विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस: जानिए आत्महत्या के कारण, आंकड़े और रोकथाम के उपाय

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस-जरूरत आत्महत्या पर दृष्टिकोण बदलने की है...
लेखक -=सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्
जीवन प्रकृति का सबसे अनमोल और खूबसूरत उपहार है। संघर्ष, उतार-चढ़ाव, सुख और दुख इस जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के जीवन में मानसिक पीड़ा, हताशा और अंधकार इस कदर हावी हो जाता है कि उसे अपने अस्तित्व को समाप्त करने में ही मुक्ति दिखाई देती है, तो यह स्थिति समाज, परिवार और संपूर्ण मानवता की सामूहिक विफलता को दर्शाती है।
आत्महत्या किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय मात्र नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। इसी संकट की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित करने और अनमोल जिंदगियों को बचाने के संकल्प के साथ हर वर्ष 10 सितंबर को 'विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस' मनाया जाता है।विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की स्थापना वर्ष 2003 में हुई थी।
स्टॉकहोम में अंतर्राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम संघ (IASP) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ (WFMH) के सहयोग से इस ऐतिहासिक पहल की शुरुआत की थी। जिसका उद्देश्य एक ऐसा वैश्विक मंच तैयार करना था जहां आत्महत्या से जुड़े सामाजिक कलंक को तोड़ा जा सके, जन-जागरूकता फैलाई जा सके और सरकारों को उचित नीतियां बनाने के लिए प्रेरित किया जा सके।
शुरुआत में इसमें कुछ ही देश शामिल थे, लेकिन वर्तमान में दुनिया के सौ से अधिक देशों में इस दिन विभिन्न जागरूकता कार्यक्रमों, सेमिनारों और अभियानों का संचालन किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में हर साल 7,20,000 से अधिक लोग आत्महत्या के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।
यह आंकड़ा भयावह है क्योंकि यह दर्शाता है कि हर चालीस सेकंड में दुनिया के किसी न किसी कोने में एक व्यक्ति अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेता है।15 से 29 वर्ष के युवाओं में मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है।
यह आयु वर्ग किसी भी देश का भविष्य होता है, और इस वर्ग में ऐसी प्रवृत्ति राष्ट्रों के विकास के लिए एक बड़ा आघात है। आश्चर्यजनक रूप से, आत्महत्या के कुल मामलों में से लगभग 77 फीसदी मामले कम और मध्यम आय वाले देशों में दर्ज किए जाते हैं, जहां मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं बुनियादी स्तर पर भी उपलब्ध नहीं हैं। प्रत्येक सफल आत्महत्या के पीछे कम से कम बीस या उससे अधिक आत्महत्या के असफल प्रयास होते हैं, जो यह बताते हैं कि मानसिक अवसाद से जूझ रहे लोगों की संख्या कितनी विशाल है।एक बहुआयामी विश्लेषण में यह समझा गया कि आत्महत्या की घटना किसी एक तात्कालिक कारण का परिणाम नहीं होती।
यह जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कारकों का एक जटिल ताना-बाना होती है। इसके कारणों में मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कारण मूल रूप में हैं। मानसिक अवसाद आत्महत्या का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है। जब मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है, तो व्यक्ति को हर तरफ निराशा ही निराशा दिखाई देती है।अत्यधिक चिंता, पैनिक अटैक्स और मूड में तीव्र बदलाव व्यक्ति को तार्किक रूप से सोचने की क्षमता से वंचित कर देते हैं।
मतिभ्रम या वास्तविकता से संपर्क टूटने की स्थिति में भी लोग आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। सामाजिक और पारिवारिक कारक भी हैं।आधुनिक, महानगरीय और डिजिटल जीवनशैली ने इंसानों को आपस में जोड़ने के बजाय दूर कर दिया है। अकेलेपन की भावना व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है। परिवार में लगातार होने वाले झगड़े, शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना व्यक्ति के सुरक्षित आश्रय को ही नर्क बना देते हैं। प्रेम में असफलता, तलाक या किसी अत्यंत करीबी व्यक्ति (माता-पिता, जीवनसाथी) की मृत्यु का गहरा सदमा सहन न कर पाना।
आर्थिक और व्यावसायिक कारण भी इसके प्रमुख कारणों में है। किसानों द्वारा कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करना या व्यापारियों का दिवालिया हो जाना इसका प्रमुख उदाहरण है।तो योग्य होने के बावजूद रोजगार न मिलना या नौकरी छूट जाने का डर भी।परीक्षाओं में कम अंक आने का डर या असफल होने पर समाज और माता-पिता का सामना न कर पाने का खौफ (विशेषकर भारत में कोटा जैसे कोचिंग हबों में छात्रों की आत्महत्याएं)। इसके अलावा आधुनिक कारणों में डिजिटल युग की चुनौतियां जैसे साइबर बुलिंग, सोशल मीडिया पर किसी को ट्रोल करना, अश्लील टिप्पणियां करना या ब्लैकमेल करना युवाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
तुलना की संस्कृति: सोशल मीडिया पर दूसरों के "परफेक्ट जीवन" को देखकर अपनी वास्तविक जिंदगी से असंतुष्ट होना और हीनभावना का शिकार होना। वर्ष 2024 से 2026 की थीम है -"आत्महत्या पर दृष्टिकोण बदलना" विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और IASP ने हाल के वर्षों के लिए (आत्महत्या पर दृष्टिकोण बदलना) थीम को चुना है। इसके तहत (बातचीत की शुरुआत करें) का नारा दिया गया है।
वर्तमान थीम का मुख्य स्तंभ "समाज में अपेक्षित बदलाव, कलंक को मिटाना," मानसिक बीमारी को पागलपन न मानकर सामान्य बीमारी समझना। खुला संवाद, आत्महत्या के विचारों पर बिना किसी संकोच के बात करना। सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण पीड़ित को कोसने या कमजोर बताने के बजाय उसकी पीड़ा को सुनना। मदद मांगने की संस्कृति थेरेपी या काउंसलर के पास जाने को बहादुरी का कदम मानना।
इस थीम का मुख्य संदेश यह है कि हमें उस चुप्पी को तोड़ना होगा जिसने मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को जकड़ रखा है। हमें समाज को एक ऐसा सुरक्षित वातावरण देना होगा जहां कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात बिना किसी डर के साझा कर सके। चेतावनी के संकेत, संकट को पहचानना जरूरी है। ज्यादातर मामलों में, आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपने कदम उठाने से पहले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ संकेत जरूर देता है।
यदि समाज, मित्र और परिवार इन संकेतों के प्रति संवेदनशील हों, तो समय रहते उसकी जान बचाई जा सकती है: व्यवहार में अचानक बदलाव: बहुत हंसमुख रहने वाले व्यक्ति का अचानक शांत और अलग-थलग हो जाना। अलविदा कहने जैसी बातें, अपनी पसंदीदा चीजों को दूसरों को दे देना, वसीयत लिखने लगना या ऐसी बातें करना जैसे "अब मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं करूँगा" या "मेरे जाने के बाद अपना ख्याल रखना।" आत्महत्या के तरीकों, दवाओं के ओवरडोज या फंदे आदि के बारे में इंटरनेट पर खोजना।नशीले पदार्थों का अत्यधिक सेवन शुरू कर देना अचानक से शराब, सिगरेट या अन्य नशीली दवाओं का सेवन बढ़ा देना। गहरी निराशा व्यक्त करना, बातचीत में बार-बार यह कहना कि "मेरा जीवन व्यर्थ है", "मुझसे कुछ नहीं हो सकता" या "मैं सब पर बोझ हूँ।" दोस्तों, परिवार और उन गतिविधियों से पूरी तरह दूरी बना लेना जिन्हें वे कभी पसंद करते थे। आत्महत्या रोकथाम में विभिन्न हितधारकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है-- इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा।प्रथम में है परिवार की भूमिका, परिवार किसी भी व्यक्ति की पहली ढाल होता है। माता-पिता को बच्चों पर अकादमिक प्रदर्शन के लिए अत्यधिक दबाव बनाने से बचना चाहिए।
घर में एक ऐसा माहौल होना चाहिए जहां बच्चे अपनी असफलताओं को भी बिना किसी डर के साझा कर सकें। यदि परिवार का कोई सदस्य उदास दिख रहा है, तो उसे "कमजोर" या "अटेंशन सीकर" कहने के बजाय गले लगाएं और उसकी बात सुनें।दूसरे है शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका-- स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए। छात्रों को केवल करियर की दौड़ में भागना ही नहीं, बल्कि असफलताओं को संभालना भी सिखाया जाना चाहिए।
परीक्षाओं के दिनों में विशेष काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जाने चाहिए। तीसरे रूप में मीडिया की भी जिम्मेदार भूमिका बनती है-- मीडिया को आत्महत्या की खबरों को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए। आत्महत्या के तरीकों का विस्तृत विवरण देना या घटनास्थल की असंवेदनशील तस्वीरें दिखाना 'वेरथर इफेक्ट' देखा-देखी आत्महत्या करना) को बढ़ावा देता है। खबरों के अंत में हमेशा आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर साझा किए जाने चाहिए।
चौथे सरकार और नीति निर्माताओं की भूमिका-- सरकारों को मानसिक स्वास्थ्य के बजट को बढ़ाना होगा। जिला स्तर पर मनोरोग चिकित्सालय और मुफ्त काउंसलिंग केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। भारत सरकार द्वारा 'मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017' के तहत आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर करना एक बेहद सराहनीय कदम था, जिससे पीड़ितों को प्रताड़ना के बजाय चिकित्सा सहायता मिलना सुनिश्चित हुआ।
इसके लिए मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के व्यावहारिक उपाय भी जरूरी हैं। एक व्यक्ति के तौर पर हम अपने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं-- शारीरिक गतिविधि से शरीर में एंडोर्फिन और सेरोटोनिन जैसे 'फील-गुड' हार्मोन का स्राव होता है, जो तनाव को कम करते हैं। सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले समय को सीमित करें और प्रकृति तथा वास्तविक दोस्तों के साथ समय बिताएं।
पर्याप्त नींद और संतुलित आहार लें 7-8 घंटे की गहरी नींद और पौष्टिक भोजन मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखते हैं। अभिव्यक्ति की आदत डालें डायरी लिखें, पेंटिंग करें, संगीत सुनें या किसी भी रूप में अपनी भावनाओं को बाहर निकालें। भावनाओं को दबाना खतरनाक हो सकता है। यदि कोई संकट में हो, तो क्या करें? (तत्काल कार्य योजना) यदि आपको लगता है कि आपका कोई मित्र या परिचित आत्मघाती विचारों से जूझ रहा है, तो इन चार चरणों का पालन करें-- सीधे पूछें: संकोच न करें।
उनसे सीधे पूछें, "क्या तुम्हारे मन में खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हैं?" पूछने से उनका दर्द कम होता है, विचार बढ़ता नहीं है। बिना जज किए सुनें: उनकी बातों का मजाक न उड़ाएं, न ही उन्हें उपदेश दें
जैसे- "तुम्हारे पास सब कुछ तो है, तुम क्यों दुखी हो?"।
बस उन्हें ध्यान से सुनें। उन्हें अकेला न छोड़ें: यदि खतरा गंभीर लग रहा है, तो उन्हें किसी भी परिस्थिति में अकेला न छोड़ें। उनके पास से खतरनाक वस्तुएं (दवाएं, तेज धारदार चीजें) हटा दें।
पेशेवर मदद लें: उन्हें तुरंत किसी मनोवैज्ञानिक, काउंसलर या नजदीकी अस्पताल ले जाएं।
आपातकालीन हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल करें। भारत में उपलब्ध प्रमुख हेल्पलाइन सेवाएं (भारत सरकार एवं एनजीओ) तनाव या संकट के समय उन नंबरों पर संपर्क करके मुफ्त और गोपनीय सहायता प्राप्त की जा सकती है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह कि विश्व सुसाइड प्रिवेंशन डे केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह एक जीवनदायी प्रतिज्ञा है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे आस-पास मुस्कुराते हुए चेहरों के पीछे गहरा दर्द छिपा हो सकता है। एक संवेदनशील समाज के रूप में हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम एक-दूसरे के प्रति अधिक दयालु, सहानुभूतिपूर्ण और मददगार बनें। आत्महत्या का समाधान कभी भी मौत नहीं हो सकता,
क्योंकि हर रात के बाद एक नया सवेरा निश्चित है। यदि हम अपने दृष्टिकोण को बदलते हैं, कलंक की दीवारों को ढहाते हैं और खुलकर संवाद करते हैं, तो हम अनगिनत बुझते हुए दीयों को फिर से रोशन कर सकते हैं। आइए, इस विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम न तो स्वयं कभी हिम्मत हारेंगे और न ही अपने आस-पास किसी को अकेलेपन के अंधकार में खोने देंगे। क्योंकि हर जीवन कीमती है, और कल बहुत देर हो सकती है।