आत्मनिर्भरता के नाम पर लूट-खसोट , सुभाष चंद्रा केस

आत्मनिर्भरता के नाम पर लूट-खसोट

(आलेख : एम ए बेबी, अनुवाद : संजय पराते)
हर सौ रुपये के कर्ज के बदले सिर्फ़ तीन पैसे चुकाइए। संक्षेप में कहें तो, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने सुभाष चंद्रा के मामले में यही आदेश दिया है। 25 अगस्त, 2026 को एनसीएलटी ने एक योजना को मंजूरी दी, जिसके तहत एसेल ग्रुप और ज़ी के संस्थापक को 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकार किए गए दावों को निपटाने के लिए सिर्फ़ 6.25 करोड़ रुपये चुकाने होंगे, यानी 99.97 फ़ीसदी की भारी कटौती (जिसे 'हेयरकट' कहा जाता है)। उन्हें कर्ज़ देने वाले कोई निजी सट्टेबाजी नहीं, बल्कि आम भारतीयों की बचत का पैसा रखने वाले संस्थान हैं – जैसे एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, केनरा बैंक और यूनियन बैंक। इनमें एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस का 1,322 करोड़ रुपये का दावा घटकर सिर्फ़ 38 लाख रुपये रह गया है।
2017-18 में चंद्रा की संपत्ति 40,000-46,000 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन दिवालिया होने की प्रक्रिया के समय यह कथित तौर पर घटकर 31.79 करोड़ रुपये रह गई ; ट्रिब्यूनल के सामने संपत्ति का कोई विस्तृत ब्यौरा भी पेश नहीं किया गया। यह योजना लेनदारों के 80.81 प्रतिशत वोटों से पास हुई, जिसमें एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक और यूनियन बैंक के विरोध को दरकिनार कर दिया गया। 'इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' (दिवाला और दिवालियापन संहिता) को 2016 में प्रमोटरों को कर्ज से भागने से रोकने के उपाय के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन असल में यह उनके बचने का ही जरिया बन गया है। यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि मोदी सरकार की आर्थिक नीति का मूल सिद्धांत है, जिसे 'आत्मनिर्भर भारत' का नाम दिया गया है। कॉरपोरेट वर्ग के लिए आत्मनिर्भरता का मतलब है सरकारी खजाने, सरकारी बैंकों और सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता। वहीं, कामकाजी लोगों के लिए इसका मतलब है कि उन्हें अपना इंतजाम खुद करना होगा।
टैक्स, खदानें और राज्य
2019 में, वित्त मंत्री ने कॉर्पोरेट टैक्स के आधार दर को 30% से घटाकर 22% कर दिया, और नई विनिर्माण कंपनियों के लिए इसे 15% कर दिया – इससे सिर्फ पहले साल में ही अनुमानतः 1.45 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ। 2023-24 तक बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध 500 कंपनियों का प्रभावी टैक्स रेट 30% से ज़्यादा से घटकर 21.2% हो गया, जिससे उन्हें पांच सालों में 3.14 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई ; अगर केंद्रीय बजट में राजस्व में हुई कमी जैसी दूसरी छूटों को भी शामिल कर लिया जाए, तो यह आंकड़ा एक दशक में 8.22 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है – यह आधुनिक भारतीय इतिहास में अपनी तरह का एक ऐसा हस्तांतरण है, जिसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। कॉर्पोरेट्स को इतनी बड़ी रियायतें देने के बावजूद, जीडीपी में विनिर्माण का हिस्सा 2010 में लगभग 17% से घटकर 2023 में लगभग 13% रह गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि कॉर्पोरेशनों ने इस अतिरिक्त मुनाफे को अपनी जेब में रखा, कर्ज चुकाया, शेयर वापस खरीदे और लाभांश बांटे। बहरहाल, राजस्व में हुई इस कमी की भरपाई गरीबों पर जीएसटी लगाकर की गई।
जुलाई 2024 में, सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति राज्यों के पास है। दो साल के भीतर ही, केंद्र सरकार ने खदान और खनिज अधिनियम की धारा 9 डी के माध्यम से इसे निरस्त कर दिया, जिसके तहत राज्यों को केंद्र सरकार की शर्तों के अलावा खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोक दिया गया, और साथ ही 'खनिज-युक्त भूमि' का विस्तार करते हुए आदिवासी क्षेत्रों को बिना किसी पुनर्वास दायित्व के अपने अधीन कर लिया। एक भूतकालिक प्रभाव वाले प्रावधान के तहत टाटा स्टील और वेदांता जैसी कंपनियों पर बकाया 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिए गए, जैसा कि व्हिसलब्लोअरों ने आरोप लगाया था। सीधे शब्दों में कहें तो, कर न चुकाने वालों को इनाम मिल रहा है, जबकि करारोपण का पालन करने वाले करदाताओं को कुछ नहीं मिल रहा है। झारखंड और ओडिशा के लिए, जहां खनिजों से 75-80 प्रतिशत गैर-कर राजस्व प्राप्त होता है, यह उनकी अर्थव्यवस्थाओं को पंगु बना रहा है। वास्तव में, संघवाद को पंगु बनाया जा रहा है।
कर्ज़, मौत और रोजगार
बैंकों ने इन बारह सालों में बड़े व्यवसायों को दिए गए 9.95 लाख करोड़ रुपये के ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया है। सूचना के अधिकार के तहत मिली एक जानकारी के अनुसार, सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया ने छोटे उधार लेने वालों से बट्टे खाते में डाली गई रकम का 74 प्रतिशत वसूल किया है, लेकिन बड़े उधार लेने वालों से सिर्फ़ 15 प्रतिशत ही वसूल पाया है – और वह किसी भी बड़े गबनकर्ता का नाम बताने से इंकार करता है। छोटे कर्जदार के लिए एनसीएलटी जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, सिर्फ़ वसूली दलाल और राजस्व अधिकारी होते हैं। नवंबर 2024 में, नागपुर के किसान रवींद्र अलोने ने एक वित्त कंपनी द्वारा अपना ट्रैक्टर जब्त किए जाने के कुछ ही घंटों बाद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। जून 2026 में, नांदेड़ के गुनाजी पवार ने कर्ज के कारण जहर खा लिया। एनसीआरबी ने 2024 में किसानों और मज़दूरों की 10,546 आत्महत्याएँ दर्ज कीं – यानी हर घंटे एक आत्महत्या। सुभाष चंद्रा 22,000 करोड़ रुपये का मामला महज 6.25 करोड़ रुपये में निपटा लेते हैं ; जबकि विदर्भ का एक किसान कुछ हज़ार रुपयों के लिए जान दे देता है। बड़े बकायेदारों को सज़ा देने और छोटे कर्जदारों को बचाने के लिए दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी), 2016 की जगह एक मजबूत कानून लाने की ज़रूरत है।
मनरेगा कानून की जगह वीबी-ग्रामजी कानून ने ले ली है। रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या जुलाई 2025 में 1.42 करोड़ थी, जो घटकर जुलाई 2026 में 68.9 लाख रह गई – यानी एक साल में यह आधी हो गई। खेती-बाड़ी में काम रोकने की अवधि के ज़रिए, जिसे केंद्र सरकार तय करती है, ऐसा जानबूझकर किया गया है। वहीं दूसरी ओर, कॉर्पोरेट प्रोत्साहन बढ़ाए गए हैं ; उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन के रूप में 1.97 लाख करोड़ रुपये, रोजगार से जुड़े प्रोत्साहन के रूप में 1.07 लाख करोड़ रुपये, समुद्र मंथन प्रोत्साहन के रूप में 84,084 करोड़ रुपये, सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 1.27 लाख करोड़ रुपये और मोबाइल फ़ोन निर्माण के लिए 62,500 करोड़ रुपये दिए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स पुर्जे निर्माण योजना के लिए बजट बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के तहत, एक करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले जनवरी 2026 तक सिर्फ़ 3,417 इंटर्नशिप ही पूरी हो पाई है। दावा यह है कि पूंजी, उत्पादन और मजदूरी सभी पर सब्सिडी दी जाती है – फिर भी नौकरियां कभी नहीं दिखतीं, क्योंकि असल मकसद तो पैसा हस्तांतरण करना था, न कि रोजगार देना।
दुश्मन और सही समय
छात्र और युवा इन खतरनाक इरादों को समझ रहे हैं। जंतर-मंतर पर हुए सफल विरोध-प्रदर्शनों से घबराकर, प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 2026 को लाल किले से घोषणा की कि नया दुश्मन 'दिमागी नक्सल' है। उनकी 'पहचान करके उन्हें अलग-थलग' किया जाना है। जल्द ही 'ऑर्गनाइज़र' ने इन्हें ऐसे लोगों के तौर पर परिभाषित किया, जो 'बंदूक तो नहीं रखते, लेकिन जाने-माने इतिहासकार या बुद्धिजीवी जैसे लेबल का इस्तेमाल करते हैं', और इनकी पहचान करने को 'राष्ट्रीय कर्तव्य' बताया।
यह समय कोई इत्तेफाक नहीं है। जिस सरकार ने बड़ी कंपनियों को 3 लाख करोड़ रुपये दिए हों, 10 लाख करोड़ रुपये के कॉर्पोरेट ऋण माफ किए हों, खनन के 2 लाख करोड़ रुपये के बकाये को खत्म किया हो और ग्रामीण रोजगार को आधा कर दिया हो, वह जानती है कि वह ज्वालामुखी पर बैठी है। मोदी जिसे 'आत्मनिर्भर भारत' कहते हैं, वह असल में 'छीनकर संचय करने' की प्रक्रिया है – इसमें जनता की बचत, राजस्व और खनिजों को निजी संपत्ति में बदला जाता है ; नुकसान का बोझ समाज पर डाला जाता है और दुख-तकलीफों को व्यक्ति-विशेष पर छोड़ दिया जाता है। इसका जवाब है – इस कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक शासन के खिलाफ मजदूरों, किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं और हाशिए पर पड़े लोगों का एकजुट संघर्ष।
(लेखक सीपीआई(एम) के महासचिव और पूर्व सांसद हैं। वे केरल के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)