मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव पर साधा निशाना, सपा प्रमुख की कार्यशैली और पीडीए फॉर्मूले पर उठाए गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। हाल ही में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी ने सपा प्रमुख पर कड़ा तंज कसते हुए उनकी कार्यशैली और दिनचर्या पर सवाल खड़े किए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कुछ लोग जीवन भर बच्चे ही बने रहते हैं और बबुआ भी यही करते थे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वे दोपहर 12 बजे सोतेकर उठते थे, दो बजे तैयार होते थे, पांच बजते-बजते उनके जिम जाने का समय हो जाता था और शाम 7 बजे महफिल सज जाती थी। देश और प्रदेश के बारे में सोचने के लिए उनके पास समय नहीं होता था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछली सपा सरकार के कार्यकाल में महिलाओं को सबसे बड़ा खतरा सपाइयों से ही था। इस प्रकार की बयानबाजी के जरिए सत्ता पक्ष विपक्ष को जमीनी हकीकत से कटा हुआ और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के रूप में चित्रित कर रहा है।
दूसरी ओर, अखिलेश यादव की वर्तमान राजनीतिक रणनीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर झुकाव मान रहे हैं। इस चक्कर में उन्होंने पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक की सियासत को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। यही कारण है कि एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर हमलावर रहते हैं। ओवैसी और कुछ आलोचकों का तर्क है कि जो नेता अपने मूल धार्मिक और वैचारिक दायरे में स्पष्ट नहीं है, वह दूसरों के लिए कितना वफादार साबित होगा। मुस्लिम समाज के एक वर्ग में यह भावना घर कर रही है कि सपा केवल चुनावों के वक्त उनके वोटों का इस्तेमाल करती है, लेकिन उनके वास्तविक मुद्दों पर खुलकर सामने आने से बचती है। यह असमंजस समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है क्योंकि पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण ही पार्टी की राजनीतिक ताकत का मुख्य आधार रहा है।
अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए पीडीए का नया राजनीतिक मंत्र गढ़ा था, लेकिन इसके बार-बार बदलते अर्थों ने राजनीतिक गलियारों में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। कभी पीडीए का मतलब पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक बताया जाता है तो कभी इसका मतलब पिछड़ा, दलित और आधी आबादी बताया जाता है। हाल ही में उन्होंने अपने पीडीए में पीडी को पंडितों का शॉर्ट फॉर्म बता दिया, जिससे इस फॉर्मूले की वैचारिक स्पष्टता पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। आलोचकों का मानना है कि यह सब केवल तात्कालिक चुनावी नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। इसके साथ ही, हालिया दौर में उनके जनप्रतिनिधियों द्वारा संसद से लेकर विधानसभा तक किए जाने वाले हंगामे और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमाओं को लांघने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं और जब मीडिया द्वारा उनसे कड़े सवाल पूछे जाते हैं तो उसे गोदी मीडिया बता दिया जाता है।