हर मरीज को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और सुरक्षा तक पहुंच दिलाना जरूरी, जानिए विश्व रोगी सुरक्षा दिवस की खास बातें

प्रत्येक व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा सुरक्षा का अधिकार है। लेकिन क्या यह अधिकार हर व्यक्ति के हिस्से सहज संभव हो रहा है। इसी गंभीर समस्या पर जागरूकता हेतु हर साल 17 सितंबर को दुनियाभर में विश्व रोगी सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। इस आलेख के लेखक डॉ. प्रितम भि. गेडाम हैं जो महाराष्ट्र सरकार से सम्मानित लेखक हैं।
तन्वी परियानी का मामला और स्वास्थ्य सेवाओं की सच्चाई
अभी हाल ही में समाचारपत्रों में एक खबर पढ़ी थी। कोटा राजस्थान की 15 वर्षीय तन्वी परियानी नामक लड़की गंभीर हृदय रोग से पीड़ित थी। वर्ष 2014 से 13 साल तक एम्स दिल्ली में ऑपरेशन की राह देखते-देखते 1 सितंबर को उसका देहांत हो गया। इन 13 सालों में तन्वी के परिवार के लाखों रूपये खर्च हुए। ऑपरेशन की नई तारीखे मिलती रही, लेकिन ऑपरेशन नहीं हुआ। तन्वी के पिता ने अस्पताल पर दोष लगाया और कहा कि, गरीब हूँ, लेकिन बेटी के मौत के बाद भी न्याय के लिए लड़ता रहूँगा। तन्वी के मौत के बाद एम्स ने इलाज और मौत के मामले की समीक्षा के लिए जाँच समिति गठित की हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली
भारत देश गांवों में बसता है, क्योंकि बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है। लेकिन रोजाना ग्रामीण क्षेत्र में होनेवाली अनेक हृदय विदारक घटनायें इंसानियत को शर्मसार कर देते हैं। मध्यप्रदेश के बालाघाट के आदिवासी क्षेत्र के 30 से ज्यादा बच्चों के मौत की खबरों ने विचलित कर दिया। ऐसी दुखद घटनायें स्वास्थ्य सुविधा सुरक्षा पर सीधे सवाल खड़े करती हैं। अभी हाल ही में तेलंगाना के कोलमगुडा ग्रामीण भाग में सात महीने की गर्भवती महिला गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। खराब सड़क और कोई सुविधा न होने के कारण गांव के लोगों ने उफनती हुयी नदी पार करके कामचलाऊ स्ट्रेचर बनाकर उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया। यह केवल एक घटना नहीं है, रोजाना ऐसी अनेक घटनाएं गांवों में घटित होती है। बहुत से भागों में सड़कें तक नहीं होती, कि स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच सकें। वक्त पर उपचार न मिलने के कारण हर साल बड़ी संख्या में लोग जान गवाते हैं। ग्रामीण भागों के स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी तो अक्सर बनी ही रहती है, अत्याधुनिक सेवा-सुविधा तो जैसे सपना ही हैं।
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 और मुख्य चुनौतियां
हर साल 17 सितंबर को दुनियाभर में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और सुरक्षा मिलें, इसलिए विश्व रोगी सुरक्षा दिवस मनाया जाता हैं। इस साल 2026 की थीम गैर-संचारी रोगों के लिए सुरक्षित देखभाल है एवम इसका आधिकारिक नारा जीवन के लिए सुरक्षित देखभाल यह हैं। भारत देश में मरीज सुरक्षा के सामने स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक बोझ, कर्मचारियों की भारी कमी, अत्याधुनिक संसाधनों की कमी और रोगी-सेवा प्रदाता के बीच उच्च अनुपात जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। हमारे देश में जनसंख्या के मुकाबले स्वास्थ्य चिकित्सकों की भारी कमी है। भले ही महानगरों और शहरों में पांच सितारा होटल जैसे नवनवीन निजी अस्पताओं का शुभारंभ हो रहा है, सरकार की ओर से भी चिकित्सा सेवा को मजबूत बनाने में जोर दिया जा रहा है। फिर भी अत्यधिक बढ़ती बीमारियां देश की आबादी पर तेजी से शिकंजा कस रही है, इसमें गरीब और मध्यम वर्ग विशेषत ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों को संघर्ष करना पड़ता हैं। एम्बुलेंस के लिए पैसे न होने के कारण अपनों के लाशों को कंधे पर ढोते परिजन को हमने बहुत बार देखा हैं।
चिकित्सा देखरेख के बिना होती हैं देश में आधी मौतें
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में हुई कुल मौतों में से लगभग आधी मौतें किसी प्रशिक्षित व्यावसायिक की मेडिकल देखरेख के बिना हुईं। 2024 में ऐसी मौतों का हिस्सा 45.5 प्रतिशत था, जो 2020 में दर्ज 18 फीसदी से दोगुने से भी ज़्यादा है और 2021 से यह कुल मौतों के लगभग आधे के बराबर बना हुआ हैं। इस श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जिन्हें मृत्यु के समय कोई चिकित्सा सहायता नहीं मिली, या जिनकी देखभाल केवल एक अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा की गई थी। 2024 में, प्रशिक्षित चिकित्सा देखभाल के बिना होने वाली मौतों का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों में काफी अधिक, 48.9 प्रतिशत, शहरी क्षेत्रों में, 36.1 फीसदी था.
वैश्विक स्तर पर असुरक्षित देखभाल के आंकड़े
विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुसार, स्वास्थ्य देखभाल के दौरान हर 10 में से लगभग 1 मरीज़ को नुकसान पहुँचता है और असुरक्षित देखभाल के कारण हर साल 30 लाख से ज़्यादा मौतें होती हैं। कम और मध्यम आय वाले देशों में, असुरक्षित देखभाल के कारण हर 100 में से 4 लोगों की मौत हो जाती हैं। 50 फीसदी से ज़्यादा नुकसान को रोका जा सकता है, इस नुकसान का आधा हिस्सा दवाओं से जुड़ी समस्याओं के कारण होता हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार, प्राइमरी और एम्बुलेटरी सेटिंग्स में हर 10 में से 4 मरीज़ों को नुकसान पहुँचता है, जबकि इस नुकसान में से 80 फीसदी तक को रोका जा सकता हैं। जैसे दवा से जुड़ी गलतियाँ, असुरक्षित सर्जिकल प्रक्रियाएँ, हेल्थ केयर से जुड़े संक्रमण, जाँच या डायग्नोसिस में गलतियाँ, मरीज़ का गिरना, प्रेशर अल्सर, मरीज़ की गलत पहचान, असुरक्षित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और वीनस थ्रोम्बोएम्बोलिज्म। मरीज़ को होने वाले नुकसान से ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ में कमी आ सकती हैं। ग्लोबल स्तर पर, इस नुकसान की अप्रत्यक्ष लागत हर साल खरबों अमेरिकी डॉलर होती हैं।
भारत में मेडिकल लापरवाही और नकली दवाओं का साम्राज्य
हेल्थवॉइस - मेडिसर्कल मीडिया वेंचर जर्नल में प्रकाशित रिसर्च कहती है कि, दुनिया के सबसे बड़े और सबसे जटिल स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में से एक होने के नाते, भारत पर इस बोझ का एक बड़ा हिस्सा हैं। 18वीं सालाना मेडलीगल रिव्यू के अनुसार, अकेले 2025 में भारत में मेडिकल लापरवाही के 65,000 मामले दर्ज किए गए। ऐसे मामलों से सामने आए जोखिम एक बड़ी वैश्विक समस्या को दर्शाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि, असुरक्षित मेडिकल देखभाल के कारण हर साल अनुमानित 138 मिलियन मरीज़ों को नुकसान पहुँचता हैं। आजकल हर क्षेत्र में नकली उत्पाद की भरमार है, दवा बाजार भी इससे अछूता नहीं। नकली दवाओं का साम्राज्य तेजी से फलफूल रहा हैं। नकली दवाओं के नेटवर्क और उत्पादन में तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी के कारण, नकली दवाओं को रोकने वाली पैकेजिंग का ग्लोबल मार्केट 2026 में 129 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों में नकली दवाओं का जूरीरा मिलने की वारदातें भी हो चुकी हैं। कुछ समय पहले ही सरकारी नागपुर मेडिकल महाविद्यालय व अस्पताल में यह पुष्टि हुई थी।
चिकित्सा व्यवस्था में बदलाव और नैतिक जिम्मेदारियां
एक दौर था, जब चिकित्सक हाथों की नब्ज, आंखे, जबान देखकर ही बीमारियों का पता लगाते थे, शायद ही कभी टेस्ट करते थे। लेकिन आज चिकित्सालय में जाने पर अधिकतर बार पहले टेस्ट लिखकर दिया जाता है, फिर रिपोर्ट आने पर इलाज होता हैं। बहुत बार तो टेस्ट कहा करना और दवा कहाँ से लेना है यह भी तय होता हैं। चिकित्सक सरकारी अस्पतालों में सेवा देने के बजाय निजी अस्पतालों में कार्य को प्राथमिकता देते हैं। अधिकतर पाश्चिमात्य और विकसित देशों में चिकित्सक को कड़े कानून के तहत पूरी ईमानदारी और कौशल से स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य करने पड़ते है, मरीज के इलाज के दौरान थोडीसी भी गलती या लापरवाही पर चिकित्सक को जिम्मेदार ठहराते हुए उनका लाइसेंस जप्त किया जाता है और सजा दी जाती हैं। लेकिन हमारे देश में इलाज के दौरान होनेवाली लापरवाही पर ऐसी जवाबदेही तय नहीं है जो पारदर्शकता दर्शाये। बाकी क्षेत्रों की तरह ही स्वास्थ्य क्षेत्र में भी धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, जालसाजी और अनैतिकता की घटनाओं के बारे में खबरें देखने-सुनने को मिलती हैं। सोशल मीडिया के दौर में तो आये दिन इस क्षेत्र के वीडियो वायरल होते हैं। लेकिन दुनिया में केवल यही एक ऐसा क्षेत्र है, जहां चिकित्सक को अमूल्य जान बचानेवाले भगवान का दर्जा दिया जाता हैं। हर मरीज को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा बेहद सहज ढंग से मिलनी चाहिए। केवल पैसों की कमी की वजह से किसी भी मासूम को जान गवाना ना पड़े। ग्रामीण, दूर-दराज, पिछड़े इलाकों में भी स्वास्थ्य सुविधाओं की पकड़ मजबूत होनी चाहिए। सबको स्वास्थ्य सुविधा का अधिकार है, तो हर एक तक उसकी पहुंच भी होनी चाहिए।