राजकीय संग्रहालय विदिशा में सुरक्षित हैं जैन धर्म की अम्बिका देवी की दो प्राचीन और दुर्लभ प्रतिमाएं

Team Atal Hind8 August 20262 min read26 viewsधर्म
राजकीय संग्रहालय विदिशा में सुरक्षित हैं जैन धर्म की अम्बिका देवी की दो प्राचीन और दुर्लभ प्रतिमाएं

मध्यप्रदेश के विदिशा नगर में स्थित राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय में जैन तीर्थंकरों और उनके शासनदेव-देवियों की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं सुरक्षित हैं। इस संग्रहालय में मौजूद पुरातात्विक कला और शिल्पकला की इन मूर्तियों में अम्बिका देवी की दो प्राचीन प्रतिमाएं भी शामिल हैं, जिनका विस्तृत परिचय इंदौर के डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ ने दिया है।

  • विदिशा राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय मध्यप्रदेश के समृद्ध संग्रहालयों में से एक है।
  • संग्रहालय में तीर्थंकरों और शासनदेव-देवियों की प्राचीन प्रतिमाएं अभिरक्षित हैं।
  • यहाँ अम्बिका देवी की दो बेहद खास और प्राचीन प्रतिमाएं मौजूद हैं।

प्रथम अम्बिका प्रतिमा की विशेषता

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

इन्दौर के डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ के अनुसार, तीर्थंकर नेमिनाथ की शासनदेवी अम्बिका यक्षिणी की यह प्रथम प्रतिमा द्विभुजी और ललितासन में बैठी हुई है। वे अपने दाहिने हाथ में आम्रलुम्बी लिए हैं और बाएं हाथ से अपने कनिष्ठ पुत्र प्रियंकर को संभाले हुए हैं। इनका दूसरा ज्येष्ठ पुत्र शुभंकर मां के दाहिने पैर के समीप खड़ा है, जो ऊपर मां के मुख की ओर देखता हुआ दर्शाया गया है और नीचे उनका वाहन सिंह बैठा है। इस प्रतिमा का अलंकरण उच्चकोटि का है और यह लाल बलुआ पत्थर पर निर्मित है, जिसका समय 10वीं शती ईस्वी अनुमानित किया गया है।

प्रथम प्रतिमा का परिकर और आभूषण

इस प्रतिमा के ऊर्ध्व भाग में आम्रलुम्बी की आठ अलंकृत शाखाओं से यक्षी का सुंदर मुकुट जैसा शिल्पित किया गया है। इसमें आकर्षक केश विन्यास, एकावली हार, मुक्ताहार, कण्ठिका और विभिन्न आभूषणों के साथ उत्तरीय व अधोवस्त्र धारण किए हुए दर्शाया गया है। परिकर में नीचे दायीं ओर गवासन में एक आराधिका बैठी है और दोनों ओर नारी परिचारिकाएं चंवरधारिणी के रूप में माला लिए खड़ी हैं। इसके वितान में मध्य में एक लघु जिन पद्मासनस्थ प्रतिमा और कुल पांच जिन प्रतिमाएं इस परिकर में अंकित हैं।

द्वितीय अम्बिका प्रतिमा का स्वरूप

बलुआ पाषाणफलक में शिल्पित शासन देवी अम्बिका की दूसरी प्रतिमा भी ललितासन में अपने वाहन सिंह पर आसीन है। द्विभुजी देवी अपने दाहिने हाथ में आम्रलुम्बी लिए हैं और बाएं हाथ से अपने लघु शिशु को अपनी बाईं जंघा पर बैठाकर संभाले हुए हैं। इनका दूसरा ज्येष्ठ पुत्र मां के दाहिने ओर समीप खड़ा है, जिसके एक हाथ में फल है और दूसरे हाथ से वह मां को पकड़े हुए है। आम्रगुच्छकों से ही इनका सुंदर सर्पफणावली जैसा छत्र दर्शाया गया है और इसके बाह्य भाग में आम्रपत्रों का विशाल प्रभावलय है।

चतुःतीर्थी प्रतिमा और अन्य विशेषताएं

इस दूसरी प्रतिमा में सुंदर मुकुट, कर्णावतंस, चार तरह के गलहार और चार लड़ी की कटिमेखला से आभूषणों का अंकन है। अधोवस्त्र की सलवटें कटि से दोनों पैरों तक स्पष्ट दिखाई देती हैं और पैरों में पैजनियां सुशोभित हैं। इसके परिकर में दोनों ओर ऊपर-नीचे दो-दो कायोत्सर्गस्थ दिगम्बर तीर्थंकर प्रतिमाएं हैं। चार जिन प्रतिमाएं होने के कारण इस निर्मिति को चतुःतीर्थी प्रतिमा भी कहा जाता है।

Share:

Comments

Leave a comment