लाल किले से विकसित भारत का संकल्प: उपलब्धियों से वैश्विक नेतृत्व की ओर

लाल किले से विकसित भारत का संकल्प: उपलब्धियों से वैश्विक नेतृत्व की ओर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 80वां स्वतंत्रता दिवस संबोधन केवल पिछले दशक की सरकारी उपलब्धियों का प्रस्तुतीकरण नहीं था। यह भारत के विकास के अगले चरण के लिए एक राजनीतिक और आर्थिक रोडमैप भी था। लाल किले से प्रधानमंत्री ने ऐसे भारत की तस्वीर प्रस्तुत की जो अभावों के प्रबंधन से आगे बढ़कर व्यापकता, आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि संबोधन ने राष्ट्रीय विमर्श को इस प्रश्न से आगे बढ़ाने का प्रयास किया कि भारत ने क्या हासिल किया है और इस प्रश्न पर केंद्रित किया कि 2047 तक भारत को क्या हासिल करना है।

संबोधन का शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश “अलगाव के बिना आर्थिक आत्मनिर्भरता” पर जोर था। भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा इस दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। जिस देश में पहले बड़े घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण का मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र नहीं था, वह अब उत्पादन संयंत्र स्थापित कर रहा है और स्वयं को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा हाल ही में “इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0” को दी गई मंजूरी और आगामी वर्षों में 5 से 8 नए सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित करने का खाका, महज़ औद्योगिक विस्तार नहीं बल्कि एक बड़े रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है। गुजरात के सानंद और धोलेरा से लेकर असम के मोरीगांव तक फैली यह औद्योगिक सक्रियता दर्शाती है कि भारत अब असेंबली-लाइन की निर्भरता से बाहर निकलकर वैश्विक तकनीकी विनिर्माण के केंद्र में अपनी जगह बना रहा है।

प्रधानमंत्री के विजन में ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्थान रहा। 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य और इस दशक में पांच नए रिएक्टर शुरू करने की योजना परमाणु ऊर्जा पर नए सिरे से जोर को दर्शाती है। वर्तमान में भारत में कुल 24 चालू परमाणु रिएक्टर हैं ये रिएक्टर देश के 7 अलग-अलग परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में काम कर रहे है। साथ ही, सौर ऊर्जा, सिटी गैस वितरण और रूफटॉप सोलर के विस्तार से भारत के ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने का प्रयास दिखाई देता है। विशेष रूप से “पीएम सूर्य घर योजना” यह आर्थिक मॉडल केवल बड़े विनिर्माण संयंत्रों या परमाणु रिएक्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम नागरिकों को भी ऊर्जा उत्पादन से जोड़ता है।
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'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' इसी विकेंद्रीकृत आत्मनिर्भरता की ओर संकेत करती है। ₹75,021 करोड़ के कुल परिव्यय वाली इस योजना के तहत अब तक देश के 51.58 लाख से अधिक घर छतों पर रूफटॉप सोलर स्थापित कर बिजली उपभोक्ता से 'बिजली उत्पादक' बन चुके हैं। लगभग 14.8 गीगावाट की स्थापित क्षमता और करीब 19 लाख परिवारों का 'शून्य बिजली बिल' यह प्रमाणित करता है कि भारत बड़े स्तर और जमीनी स्तर दोनों मोर्चों पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बना रहा है। दिसंबर 2026 तक 75 लाख घरों और मार्च 2027 तक 1 करोड़ घरों का लक्ष्य इस अभियान को वैश्विक स्तर पर घरेलू सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा आंदोलन बनाता है।

कृषि एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ है। प्रधानमंत्री का “खेत से निर्यात बाजार तक” पहुंचने का आह्वान बताता है कि भारतीय कृषि को भी वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से अधिक मजबूती से जोड़ना होगा। पारंपरिक खाद्य पदार्थ, मोटे अनाज, मसाले, फल और फूल महज स्थानीय जरूरतें नहीं, बल्कि वैश्विक ब्रांड बन सकते हैं। कृषि क्षेत्र का यह आर्थिक दर्शन तब और अधिक स्पष्ट हो जाता है जब हम भारत के $100 बिलियन के कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और समुद्री उत्पाद निर्यात लक्ष्य को देखते हैं, जिसे आगामी वर्षों में हासिल करने का संकल्प लिया गया है। इस रणनीति के केंद्र में भारत के 'श्री अन्न' हैं, जिनका वैश्विक बाजार 2030 तक $55.7 बिलियन होने का अनुमान है।

वर्तमान में भारत सालाना 18.5 मिलियन टन से अधिक मोटे अनाज का उत्पादन कर रहा है और करीब $60 मिलियन से अधिक का निर्यात दुनिया के अग्रणी देशों जैसे यूएई, सऊदी अरब और अमेरिका को कर रहा है। एपीडा की 'भारती' जैसी नई पहलें कृषि-स्टार्टअप्स को सीधे वैश्विक मानकों से जोड़ रही हैं, जो यह साबित करता है कि भारतीय किसान अब केवल पेट भरने वाला अन्नदाता नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार शृंखला का एक मजबूत स्तंभ बन रहा है। संबोधन में भारत के युवाओं को विकसित भारत परियोजना के केंद्र में रखा गया। एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को एआई कौशल प्रदान करने की घोषणा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोजगार, शिक्षा और विभिन्न क्षेत्रों की उत्पादकता को बदलने वाली है।

भारत का जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक लाभ में बदलेगा जब युवा उभरती तकनीकों के अनुरूप आवश्यक कौशल हासिल करेंगे। प्रस्तावित निःशुल्क ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का आर्थिक बोझ कम करने और गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संसाधनों को अधिक सुलभ बनाने में भी मदद कर सकता है। प्रधानमंत्री की “सप्त धारा”—विनिर्माण, कृषि, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार, गति शक्ति, रक्षा, हरित एवं नीली अर्थव्यवस्था तथा सॉफ्ट पावर—भारत के अगले चरण को समझने का उपयोगी ढांचा प्रस्तुत करती है। इसमें पारंपरिक आर्थिक प्राथमिकताओं को उन उभरते क्षेत्रों के साथ जोड़ा गया है, जिनमें भारत वैश्विक प्रभाव स्थापित करना चाहता है।

इन सभी मोर्चों पर विनिर्माण निर्णायक साबित हो सकता है। भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर वैश्विक आर्थिक शक्ति नहीं बन सकता। उसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी वस्तुओं का उत्पादक बनना होगा। इसलिए प्रधानमंत्री का गुणवत्ता, गुणवत्ता, गुणवत्ता और 'सप्त धारा' सुधारों के तहत बड़े पैमाने पर बार-बार जोर देना बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय उत्पादों को केवल कीमत के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, डिजाइन, तकनीक और पैमाने के आधार पर भी प्रतिस्पर्धा करनी होगी। यह बदलाव मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण में दिखने भी लगा है, जहाँ पीएलआई योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन बढ़कर ₹13.11 लाख करोड़ और निर्यात बढ़कर ₹4.24 लाख करोड़ तक पहुंच गया है।

मोबाइल फोन का निर्यात 2014-15 के ₹1,500 करोड़ से 165 गुना उछलकर ₹ 2.59 लाख करोड़ के पार जा चुका है, जिससे यह देश का सबसे बड़ा व्यक्तिगत निर्यात उत्पाद बन गया है। यह डेटा साबित करता है कि वर्तमान में भारत में इस्तेमाल होने वाले 99.2% मोबाइल फोन स्वदेशी रूप से बन रहे हैं और देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बन चुका है। हार्डवेयर और कृषि क्षमता के साथ-साथ, संबोधन में भारत की बढ़ती सॉफ्ट पावर को भी रेखांकित किया गया। योग, आयुर्वेद, समग्र स्वास्थ्य देखभाल, फिल्में, एनिमेशन, गेमिंग, हस्तशिल्प और डिजिटल सामग्री अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के शक्तिशाली माध्यम बन सकते हैं। ऐसे समय में जब देश संस्कृति, तकनीक और विचारों के माध्यम से तेजी से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, यह नीति अत्यंत प्रासंगिक है।

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