विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त के संदर्भ में अस्मिता, अधिकार और लोकतांत्रिक न्याय का एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। किसी भी सभ्यता का मूल्यांकन केवल उसकी आर्थिक प्रगति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होता, बल्कि इस बात से भी होता है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे प्राचीन समुदायों के साथ कैसा व्यवहार करती है। भारत के संदर्भ में यह कसौटी आदिवासी समाज है। सदियों से जंगलों, पहाड़ों और नदी घाटियों में रहने वाले आदिवासी समुदायों ने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जीवन-दर्शन विकसित किया है, जिसे आज दुनिया सतत विकास और जलवायु न्याय के नाम से स्वीकार कर रही है। विडंबना यह है कि जिन समुदायों ने प्रकृति को बचाए रखा, वही आधुनिक विकास की परियोजनाओं के सबसे बड़े विस्थापित भी बने हैं।
भारत में सात सौ से अधिक अनुसूचित जनजातियाँ निवास करती हैं। भील राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में फैले हैं, गोंड मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के विस्तृत भूभाग में बसे हैं और देश की सबसे बड़ी जनजातीय आबादियों में शामिल हैं।
संथाल झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख आधार हैं। मुंडा और उरांव ने छोटानागपुर क्षेत्र की सामाजिक संरचना को आकार दिया, जबकि खासी, गारो और जयंतिया ने मेघालय की सांस्कृतिक अस्मिता को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया है। इन समुदायों की भाषाएँ, लोक परंपराएँ, सामुदायिक जीवन और प्रकृति के साथ उनका रिश्ता भारतीय संस्कृति को बहुरंगी बनाता है। आज़ादी के बाद भारत ने विकास का जो मॉडल अपनाया, उसमें बड़े बाँध, खनन, इस्पात संयंत्र, विद्युत परियोजनाएँ और औद्योगिक विस्तार प्रगति के प्रतीक बने, किंतु उनकी सबसे बड़ी सामाजिक कीमत आदिवासी समाज ने चुकाई और लाखों परिवार अपनी पुश्तैनी भूमि, जंगल और आजीविका से विस्थापित हुए हैं।
जल, जंगल और ज़मीन आदिवासी समाज के लिए संपत्ति नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार हैं। जंगल उनके लिए बाज़ार नहीं, जीवन का विद्यालय है; नदी केवल जलधारा नहीं, संस्कृति की धुरी है; भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि पूर्वजों की स्मृति और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। आदिवासी समाज के संघर्ष को केवल वर्तमान संदर्भों में नहीं समझा जा सकता क्योंकि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत के सबसे पहले और सबसे सशक्त प्रतिरोधों में आदिवासी आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तिलका मांझी ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी, संथाल हूल में सिद्धो, कान्हू, चाँद और भैरव ने औपनिर्वेशिक शोषण के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह का नेतृत्व किया, और बिरसा मुंडा का उलगुलान भूमि, संस्कृति और स्वशासन की रक्षा का आंदोलन था। भील और गोंड क्षेत्रों में भी अनेक प्रतिरोध हुए, जिन्होंने यह स्पष्ट किया कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए सदैव संघर्षरत रहा है।
गांधीवादी चिंतक और एकता परिषद के संस्थापक पी. वी. राजगोपाल ने दशकों तक भूमिहीन किसानों, वनवासियों और आदिवासी समुदायों के बीच काम करते हुए यह स्थापित किया कि भूमि का प्रश्न केवल संपत्ति का नहीं, बल्कि गरिमा, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रश्न है। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय ही यह स्वीकार कर लिया था कि आदिवासी समाज को केवल समान अधिकार देना पर्याप्त नहीं होगा और इसी सोच के परिणामस्वरूप संविधान में पाँचवीं और छठी अनुसूची का प्रावधान किया गया। बाद में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) और वनाधिकार अधिनियम, 2006 के माध्यम से ग्राम सभाओं को प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन तथा परंपरागत वनाधिकारों की मान्यता देने का प्रयास किया गया।
फिर भी वास्तविकता यह है कि कानून और ज़मीन के बीच की दूरी आज भी बनी हुई है और अनेक आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की सहमति औप बनकर रह जाती है।