विश्व ओजोन दिवस: जानिए ओजोन परत का महत्व, इसके क्षरण के कारण और बचाव के उपाय

विश्व ओजोन दिवस : हमारी जीवनदायिनी ढाल का संरक्षण
लेखक -सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्
हमारी पृथ्वी ब्रह्मांड का एकमात्र ऐसा ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन का अस्तित्व है। यहाँ जीवन के फलने-फूलने के पीछे प्रकृति की अनेक जटिल और अदभुत व्यवस्थाएँ काम कर रही हैं। इन्हीं में से एक सबसे महत्वपूर्ण और सुरक्षात्मक व्यवस्था है—ओजोन परत। पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद यह सूक्ष्म गैस की परत हमारे लिए एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है। सूर्य से निकलने वाली विनाशकारी और हानिकारक किरणों को सोखकर यह पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को जीवनदान देती है।
इस अदृश्य रक्षक के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने, इसके महत्व को समझने और इसके संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 16 सितंबर को पूरे विश्व में 'विश्व ओजोन दिवस' अथवा 'ओजोन परत संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि मानवीय गतिविधियों के कारण हमारी इस जीवनदायिनी ढाल को कितना नुकसान पहुँचा है और इसे बचाने के लिए वैश्विक स्तर पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं।
ओजोन वास्तव में ऑक्सीजन का ही एक विशेष रूप है। सामान्य रूप से जिस ऑक्सीजन में हम सांस लेते हैं, वह दो ऑक्सीजन परमाणुओं से मिलकर बनती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में रासायनिक सूत्र के रूप में जाना जाता है। इसके विपरीत, ओजोन तीन ऑक्सीजन परमाणुओं के मेल से बनने वाली एक अत्यंत सक्रिय और तीखी गंध वाली गैस है। वायुमंडल में ओजोन दो स्थानों पर पाई जाती है, जिसके आधार पर इसके प्रभाव भी पूरी तरह बदल जाते हैं।
पृथ्वी की सतह से लगभग 10 से 40 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित वायुमंडल के भाग को समतापमंडल कहते हैं। वायुमंडल की कुल ओजोन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में पाया जाता है। यही वह क्षेत्र है जिसे हम 'ओजोन परत' कहते हैं। यहाँ यह परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों (विशेषकर पराबैंगनी-बी और पराबैंगनी-सी) को पृथ्वी तक पहुँचने से रोकती है। इसके अलावा पृथ्वी की सतह के ठीक ऊपर, जहाँ हम सांस लेते हैं, वहाँ भी प्रदूषण के कारण ओजोन का निर्माण होता है।
यह ओजोन कारखानों, वाहनों और रासायनिक उत्सर्जन के कारण बनती है। धरातल पर इसकी उपस्थिति मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है, क्योंकि यह फेफड़ों को नुकसान पहुँचाती है और स्मॉग (धुंध) का मुख्य कारण बनती है। ओजोन परत की खोज वर्ष 1913 में फ्रांसीसी भौतिकविदों चार्ल्स फेब्री और हेनरी बुइसन ने की थी। इसके बाद, इसके गुणों का विस्तार से अध्ययन करने के लिए वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिकों ने काम किया। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह परत सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों का लगभग 97 से 99 प्रतिशत भाग स्वयं में अवशोषित कर लेती है।
यदि यह परत न हो, तो सूर्य की तीव्र किरणें पृथ्वी की सतह को पूरी तरह झुलसा देंगी, जिससे यहाँ जीवन का नामोनिशान मिट जाएगा। ओजोन परत के क्षरण का संकट भी दिख रहा है। एक वैश्विक चेतावनी है कि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, जैसे-जैसे आधुनिकता और औद्योगिकीकरण की गति बढ़ी, मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए ऐसी तकनीकों का विकास किया जो अंजाने में ही पर्यावरण के लिए अभिशाप बन गईं। 1970 के दशक के मध्य में वैज्ञानिकों ने पहली बार यह चेतावनी दी कि मानवीय गतिविधियों के कारण ओजोन परत धीरे-धीरे पतली होती जा रही है।
इसके बाद, 1985 में वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में एक बहुत बड़े छेद (क्षरण) का पता चला। इस खोज ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। शोध से यह बात सामने आई कि इस विनाश के पीछे कुछ मानव-निर्मित रसायन जिम्मेदार हैं, जिन्हें 'ओजोन क्षयकारी पदार्थ' कहा जाता है। इनमें सबसे प्रमुख रसायन निम्नलिखित हैं।पहला क्लोरोफ्लोरोकार्बन-- यह रसायन रेफ्रिजरेटर, वातानुकूलन (एसी) उपकरणों, गद्दों के निर्माण और विभिन्न प्रकार के स्प्रे में शीतलक के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था। दूसरे है हैलोन्स-- इसका उपयोग मुख्य रूप से आग बुझाने वाले संयंत्रों (अग्निशामक उपकरणों) में किया जाता था। तीसरे कार्बन टेट्राक्लोराइड और मिथाइल क्लोरोफॉर्म-- इनका उपयोग औद्योगिक विलायक और सफाई के कार्यों में किया जाता था।
चौथा मिथाइल ब्रोमाइड-- इसका उपयोग कृषि कार्यों में कीटनाशक के रूप में होता था। जब ये रसायन हवा में मुक्त होते हैं, तो ये धीरे-धीरे समतापमंडल में पहुँच जाते हैं। वहाँ सूर्य की तेज पराबैंगनी किरणें इन्हें तोड़ देती हैं, जिससे क्लोरीन और ब्रोमीन के परमाणु अलग हो जाते हैं। क्लोरीन का केवल एक परमाणु ओजोन के एक लाख से अधिक अणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि यह परत इतनी तेजी से नष्ट होने लगी।
ओजोन परत के नष्ट होने के घातक परिणाम भी हो सकते हैं। यदि ओजोन परत कमजोर होती है और पराबैंगनी किरणें सीधे पृथ्वी तक पहुँचती हैं, तो इसके परिणाम अत्यंत भयानक और विनाशकारी हो सकते हैं। इसके प्रमुख कुप्रभाव इस प्रकार हैं। पहला-- मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव-- पराबैंगनी किरणों का सीधा संपर्क मानव शरीर के लिए अत्यंत घातक है। इससे त्वचा के कैंसर की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त, यह आँखों को भारी नुकसान पहुँचाती है, जिससे मोतियाबिंद जैसी बीमारियाँ असमय ही लोगों को अपना शिकार बनाने लगती हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये किरणें मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को कमजोर कर देती हैं, जिससे शरीर संक्रामक बीमारियों से लड़ने में अक्षम हो जाता है। दूसरे-वनस्पतियों और कृषि पर प्रभाव-- पेड़-पौधे पर्यावरण का आधार हैं। पराबैंगनी किरणों के कारण पौधों की प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे पौधों का विकास रुक जाता है, फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आती है और अनाजों की पोषण क्षमता कम हो जाती है।
यह स्थिति वैश्विक खाद्य संकट को जन्म दे सकती है। तीसरे- समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति-- समुद्रों में पाए जाने वाले अत्यंत सूक्ष्म जीव, जिन्हें प्लवक (फाइटोप्लांकटन) कहा जाता है, समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार होते हैं। ये जीव पराबैंगनी विकिरण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। इनके नष्ट होने से मछलियों और अन्य समुद्री जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है, जिससे पूरा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है। चौथे- जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन-- ओजोन परत का क्षरण अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) को भी बढ़ावा देता है। ओजोन को नष्ट करने वाली गैसें स्वयं में बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं, जो पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में कार्बन डाइऑक्साइड से भी कई गुना अधिक प्रभावी होती हैं।
ओजोन दिवस के इतिहास और वैश्विक समझौते की बात करें तो ओजोन परत के संकट की गंभीरता को समझते हुए विश्व के तमाम देशों ने एकजुट होकर कदम उठाने का निर्णय लिया। इस दिशा में दो अत्यंत महत्वपूर्ण वैश्विक समझौते हुए, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के इतिहास को बदल कर रख दिया है। पहला वियना कन्वेंशन (1985)-- ओजोन परत के संरक्षण के लिए सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय प्रयास 1985 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में हुआ।
इसे 'ओजोन परत के संरक्षण के लिए वियना कन्वेंशन' कहा जाता है। इसके तहत दुनिया के देशों ने ओजोन परत की निगरानी और इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की। दूसरा है मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987)-- यह पर्यावरण के इतिहास का सबसे सफल और ऐतिहासिक समझौता माना जाता है। 16 सितंबर 1987 को कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसका मुख्य उद्देश्य ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले रसायनों के उत्पादन और उपभोग को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह समाप्त करना था।
विश्व ओजोन दिवस की शुरुआत वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसी ऐतिहासिक तारीख (16 सितंबर) की स्मृति में प्रतिवर्ष 'विश्व ओजोन दिवस' मनाने की घोषणा की, ताकि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के संकल्पों को हमेशा याद रखा जा सके। तीसरे किगाली संशोधन (2016)-- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को और अधिक मजबूत बनाने के लिए वर्ष 2016 में रवांडा के किगाली शहर में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया। इसके तहत हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी) के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने का संकल्प लिया गया।
यद्यपि एचएफसी ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुँचाता, लेकिन यह एक बहुत ही शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो वैश्विक तापन बढ़ाती है। इसलिए इसे रोकना भी अत्यंत आवश्यक माना गया। वर्तमान परिदृश्य में इस वर्ष 2026 की थीम और प्रगति देखें तो वैज्ञानिकों और वैश्विक सरकारों के निरंतर प्रयासों का परिणाम अब दिखाई देने लगा है। वर्ष 2026 में विश्व ओजोन दिवस की आधिकारिक थीम “शीतल ग्रह के लिए वैश्विक कार्रवाई – मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन के तहत सतत शीतलन के 10 वर्ष पूरे होने का जश्न” निर्धारित की गई है। यह विषय ओजोन संरक्षण को टिकाऊ शीतलन और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों से जोड़ता है।
संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 99 प्रतिशत ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया है। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। वर्ष 2000 के बाद से ओजोन परत में प्रति दशक 1 से 3 प्रतिशत की दर से सुधार देखा गया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि इसी प्रकार प्रयास जारी रहे, तो वर्ष 2050 तक ओजोन परत की स्थिति 1980 से पहले के स्तर पर वापस आ जाएगी। अंटार्कटिका के ऊपर बना ओजोन छिद्र भी धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है और इसके वर्ष 2066 तक पूरी तरह ठीक होने की संभावना व्यक्त की गई है।
यह सफलता यह सिद्ध करती है कि यदि संपूर्ण विश्व किसी साझा संकट के खिलाफ पूरी निष्ठा से एकजुट हो जाए, तो बड़े से बड़े पर्यावरणीय संकट को भी टाला जा सकता है। भारत के प्रयास और प्रतिबद्धता देखें तो भारत पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमेशा से ही संवेदनशील और अग्रणी रहा है। भारत ने 1992 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की पुष्टि की थी और तब से इसके क्रियान्वयन में अनुकरणीय भूमिका निभाई है। भारत ने ओजोन क्षयकारी पदार्थों के चरणबद्ध समापन के लिए राष्ट्रीय रणनीतियाँ तैयार की हैं।
देश में क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) के उत्पादन और उपयोग को बहुत पहले ही सफलतापूर्वक समाप्त किया जा चुका है। भारत सरकार ने देश में पर्यावरण-अनुकूल और ऊर्जा-कुशल शीतलन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिए 'इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान' (भारतीय शीतलन कार्य योजना) की शुरुआत की है। इसके तहत एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर उद्योगों में ऐसे विकल्पों का उपयोग किया जा रहा है जिससे ओजोन परत और वैश्विक तापमान दोनों सुरक्षित रहें। अब बात एक नागरिक के रूप में हमारे अपने कर्तव्य की करें तो ओजोन परत का संरक्षण केवल सरकारों, वैज्ञानिकों या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है।
जब तक इस अभियान में आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक पूर्ण सफलता प्राप्त करना असंभव है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करके ओजोन परत के संरक्षण में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं। कैसे इस पर भी ध्यान दें- पर्यावरण-अनुकूल उपकरणों का चयन करके-- जब भी हम नया रेफ्रिजरेटर या एयर कंडीशनर खरीदें, तो हमेशा यह सुनिश्चित करें कि वह उपकरण ओजोन-अनुकूल और ऊर्जा-कुशल हो।
उपकरणों का नियमित रखरखाव करके-- घरों और वाहनों में लगे एयर कंडीशनर की समय-समय पर सर्विसिंग करवानी चाहिए ताकि उनमें से किसी भी प्रकार की गैस का रिसाव (लीकेज) न हो। रासायनिक कीटनाशकों का सीमित उपयोग करके-- कृषि कार्यों में अत्यधिक रसायनों और विशेषकर मिथाइल ब्रोमाइड युक्त कीटनाशकों के स्थान पर जैविक खादों और प्राकृतिक कीट नियंत्रण विधियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। वाहनों का सीमित उपयोग करके-- वाहनों से निकलने वाला धुआँ धरातलीय ओजोन प्रदूषण को बढ़ाता है।
इसलिए जहाँ तक संभव हो, सार्वजनिक परिवहन, साइकिल का उपयोग करें या कार-पूलिंग को अपनाएँ। प्लास्टिक और कचरे को जलाने पर रोक से-- खुले में प्लास्टिक, टायर या रासायनिक कचरा जलाने से कई प्रकार की हानिकारक गैसें निकलती हैं जो वायुमंडल को दूषित करती हैं। कचरे का सही तरीके से निपटान करना आवश्यक है। जागरूकता का प्रसार करके-- अपने मित्रों, परिवार और समाज के लोगों को ओजोन परत के महत्व और इसे होने वाले नुकसानों के प्रति जागरूक करें। विशेषकर बच्चों को प्रकृति से प्रेम करना और उसका सम्मान करना सिखाएं। अंतिम तौर पर यह जान लेना कि
ओजोन परत प्रकृति का एक अनमोल उपहार है, जो पृथ्वी के समस्त जीवन को अपनी आगोश में समेटकर उसकी रक्षा करता है। ओजोन परत में हुआ सुधार इस बात का जीवंत प्रमाण है कि मानवीय चेतना और वैश्विक एकजुटता से विनाश के मार्ग को बदला जा सकता है। विश्व ओजोन दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव या कैलेंडर का कोई साधारण दिन नहीं है, बल्कि यह आत्म-मंथन और संकल्प का दिन है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी हमारी माता है और इसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। यदि हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, हरा-भरा और स्वस्थ ग्रह सौंपना चाहते हैं, तो हमें आज ही उपभोक्तावादी मानसिकता को छोड़कर सतत विकास के मार्ग को अपनाना होगा। आइए, इस ओजोन दिवस पर हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनेंगे, प्रदूषण को कम करने का प्रयास करेंगे और अपनी इस जीवनदायिनी नीली ढाल को अक्षुण्ण बनाए रखने में अपना संपूर्ण योगदान देंगे। क्योंकि यदि ओजोन सुरक्षित है, तभी पृथ्वी पर जीवन का कल सुरक्षित है।