके लिए एक जैसी कसौटी पर चलता है। सत्ता को हमेशा सफाई बहुत पसंद आती है जैसे सड़कें साफ हों, दफ्तर साफ हों, फाइलें साफ हों और मतदाता सूची भी साफ हो। इससे भला किसी को भी क्या आपत्ति हो सकती है।
मुश्किल तब शुरू होती है जब सफाई के नाम पर यह तय होने लगे कि कौन सा नागरिक अनावश्यक है। गलत नाम हटाना बहुत जरूरी है, लेकिन किसी भी सही नागरिक को महज संदेह के आधार पर सूची से बाहर करना लोकतंत्र के साथ एक बहुत बड़ी भूल होगी। कागजों की दुनिया में इंसान धीरे-धीरे सिर्फ एक एंट्री बनकर रह जाता है। एंट्री गलत हुई तो आदमी भी गलत ही ठहर जाता है।
फिर सवाल यह नहीं रहता कि तुम कौन हो, बल्कि सवाल यह बन जाता है कि साबित करो तुम वही हो जो कल तक थे। सबसे चिंता की बात नाम हटने की संख्या नहीं है, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता है। जब इतने बड़े पैमाने पर आवेदन आए हैं तो उनकी जांच भी उतनी ही गंभीर, निष्पक्ष और स्पष्ट होनी चाहिए। कौन आवेदन कर रहा है, किस आधार पर कर रहा है और सत्यापन किस तरह हो रहा है, इन सवालों का जवाब व्यवस्था को देना ही होगा।
आवेदन किसी पड़ोसी ने किया, किसी प्रतिद्वंद्वी ने या फिर किसी संगठित तंत्र ने किया, अनुमान से ज्यादा जरूरी निष्पक्ष जांच है। लोकतंत्र में नाम जोड़ना कोई कृपा नहीं है और नाम हटाना कोई सजा नहीं है। हर आवेदन को सच मान लेना जितना खतरनाक है, हर शिकायत को राजनीतिक साजिश मान लेना भी उतना ही गलत है। मतदाता सूची कोई साधारण सरकारी रजिस्टर नहीं होती है, बल्कि वह समाज की एक नागरिक स्मृति होती है।
उसमें दर्ज हर नाम इस बात की गवाही देता है कि एक इंसान की आवाज लोकतंत्र तक पहुंचती है। चाहे कोई मजदूर हो या व्यापारी हो, प्रवासी परिवार हो या कोई बूढ़ा नागरिक हो, हर नाम के पीछे एक जीवन, एक संघर्ष और एक उम्मीद होती है। नाम मिटाना कुछ सेकंड का काम हो सकता है, लेकिन उससे जन्मा अविश्वास वर्षों तक पीछा नहीं छोड़ता है। लोकतंत्र की स्याही कागज पर सूख जाती है, मगर भरोसे पर पड़ी खरोंच आसानी से नहीं मिटती है।
इसलिए सफाई ऐसी होनी चाहिए जिसमें गलतियां हटें, नागरिक न हटें और दोहरी प्रविष्टियां मिटें, किसी का अधिकार न मिटे। उत्तराखंड की यह पहेली किसी एक दल, समुदाय या जिले भर की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की एक परीक्षा है। चार मैदानी जिलों से 80 से 85 प्रतिशत नाम हटाने के आवेदन आए हैं तो यह आंकड़ा जांच की मांग करता है, किसी फैसले की नहीं। पहाड़ों की शांति को भी पूर्ण शुद्धता का प्रमाण नहीं माना जा सकता है।
हर नाम पर समान नियम लागू हों, हर शिकायत पर समान जांच हो और हर नागरिक को समान अधिकार मिले, यही लोकतंत्र की असली कसौटी है। चुनाव केवल कोई मशीन, बूथ और मतपत्र नहीं है, बल्कि वह उस भरोसे का नाम है जिसमें नागरिक को यकीन होता है कि उसकी आवाज गिनी जाएगी। इसलिए आखिरी सवाल यही है कि हम मतदाता सूची साफ कर रहे हैं या फिर लोकतंत्र का आईना साफ कर रहे हैं। आईना साफ होना चाहिए, मगर उसे पोंछते-पोंछते उसमें दिखने वाले चेहरे ही मिट जाएं, तो उस साफ आईने का अर्थ ही क्या रह जाएगा।