देशभक्ति टेस्ट वंदे मातरम् , राजेंद्र शर्मा व्यंग्य

देशभक्ति टेस्ट -- वंदे मातरम्!

राजेंद्र शर्मा
मिल गया, मिल गया, मिल गया। देशभक्ति का टेस्ट मिल गया। टेस्ट भी एकदम आसान और मुफ्त भी। और मधुर। बल्कि संगीतमय। बहुत ही सिंपल टेस्ट है– वंदे मातरम् गाओ और देशभक्त कहलाओ! अब यह तो स्वयं सिद्ध है कि जो वंदे मातरम् भी नहीं गाए, वह कैसे भारतीय माना जाए?
पर अब क्या सचमुच मोदी जी जो कुछ भी करेंगे, विरोधी उसका ही विरोध करने लगेंगे? यह अंध-विरोध नहीं तो और क्या है? बताइए, अब विरोधियों को मोदी जी के देशभक्ति टेस्ट का भी विरोध करना है! मोदी जी ने और सिर्फ मोदी जी ने ही क्यों, उनकी पूरी सरकार ने और सिर्फ सरकार ने ही क्यों, उनके संघ परिवार ने, गोदी परिवार ने, बड़े कारोबारी संसार ने, सब ने मिलकर देशभक्ति का एक टेस्ट निकाला है। कड़ी मेहनत के बाद देशभक्ति का टेस्ट निकाला है। कड़ी मेहनत भी, साल-छ: महीने की नहीं, एक-दो साल की भी नहीं, पूरे बारह साल की कड़ी मेहनत के बाद देशभक्ति टेस्ट निकाला है। बल्कि इसमें अगर मोदी जी के उन प्रयत्नों को भी जोड़ दिया जाए, जो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए ही शुरू कर दिए थे, तो पूरी चौथाई सदी की मेहनत के बाद भगवा कुनबे ने यह देशभक्ति टेस्ट निकाला है। पर मोदी जी के विरोधी हैं कि उसका भी विरोध कर रहे हैं।
देशभक्ति का इतना सिंपल, इतना कारगर टेस्ट देखकर तो अब ज्ञानेश कुमार को भी अफसोस हो रहा होगा कि एसआईआर के चक्कर में नाहक इतनी गालियां खायीं। नाम काटे। नाम जोड़े। तार्किक विसंगति लगायी। और भी न जाने क्या-क्या किया, सिर्फ घुसपैठियों को खोज कर निकालने के लिए ही तो! क्योंकि उनसे किसी ने पूछा था कि घुसपैठियों को वोटर लिस्ट में रहना चाहिए क्या? काश, उन्हें भी तब यह देशभक्ति टेस्ट मिल जाता, तो उनका भी काम कितना आसान हो जाता। जो वंदे मातरम् नहीं गाए, वह वोटर सूची तो क्या देश के ही बाहर जाए। देशभक्ति के टेस्ट में ना पास होने वालों को, देश में रहने देना चाहिए क्या?
पर विरोधी हैं कि इतने आसान टेस्ट का भी विरोध कर रहे हैं। बहुतों को तो देशभक्ति के टेस्ट के आइडिया से ही प्रॉब्लम है। कह रहे हैं कि नागरिक के अधिकार से हम इस देश में रहते ही नहीं हैं, इस देश के मालिक भी हैं। देशभक्ति हमारे और देश के बीच का निजी मामला है, इसमें सरकार कैसे घुस सकती है और वह भी अपना ही नपना लेकर। और इनमें कई तो इतने दुष्ट हैं कि सबसे पहले तो उन्हें मोदी जी की सरकार की देशभक्ति टेस्ट कराने की योग्यता पर ही बहस करनी है। यह पेपर लीक वाली बात नहीं है। कहते हैं कि बाकी के ज्यादातर देशवासियों के पुरखों ने तो तभी देशभक्ति का टेस्ट दे दिया था, जब अंगरेज यह टेस्ट लिया करते थे। अंग्रेजी राज का टेस्ट बहुत सख्त था। वह राज लाठी, जेल, गोली से और कभी-कभी तो फांसी से भी टेस्ट लेता था। पर तब जिन मोदी जी के पुरखे कभी देशभक्ति के टेस्ट में पास होना तो दूर रहा, उसमें बैठे तक नहीं, अब किस मुंह से दूसरों से देशभक्ति का टेस्ट देने की मांग कर सकते हैं?
उनसे भी ज्यादा ऐसे हैं, जो कह रहे हैं टेस्ट की बात तो खैर मजाक है, पर वंदे मातरम् गाने-गवाने में प्रॉब्लम नहीं है। हमारे पुरखे तो जमाने से गाते आए हैं, बल्कि उन्होंने ही इसे गाने के लिए अंगरेजों की लाठियां खा-खाकर, इसे गाने को देशभक्ति की निशानी बनाया था। हां! इतना जरूर है कि आम लोगों के बीच देशभक्ति की निशानी तो बने थे सिर्फ दो शब्द-- ‘‘वंदे मातरम्’’। फिर भी गीत के पहले दो बंद भी गाना हमें मंजूर है, जो हम नब्बे साल से गाते आए हैं। रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा था कि उतना गीत ही पूरे देश के गाने के लायक है। संविधान सभा ने भी कहा था कि इतना ही गीत राष्ट्रीय गीत होने के लायक है। लेकिन, पूरा गीत, सभी छ: बंद गाने की जबर्दस्ती, न नब्बे साल पहले देश को मंजूर थी और न आज मंजूर है।
मगर, यह तो एक तरह से देशभक्ति के टेस्ट को ही नामंजूर करना हो गया। अब देश भक्ति में नाप-जोख, मोल-तोल नहीं होता है। देशभक्ति में कम ज्यादा कुछ नहीं होता है -- मोहब्बत की तरह या तो होती है या नहीं होती है। टेस्ट भी भरोसेमंद तभी होता है, जब पूरा हो। सही टेस्ट के लिए, वंदे मातरम् तो पूरा ही गाना पड़ेगा। सच पूछिए तो शुरू के बंद तो इतने टैम से गाए जा रहे हैं कि उनका तो टेस्टिंग वाला प्रभाव ही अब करीब-करीब खत्म हो चुका है। वह जो जनगण मन जैसा मामला हो गया है, जिसे कोई भी गाकर पास हो सकता है। असली टेस्ट तो बाद वाले पदों में ही है। याददाश्त का टेस्ट भी नहीं, असली देशभक्ति का टेस्ट -- इसका इम्तहान कि देशभक्ति साबित करने के लिए, अपने धार्मिक या अन्य विश्वासों को पूरी तरह छोडऩे को तैयार हो या नहीं? नहीं ; तो हो गया टेस्ट -- यही तो साबित करना था!
और यह दलील तो एकदम ही गलत है कि 1937 से हम तो वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे ही गाते आए हैं, इसलिए अब भी पहले दो अंतरे ही गाएंगे। तब अंगरेज नहीं गाने देते थे, इसलिए दो अंतरे गाना तो छोड़ो, ‘‘वंदे मातरम्’’ बोलना भी काफी था। बल्कि बहुतेरे तो ऐसे अंडरग्राउंड देशभक्त थे कि ‘‘वंदे मातरम्’’ भी नहीं बोलते थे। और दस साल में चूंकि दो अंतरे गाने की ही आदत पड़ गयी, तो संविधान सभा ने भी बिना सोचे-समझे उतने को ही राष्ट्रीय गीत बना दिया। पर जब अंग्रेज चले गए, उनके डंडे चले गए, जब तब वाले अंडर ग्राउंड देशभक्तों के वारिसों का राज आ गया, तब क्यों न सब से वंदे मातरम के पूरे छ: अंतरे गवाए जाएं! और जो न गाए, उसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, कब्रिस्तान, कहीं तो भिजवाएं।
अब प्लीज कोई ये मत कहना कि वंदे मातरम् गाने वाली देशभक्ति की परीक्षा, खुद नागपुर परिवार ने क्यों नहीं अपनायी? वे खुद सदा ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ ही क्यों करते रहे? सुना है नाथूराम गोडसे ने तो गांधी की हत्या के लिए फांसी से पहले भी ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ ही किया था। सिंपल है, वे सब तब अंडरग्राउंड देशभक्त थे। ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ उनका वंदे मातरम् ही तो था, अंग्रेजों से छुपा हुआ भी और पूरा भी। अब ओवरग्राउंड हैं, तो पूरा वंदे मातरम गाएंगे भी और बाकी सब से गवाएंगे भी। अब वे यह कहने को आज़ाद हैं ‘भारत में अगर रहना होगा, वंदे मातरम गाना होगा’। जेन ज़ी अपना देख ले, उसे वंदे मातरम् गाना है या बाहर जाना है!
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)