बेरोजगारी नहीं, हुनर की कमी है भारत की बड़ी चुनौती

डिग्री के पीछे क्यों भागें, जब हुनर रोजगार की गारंटी है?
देश में बेरोजगारी की चर्चा होते ही हमारी नजर सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और बड़ी-बड़ी कंपनियों में भर्ती पर जाकर टिक जाती है। लेकिन रोजगार की असली तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। नीति आयोग की कौशल विकास से जुड़ी हालिया रिपोर्ट ने युवाओं और सरकार दोनों के सामने एक ऐसा आईना रखा है, जिसे देखकर असहज होना स्वाभाविक है। रिपोर्ट के अनुसार 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न पढ़ाई कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी प्रशिक्षण से जुड़े हैं। इन्हें एनईईटी यानी नॉट इन एजुकेशन, एम्पलॉयमेंट एंड ट्रेनिंग श्रेणी में रखा गया है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि केवल लगभग 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसी नौकरियां कर रहे हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप हैं। यानी हमारे यहां समस्या केवल बेरोजगारी की नहीं, बल्कि ‘गलत रोजगार’ की भी है।
विडंबना देखिए कि एक ओर लाखों युवा हाथ में डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में वर्षों गुजार रहे हैं, दूसरी ओर बाजार में ऐसे कुशल कामगारों की भारी कमी है, जिनकी जरूरत हर दिन बढ़ रही है। घर में पंखा खराब हो जाए, कूलर बंद हो जाए, वाशिंग मशीन जवाब दे दे, माइक्रोवेव काम करना बंद कर दे, एसी में खराबी आ जाए या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की मरम्मत करनी हो तो हमें तुरंत ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है, जिसे वास्तव में काम आता हो। यहां किसी डिग्री की नहीं, हुनर की जरूरत होती है। यही वह क्षेत्र है, जिसे हमारे रोजगार विमर्श में अब तक अपेक्षित सम्मान नहीं मिला।
हमारे सामाजिक मानस ने रोजगार को भी जातियों की तरह ऊंच-नीच में बांट रखा है। सरकारी नौकरी सबसे ऊपर, फिर बड़ी कंपनी की नौकरी, उसके बाद निजी कार्यालय और सबसे नीचे वह काम जिसमें हाथ गंदे हो सकते हैं। यही मानसिकता युवाओं को कई बार ऐसे रोजगार से दूर कर देती है, जिनमें आमदनी और आत्मनिर्भरता दोनों की पर्याप्त संभावना है। सवाल यह होना चाहिए कि काम छोटा-बड़ा है या कमाई, सम्मान और आत्मनिर्भरता छोटी-बड़ी है?
एक युवा यदि स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई के साथ किसी अनुभवी मैकेनिक, इलेक्ट्रीशियन, इलेक्ट्रॉनिक तकनीशियन, मोबाइल रिपेयर विशेषज्ञ, ऑटोमोबाइल वर्कशॉप, प्लंबर, बढ़ई, एसी तकनीशियन या किसी स्थानीय व्यवसायी के साथ नियमित रूप से काम सीखता है तो कुछ ही समय में उसके पास एक ऐसा हुनर हो सकता है, जिससे वह नौकरी मांगने के बजाय नौकरी देने की स्थिति में पहुंच सकता है। इसके लिए जरूरी नहीं कि वह वर्षों किसी संस्थान में पढ़े। व्यवहारिक प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और अनुभवी कारीगर के साथ काम करने से भी दक्षता विकसित की जा सकती है।
आज घरेलू उपकरणों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। स्मार्ट टीवी, इन्वर्टर, सोलर सिस्टम, एयर कंडीशनर, वॉशिंग मशीन, माइक्रोवेव, वाटर प्यूरिफायर, रेफ्रिजरेटर और अनेक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगभग हर मध्यमवर्गीय परिवार की जरूरत बन चुके हैं। इनकी बिक्री जितनी बढ़ेगी, इनके इंस्टॉलेशन, सर्विस और मरम्मत की जरूरत भी उतनी ही बढ़ेगी। यही कारण है कि तकनीकी सेवा क्षेत्र युवाओं के लिए बड़ा रोजगार बाजार बन सकता है। किसी कुशल तकनीशियन की कमाई कई बार सामान्य सफेदपोश नौकरी से भी अधिक हो सकती है, खासकर जब वह अपना छोटा सर्विस सेंटर खड़ा कर ले।
बड़ी कंपनियां भी इस व्यवस्था को समझती हैं। उत्पाद बेचने के बाद उन्हें स्थानीय स्तर पर इंस्टॉलेशन और सर्विस नेटवर्क की जरूरत होती है। इसलिए प्रशिक्षित स्थानीय तकनीशियनों को अधिकृत सर्विस पार्टनर, इंस्टॉलेशन एजेंट या सर्विस नेटवर्क से जोड़ा जाता है। यहां एक कुशल युवा केवल अपनी आय नहीं बढ़ाता, बल्कि आगे चलकर दो-चार अन्य युवाओं को प्रशिक्षण देकर अपने साथ जोड़ सकता है। यही वास्तविक उद्यमिता है—जिसमें नौकरी खोजने वाला धीरे-धीरे रोजगार पैदा करने वाला बन जाता है।
सरकारों को भी अब कौशल विकास को प्रमाणपत्र बांटने की कवायद से बाहर निकालना होगा। किसी युवक को तीन महीने का प्रशिक्षण देकर प्रमाणपत्र पकड़ा देना कौशल विकास नहीं है। असली सफलता तब होगी जब प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उसके हाथ में काम हो, ग्राहक हों और आय हो। प्रशिक्षण संस्थानों की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उनके कितने प्रशिक्षार्थियों को छह महीने या एक वर्ष बाद वास्तविक रोजगार मिला और कितने अपना व्यवसाय शुरू कर पाए।
इसके लिए स्कूल स्तर से ही ‘करियर की दूसरी खिड़की’ खोलनी होगी। हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या सरकारी अधिकारी नहीं बन सकता और न बनना जरूरी है। किसी को इलेक्ट्रिशियन बनने में गर्व होना चाहिए, किसी को मशीन तकनीशियन बनने में, किसी को कार रिपेयर विशेषज्ञ बनने में और किसी को अपना छोटा व्यापार खड़ा करने में। जर्मनी जैसे देशों की व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था से सीख लेते हुए भारत में पढ़ाई और काम के बीच मजबूत पुल बनाया जा सकता है। अप्रेंटिसशिप को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि रोजगार की पहली सीढ़ी बनाया जाना चाहिए।
डिजिटल तकनीक इस क्षेत्र को और बड़ा बना सकती है। एक स्थानीय तकनीशियन मोबाइल ऐप के जरिए ग्राहक खोज सकता है, ऑनलाइन भुगतान ले सकता है, डिजिटल बिल दे सकता है, ग्राहक की रेटिंग प्राप्त कर सकता है और अपने काम का रिकॉर्ड रख सकता है। यानी परंपरागत हुनर और आधुनिक तकनीक का मेल उसे छोटे दुकानदार से डिजिटल उद्यमी में बदल सकता है।
युवाओं को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी। हर साल लाखों लोग प्रतियोगी परीक्षाओं की कतार में लगते हैं। वर्षों तैयारी के बाद भी चयन न हो तो उम्र निकलने लगती है और आत्मविश्वास टूटने लगता है। प्रतियोगी परीक्षा देना गलत नहीं है, लेकिन जीवन की पूरी रणनीति केवल सरकारी नौकरी पर निर्भर करना जरूर जोखिम भरा है। नौकरी मिले तो अच्छी बात, लेकिन हुनर ऐसा होना चाहिए कि नौकरी न मिले तब भी जीवन रुके नहीं।
देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, लेकिन युवा आबादी तभी जनसांख्यिकीय लाभांश बनेगी जब उसके हाथ में डिग्री के साथ हुनर और हुनर के साथ बाजार होगा। सरकार को शिक्षा को रोजगार से, प्रशिक्षण को उद्योग से और कौशल को उद्यमिता से जोड़ना होगा। समाज को भी ‘कॉलर वाली नौकरी’ और ‘हाथ से किए जाने वाले काम’ के बीच बनाई गई नकली प्रतिष्ठा की दीवार गिरानी होगी।
आखिर जिस हाथ से लाखों रुपये की मशीन बनाई जाती है, उसी हाथ से उसकी मरम्मत करना छोटा काम कैसे हो गया? जिस तकनीशियन के बिना महंगा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण घर में बेकार पड़ा रहता है, उसे हम कमतर क्यों समझें? भविष्य शायद उस युवा का है जो केवल नौकरी खोजने के बजाय यह पूछेगा—‘मैं कौन-सा काम सीखूं जिसकी जरूरत हमेशा रहेगी?’ यही सवाल उसे बेरोजगारी की कतार से निकालकर आत्मनिर्भरता की राह पर ले जा सकता है। भारत को अब डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा हुनरमंद युवाओं की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना होगा, क्योंकि आने वाले समय में रोजगार प्रमाणपत्र नहीं, काम करने की क्षमता देगा।-ऋषि सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.