विश्व आदिवासी अधिकार दिवस 2026: जल, जंगल और जमीन से लेकर आत्म-निर्णय के अधिकारों तक का संघर्ष

विश्व आदिवासी अधिकार दिवस -जल, जंगल, जमीन से आत्म-निर्णय तक
लेखक -सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्
अगस्त और सितंबर के महीने आदिवासी समाज के लिए दो अलग चेतना लेकर आते हैं। 9 अगस्त को दुनिया आदिवासी दिवस मनाती है और अपनी संस्कृति का उत्सव मनाती है। इसके ठीक एक महीने बाद 13 सितंबर को वही समाज अपने अधिकारों का हिसाब मांगता है। यह दिन नाच का नहीं बल्कि सवाल पूछने का दिन होता है। आज जब हम 13 सितंबर 2026 को 19वां विश्व आदिवासी अधिकार दिवस मना रहे हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह तारीख सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं है। यह 37 करोड़ से ज्यादा लोगों के 25 साल के खूनी संघर्ष की परिणति है। यह कहानी 9 अगस्त 1982 से शुरू होती है जब संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद ने पहली बार आदिवासियों पर एक वर्किंग ग्रुप बनाया था।
इस वर्किंग ग्रुप ने दुनिया भर के आदिवासियों की दुर्दशा पर अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसमें बताया गया था कि कैसे अमेरिका में रेड इंडियंस को खत्म किया गया और ऑस्ट्रेलिया में एबोरिजिन्स को तथा भारत और अफ्रीका में विकास के नाम पर जंगलों से खदेड़ा गया। 1994 में इसी वर्किंग ग्रुप ने आदिवासियों के अधिकारों के घोषणा पत्र का पहला ड्राफ्ट तैयार किया था। इसके बाद एक लंबा इंतजार शुरू हुआ क्योंकि कई सरकारें डरती थीं। इस घोषणा पत्र में आत्म-निर्णय का अधिकार नाम का एक शब्द शामिल था। कई देशों को यह डर था कि यदि आदिवासियों को यह अधिकार मिल गया तो उनके देश टूट जाएंगे। आखिरकार 13 सितंबर 2007 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस पर वोटिंग कराई गई थी।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस प्रस्ताव के पक्ष में 144 देशों ने वोट डाला था। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था जबकि 11 देश अनुपस्थित रहे थे। भारत के उस समय के प्रतिनिधि ने यह कहा था कि भारत में सभी लोग मूल निवासी हैं और यहां कोई बाहर से नहीं आया है। इसके बाद भारत ने इसके समर्थन में वोट दिया था जिसे आज विश्व आदिवासी अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। बाद में विरोध करने वाले चारों देशों ने भी इस घोषणा पत्र को मान लिया था। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र कोई सामान्य दस्तावेज नहीं है बल्कि इसमें कुल 46 अनुच्छेद शामिल हैं।
इन अनुच्छेदों के सार को सात बड़े अधिकारों में आसानी से समझा जा सकता है। पहला अधिकार यह है कि आदिवासियों का नरसंहार, जबरन जनसंख्या स्थानांतरण और सैन्यीकरण नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 7 और 8 में इसे सीधे तौर पर नरसंहार के बराबर माना गया है। दूसरा अधिकार जल, जंगल और जमीन पर नियंत्रण का है जो सबसे अहम माना जाता है। अनुच्छेद 26 यह कहता है कि आदिवासियों को अपनी पारंपरिक जमीन, जल और प्राकृतिक संसाधनों पर पूरा अधिकार मिलना चाहिए। बिना उनकी स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति के कोई भी सरकार या कंपनी उनकी जमीन नहीं ले सकती है। तीसरा अधिकार संस्कृति और भाषा से जुड़ा हुआ है जो अनुच्छेद 11 से 13 तक में वर्णित है।
इसके तहत आदिवासियों को अपनी भाषा में शिक्षा पाने, अपने धर्म और रीति-रिवाजों का पालन करने तथा पुरातत्विक स्थलों की रक्षा करने का अधिकार है। चौथा अधिकार स्व-शासन और आत्म-निर्णय का है जिसका वर्णन अनुच्छेद 3 और 4 में किया गया है। इसके अनुसार आदिवासी अपने राजनीतिक भविष्य और विकास के रास्ते को खुद तय करेंगे और वे अपनी स्वायत्त सरकारें व परिषदें बना सकते हैं। पांचवा अधिकार अनुच्छेद 23 के तहत आता है जिसके जरिए आदिवासियों को यह तय करने का हक मिलता है कि विकास कैसा होना चाहिए। उन्हें विकास की दौड़ से बाहर नहीं रखा जा सकता है लेकिन विकास उनके अपने तरीके से होना चाहिए। छठा अधिकार अनुच्छेद 27 और 28 के अंतर्गत आता है जो जमीन छीने जाने पर उचित मुआवजे और वापसी का अधिकार देता है।
सातवां अधिकार अनुच्छेद 36 के तहत सीमा पार संपर्क का है। जो आदिवासी देश के बंटवारे में सीमा के दोनों तरफ बंट गए हैं जैसे भारत और नेपाल के थारू तथा उरांव समुदाय, उन्हें एक-दूसरे से मिलने का पूरा अधिकार है। आज दुनिया के 90 देशों में लगभग 47 करोड़ आदिवासी निवास करते हैं। वे दुनिया की कुल आबादी का 6 फीसदी हिस्सा हैं लेकिन दुनिया की 80 फीसदी जैव-विविधता की रक्षा वही करते हैं। वे 7000 से ज्यादा भाषाएं बोलते हैं जो दुनिया की कुल भाषाओं का 60 फीसदी है। इसके बावजूद वे दुनिया के सबसे गरीब वर्ग में आते हैं और विश्व बैंक का कहना है कि आदिवासियों की गरीबी दर सामान्य आबादी से तीन गुना ज्यादा है।
कोरोना महामारी के दौरान सबसे ज्यादा मौतें आदिवासियों की हुई थीं क्योंकि उनके अस्पताल जंगलों से बहुत दूर स्थित हैं। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल 10.43 करोड़ आदिवासी हैं जिनमें 705 अधिसूचित जनजातियां शामिल हैं। ये जनजातियां देश की कुल आबादी का 8.6 फीसदी हिस्सा हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों में वे बहुसंख्यक आबादी के रूप में रहते हैं। भारत के संविधान में आदिवासियों के लिए दुनिया के सबसे मजबूत कानून बनाए गए हैं। संविधान की 5वीं अनुसूची के माध्यम से 10 राज्यों के आदिवासी इलाकों में राज्यपाल को विशेष शक्तियां दी गई हैं और ग्राम सभा को जमीन हस्तांतरण रोकने का अधिकार मिला है।
वहीं संविधान की 6वीं अनुसूची के तहत असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में आदिवासियों के लिए स्वायत्त जिला परिषदें बनाई गई हैं जिनका मतलब अपना कानून और अपनी अदालत है। पेशा कानून 1996 के तहत पंचायत राज व्यवस्था को आदिवासी इलाकों में लागू किया गया था। इसके तहत अब ग्राम सभा ही यह तय करती है कि जंगल, खदान और पानी का इस्तेमाल कैसे होगा। वन अधिकार कानून 2006 के द्वारा पिछले 75 साल से जंगल में रहने वाले आदिवासी को जमीन का पट्टा देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन कागजी हकीकत और जमीन की स्थिति में बहुत बड़ा फर्क देखा जाता है। आदिवासी समन्वय मंच भारत हर साल 13 सितंबर को रांची के हरमू मैदान में अधिकार दिवस मनाता है।
आदिवासी समन्वय मंच का यह कहना है कि देश में 5वीं अनुसूची की लगातार अवहेलना की जा रही है और पिछले 70 वर्षों में सभी राजनीतिक दलों ने आदिवासियों को छलने का काम किया है। वर्तमान समय में आदिवासियों के सामने कई गंभीर संकट खड़े हो चुके हैं। पहला संकट यह है कि सरकारें जंगलों को कार्बन क्रेडिट के नाम पर बेच रही हैं। महाराष्ट्र के धोधड़े समुदाय ने 13 सितंबर के मंच से यह बात कही थी कि गांव का पानी मुंबई भेजा जा रहा है और वह पानी उद्योगपतियों के लिए है जबकि आदिवासियों के लिए नहीं है। जलवायु परिवर्तन के नाम पर आदिवासी समाज को एक बार फिर से अपनी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है। दूसरा बड़ा संकट आदिवासी भाषाओं का लगातार विलुप्त होना है।
यूनेस्को ने वर्ष 2022 से 2032 तक के दशक को स्वदेशी भाषा दशक के रूप में घोषित किया है। भारत की कुल 197 भाषाएं इस समय खतरे के निशान पर हैं जिनमें से 80 फीसदी भाषाएं आदिवासी भाषाएं ही हैं। जब तक आदिवासी भाषाएं नहीं बचेंगी तब तक उनके अधिकार कैसे सुरक्षित रह पाएंगे। झारखंड में कुड़ुख और संथाली भाषाओं को बचाने के लिए अब ओलचिकी लिपि में पढ़ाई शुरू की गई है लेकिन स्कूलों में पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। तीसरा प्रमुख संकट विकास बनाम विस्थापन का है। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला खदानों का मामला हो या फिर दामोदर घाटी में बांध निर्माण की बात हो, हर जगह एक जैसी ही कहानी दोहराई जा रही है। वन अधिकार कानून के तहत आदिवासियों के 50 लाख से ज्यादा दावों को खारिज किया जा चुका है।
इस समय सुप्रीम कोर्ट में यह मामला चल रहा है कि यदि आदिवासियों के दावे खारिज कर दिए जाते हैं तो क्या उन्हें जंगल से बाहर निकाल दिया जाएगा। इसके अलावा महिला आदिवासियों के सामने दोहरी मार और लड़ाई की स्थिति बनी हुई है। एक आदिवासी महिला केवल आदिवासी नहीं बल्कि महिला भी होती है। सोनी सोरी और दयामनी बारला जैसी महिलाएं जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के साथ-साथ पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ भी संघर्ष कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र का अनुच्छेद 22 यह स्पष्ट कहता है कि आदिवासी महिलाओं और बच्चों को विशेष सुरक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन भारत में आज भी आदिवासी महिलाओं में कुपोषण की दर 50 फीसदी तक बनी हुई है।
13 सितंबर का दिन केवल भाषण देने का दिन नहीं होना बल्कि इसे संकल्प का दिन बनाना चाहिए। इस दिशा में सबसे पहला कदम यह उठाया जाना चाहिए कि एफपीआईसी यानी पूर्व और सूचित सहमति के अधिकार को कड़ा कानून बनाया जाए। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र में सहमति की जो बात कही गई है, उसे पेशा कानून और भूमि अधिग्रहण कानून के अंदर पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। ग्राम सभा की लिखित सहमति के बिना आदिवासियों की एक इंच जमीन भी किसी को नहीं दी जानी चाहिए। दूसरा महत्वपूर्ण कदम यह है कि वन अधिकार कानून को जमीनी स्तर पर पूरी तरह से लागू किया जाए। केवल कागज पर पट्टा देना बंद किया जाए बल्कि उस पट्टे की जमीन पर कर्ज, सही बीज और बाजार की सुविधा मुहैया कराई जाए। मध्य प्रदेश में टंट्या मामा के नाम पर मनाया गया 15वां अधिकार दिवस यह बात साबित करता है कि जब तक टंट्या जैसे महापुरुषों को स्कूली पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाया जाएगा तब तक अधिकार नहीं मिल सकते हैं।
तीसरा बड़ा कदम यह होना चाहिए कि आदिवासी भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए पर्याप्त बजट का प्रावधान किया जाए। हर आदिवासी बहुल जिले में एक भाषा अकादमी और एक जैव-विविधता संग्रहालय की स्थापना की जानी चाहिए। इस पूरे विषय का निष्कर्ष यही निकलता है कि अबुआ दिशुम और अबुआ राज को पूर्ण मान्यता मिलनी चाहिए। बिरसा मुंडा ने साल 1895 में अबुआ दिशुम और अबुआ राज का नारा दिया था जिसका मतलब हमारा देश और हमारा राज होता है। यह ऐतिहासिक नारा पहले अंग्रेजों के खिलाफ था और आज की तारीख में यह व्यवस्था के खिलाफ उठाया गया कदम है। 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र ने जो घोषणा पत्र जारी किया था, वह दुनिया द्वारा आदिवासियों से माफी मांगते हुए दिया गया था।
संयुक्त राष्ट्र ने यह स्वीकार किया था कि उसने आदिवासियों की जमीन, उनकी भाषा और उनके सम्मान को छीना है। इस अधिकार दिवस का असली जश्न तभी मनाया जा सकेगा जब देश का एक साधारण आदिवासी बच्चा अपनी मातृभाषा में देश के किसी कलेक्टर को चिट्ठी लिख सके और उस कलेक्टर को भी उसी भाषा में उसका जवाब देना पड़े। जब तक यह न्याय नहीं मिलता तब तक यह संघर्ष और लड़ाई लगातार जारी रहेगी। जैसा कि मंच के संयोजक अशोक चौधरी ने कहा था कि हम आदिवासियों की इन तमाम समस्याओं को संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच तक भी उठाएंगे। यह अधिकारों की यह लड़ाई गांव की चौपाल से लेकर सीधे संयुक्त राष्ट्र तक मजबूती के साथ लड़ी जाएगी।