विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के पूरे हुए 75 साल, बिहार में आज भी भूमिहीनों को नहीं मिला जमीन पर कब्जा

विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के पूरे हुए 75 साल, बिहार में आज भी भूमिहीनों को नहीं मिला जमीन पर कब्जा

विनोबा के बिहार में भूदान का अधूरा वादा*

      

          पचहत्तर साल पहले विनोबा भावे ने पोचमपल्ली से पैदल चलकर सिर्फ जमीन नहीं, मनुष्य की करुणा जगाने की यात्रा शुरू की थी। बुद्ध की धरती बिहार इस यात्रा की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बनी, जहाँ लाखों एकड़ जमीन दान में मिली। पर दानपत्र और खेत की मेड़ के बीच का फासला आज तक नहीं पटा। कागज पर जमीन तो है लेकिन भूमि हीन के पास आज भी कब्जा नहीं है।

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               आज से 75 वर्ष पहले जब आचार्य विनोबा भावे तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव से पैदल निकले थे, तो वे केवल जमीन मांगने नहीं निकले थे। वे मनुष्य के भीतर उस करुणा को जगाने निकले थे, जो संपत्ति को केवल निजी अधिकार नहीं, सामाजिक दायित्व के रूप में देख सके। 18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली से आरंभ हुई भूदान यात्रा आगे चलकर एक विराट सामाजिक प्रयोग में बदल गई। इसे केवल भूमिहीनों को जमीन दिलाने का अभियान मानना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। इसके पीछे सर्वोदय, ग्राम स्वराज, ट्रस्टीशिप, शांति और मैत्री का वह दर्शन था, जिसमें मनुष्य से कहा जा रहा था कि उसके पास जो कुछ है, उसमें समाज का भी हिस्सा है। इसी भाव से भूदान आगे ग्रामदान तक पहुंचा, ‘जय जगत’ का मंत्र उभरा, सर्वोदय-पात्र की कल्पना सामने आई और यह आग्रह पैदा हुआ कि जिसके पास जमीन देने को नहीं है, वह कम-से-कम एक मुट्ठी अन्न देकर भी साझी मानवता में अपना योगदान दे।

                  विनोबा की पदयात्रा ने स्वतंत्रता के बाद गांधी के लाखों अनुयायियों के सामने एक नया रास्ता खोला। गांधी की हत्या के बाद यह बेचैनी थी कि उनके अधूरे स्वप्नों को कौन आगे ले जाएगा। विनोबा ने इस शून्य को किसी राजनीतिक संगठन या सत्ता के सहारे नहीं, बल्कि पैदल चलकर भरा। वे गांव-गांव गए, लोगों से मिले और समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को अपने चिंतन का केंद्र बनाया। इसीलिए भूदान यात्रा का भूगोल जितना व्यापक था, उसका भावलोक उससे भी बड़ा था। 

              चंबल के बीहड़ों में दस्यु सरगनाओं ने हथियार डालकर शांतिपूर्ण जीवन का संकल्प लिया। कोरापुट और असम में ग्रामदान के प्रयोग हुए। असम के वनवासी इलाकों में महिलाओं के नेतृत्व में गांवों के सामूहिक दान का प्रयोग हुआ। चीन के आक्रमण के दौर में भी विनोबा वहां के लोगों के लिए नैतिक साहस का स्रोत बने रहे। राजस्थान के किसी घर में विनोबा के बैठने वाली एक साधारण खाट को परिवार ने इसलिए धरोहर की तरह संभालकर रखा कि उस पर कभी विनोबा बैठे थे। बेंगलुरु में विवेकानंद के बैठने वाली एक साधारण पत्थर की बेंच की तरह ये स्मृतियां बताती हैं कि भारत में महापुरुष केवल इतिहास के पात्र नहीं होते, वे परिवारों की भावनात्मक स्मृति में भी जीवित रहते हैं।

              विनोबा स्वयं भारत को बुद्ध, महावीर, रामानुज, शंकराचार्य, नानक, कबीर, तुलसी, मीरा, रैदास, चैतन्य, ज्ञानेश्वर, विवेकानंद और गांधी की भूमि के रूप में देखते थे। उनके लिए यह करुणा और आत्मदान की परंपरा वाली धरती थी। इसलिए भूदान जैसा प्रयोग भारत में संभव हुआ। यह विश्वास केवल विनोबा का नहीं था। उस समय के साहित्यकारों और कवियों ने भी इस आंदोलन को अपने शब्दों में अभिव्यक्ति दी।

                माखनलाल चतुर्वेदी ने विनोबा को संबोधित करते हुए उन्हें अनबोलों की बोली और अकुलाते लोगों की गुहार कहा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘भूमिदान’ में भूदान को गांधी के आगे बढ़ते हुए विचार की नई रोशनी के रूप में देखा। दिनकर की कविता में भूमिहीन किसानों की बेचैनी और संपन्न वर्ग के सामने खड़ा नैतिक प्रश्न दोनों उपस्थित हैं। उनके लिए विनोबा का भूदान मांगना किसी दुर्बल की याचना नहीं, बल्कि आने वाली सामाजिक क्रांति को अहिंसक रास्ता देने का प्रयत्न था।

            भूदान की इसी दूसरी यात्रा में बिहार का विशेष स्थान बना। बुद्ध की भूमि को विनोबा ने अपने प्रयोग की प्रयोगशाला बनाया और लगभग चार वर्षों तक बिहार में रहे। 1952 में उनके बिहार प्रवेश के साथ आंदोलन ने व्यापक रूप ग्रहण किया। उस समय बिहार भूमि-संबंधी असमानता, जमींदारी उन्मूलन और ग्रामीण तनाव के दौर से गुजर रहा था। जमीन यहां केवल उत्पादन का साधन नहीं थी,वह सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक सुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव का आधार थी। जिसके पास जमीन थी, उसके पास गांव में शक्ति थी और जिसके पास नहीं थी, उसकी निर्भरता पीढ़ियों तक चलती थी। विनोबा ने इस असमानता को केवल कानून से हल करने की कोशिश नहीं की। उन्होंने संपन्न लोगों के विवेक को संबोधित किया। उनका आग्रह गांधी की ट्रस्टीशिप की अवधारणा से जुड़ा था कि संपत्ति रखिए, लेकिन उसे समाज से अलग मत समझिए।

              बिहार में श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, जयप्रकाश नारायण सहित अनेक नेताओं और सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को अलग-अलग स्तर पर समर्थन दिया। गया, दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा और दूसरे जिलों में भूदान की गतिविधियां तेज हुईं। बड़े भूमिधरों द्वारा जमीन दान करने की घोषणाएं हुईं। भूदान ने गांवों में जमीन के सवाल की एक नई भाषा पैदा की। ऐसी भाषा जिसमें संघर्ष की जगह संवाद और अधिकार के साथ दायित्व की बात थी। किसी भूमिधर ने जमीन देने का संकल्प किया, दानपत्र बना, रकबा दर्ज हुआ। लेकिन क्या दानपत्र और खेत की मेड़ के बीच का फासला कई जगह बहुत लंबा साबित हुआ। कहीं जमीन विवादित थी, कहीं उस पर पहले से कब्जा था, कहीं राजस्व रिकॉर्ड अस्पष्ट थे और कहीं वितरण की प्रक्रिया अधूरी रह गई। कुछ मामलों में कागज पर जमीन थी, लेकिन जमीन पर उसका अस्तित्व नहीं था। इस तरह भूदान का नैतिक उजाला धीरे-धीरे प्रशासनिक अंधेरों में उलझता गया।

            यही भूदान आंदोलन की सबसे बड़ी विडंबना रही जिस आंदोलन ने संपत्ति और सत्ता के केंद्रीकरण को चुनौती देने के लिए मनुष्य की अंतरात्मा को जगाया, उसका एक बड़ा हिस्सा बाद में सरकारी फाइलों, राजस्व अभिलेखों और मुकदमों में उलझ गया।

               बिहार में भूदान यज्ञ समिति जैसी संस्थागत व्यवस्था इसी उद्देश्य से बनी थी कि दान में प्राप्त भूमि का संरक्षण हो और उसे निर्धारित लाभार्थियों तक पहुंचाया जाए। लेकिन समय के साथ उसकी कार्यक्षमता पर सवाल उठे। 2018 में बिहार भूदान यज्ञ समिति को भंग कर उसके कार्यों की जिम्मेदारी राजस्व परिषद को सौंप दी गई। इसके बाद समिति का पुनर्गठन नहीं हुआ। सर्वोदय और भूदान से जुड़े संगठनों ने इसे लेकर चिंता जताई और भूदान की जमीनों की सुरक्षा तथा वितरण के लिए प्रभावी संस्थागत व्यवस्था की मांग की। लेकिन अब प्रश्न केवल किसी समिति के पुनर्गठन का नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि भूदान की जमीन का सामाजिक चरित्र कौन बचाएगा?

राजस्व विभाग के पास रिकॉर्ड हो सकते हैं, प्रशासन के पास फाइलें हो सकती हैं, लेकिन भूदान की जमीन केवल खाता, खसरा और रकबा नहीं है। उसके साथ एक ऐतिहासिक संकल्प जुड़ा है कि जिसके पास जमीन नहीं है, जमीन उसके जीवन का आधार बने। इसलिए भूदान के 75 वर्ष पूरे होने पर सबसे जरूरी काम समारोह करना नहीं, बल्कि उसकी जमीन को खोज निकालना है। 

           सरकार को जिलेवार सार्वजनिक करना चाहिए कि भूदान में कितनी जमीन मिली, कितनी वितरित हुई, कितने लाभार्थियों को वास्तविक कब्जा मिला और कितनी जमीन आज भी विवाद, अतिक्रमण या प्रशासनिक उदासीनता में फंसी हुई है। पुराने दानपत्रों को राजस्व रिकॉर्ड से मिलाना होगा। जमीन का भौतिक सत्यापन और सीमांकन करना होगा। डिजिटलीकरण उपयोगी है, लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड खेत की मेड़ तक नहीं पहुंच सकता। इसके लिए प्रशासन को जमीन पर जाना होगा। देखना होगा कि कागज में दर्ज जमीन वास्तव में कहां है और उस पर कौन खेती कर रहा है। जहां मूल लाभार्थी नहीं हैं, वहां वैध उत्तराधिकारियों की पहचान की जा सकती है। जहां भूदान की जमीन पर अवैध कब्जा है, वहां कार्रवाई होनी चाहिए। जहां लंबे समय से मुकदमे चल रहे हैं, वहां विशेष तंत्र बनाकर समयबद्ध समाधान किया जाना चाहिए और पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

            भूदान की जमीन का सामाजिक ऑडिट केवल अतीत का हिसाब नहीं होगा। यह बिहार में भूमि न्याय की दिशा में एक नया कदम भी हो सकता है। आज जब जमीन की कीमत लगातार बढ़ रही है, विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण के सवाल उठ रहे हैं और ग्रामीण समाज में आर्थिक असमानता के नए रूप दिखाई दे रहे हैं, तब भूदान को फिर से पढ़ने की जरूरत है। उसका सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी वही है कि जमीन पर अधिकार का अंतिम औचित्य क्या है? केवल कानूनी स्वामित्व या उसके साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी भी?

         भूदान को उसकी असफलताओं के कारण खारिज करना उतना ही अधूरा होगा, जितना उसकी उपलब्धियों का उत्सव मनाकर उसकी कमियों को भुला देना। कोई भी बड़ा सामाजिक प्रयोग अपनी पूर्णता से नहीं, बल्कि अपने द्वारा छोड़े गए नैतिक प्रश्नों से भी पहचाना जाता है। भूदान ने भारतीय समाज के सामने ऐसा ही प्रश्न रखा था।

विनोबा ने जमीन के मालिकों से केवल जमीन नहीं मांगी थी। उन्होंने मनुष्य से अपने भीतर के स्वामी और ट्रस्टी के बीच अंतर पहचानने को कहा था। उन्होंने संपत्ति को करुणा से जोड़ने का प्रयास किया था। आज राज्य की जिम्मेदारी है कि उन पुराने संकल्पों को कानून, प्रशासन और न्याय के माध्यम से उनके अंतिम पड़ाव तक पहुंचाए।

किसी भूमिहीन परिवार के लिए जमीन कुछ डिसमिल या कुछ एकड़ भर नहीं होती। वह घर के चूल्हे की स्थिरता, बच्चों की पढ़ाई की संभावना, कर्ज से मुक्ति की उम्मीद और गांव में सम्मान के साथ खड़े होने का अधिकार होती है। इसलिए भूदान की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है। वह उन पुराने दानपत्रों में बंद है, जो खेत की मेड़ तक पहुंचने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

          75 साल बाद असली सवाल यह नहीं कि भूदान में कितनी जमीन दान हुई थी। सवाल यह है कि उसमें से कितनी जमीन आज भी न्याय की जमीन बनी हुई है।

यदि बिहार इस सवाल का सामना करने का साहस करता है, तो भूदान की विरासत फिर जीवित हो सकती है। तब 75वीं वर्षगांठ अतीत का स्मरण मात्र नहीं होगी, बल्कि उस अधूरे वादे को पूरा करने की शुरुआत होगी।

              वास्तव में भूदान की अंतिम परीक्षा किसी समारोह, स्मारक या सरकारी फाइल में नहीं है। उसकी परीक्षा उस खेत की मेड़ पर है, जहां एक भूमिहीन परिवार पहली बार यह कह सके कि यह जमीन कागज पर ही नहीं, सचमुच मेरी है।

कुमार कृष्णन
कुमार कृष्णन

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