मानव सभ्यता की प्रथम चेतना से आधुनिक युग तक, कुछ समुदायों ने प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि उसके साथ आत्मीय सह-अस्तित्व का मार्ग चुना है। आदिवासी समाज उसी प्राचीन जीवन-दृष्टि का प्रतीक है, जिसने जंगलों में जीवन की धड़कन, नदियों में माँ का स्नेह और पर्वतों में आस्था व अस्तित्व की ऊँचाई देखी है। इस समाज ने धरती की रक्षा को धर्म माना है और 9 अगस्त का विश्व आदिवासी दिवस उनकी मौन आवाजों, समृद्ध विरासत, अधिकारों और संघर्षों को सम्मान देने का अवसर है।
संयुक्त राष्ट्र के स्वदेशी आबादी कार्य समूह की 1982 में हुई पहली बैठक ने मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1994 में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया। आज विश्वभर में लगभग 37.6 से 50 करोड़ आदिवासी लोग लगभग 90 देशों में रहते हैं। वे करीब 5000 संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक आबादी में 5-6 प्रतिशत होने के बावजूद जैव विविधता संरक्षण में उनका योगदान असाधारण है।
भारत की सांस्कृतिक आत्मा में आदिवासी समाज का योगदान अमिट छाप है जहाँ देश में लगभग 10.45 करोड़ आदिवासी नागरिक निवास करते हैं जो कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत हैं (जनगणना 2011)।
झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों में बसे ये समुदाय भारत की विविधता को विशिष्ट पहचान देते हैं। सरहुल, कर्मा और भगोरिया जैसे पर्व तथा गोंड-भील नृत्य और वारली चित्रकला भारतीय संस्कृति के अनमोल रत्न हैं।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य रिपोर्टों के अनुसार
आदिवासी समुदाय विश्व की लगभग 22–25 प्रतिशत भूमि की रक्षा और प्रबंधन करते हैं, जो जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण प्रदान करता है, वहीं 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाई गई आदिवासी अधिकार घोषणा ने उनकी संस्कृति, भाषा और भूमि संबंधी अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय मजबूती दी है।