गुजरात के फैजल और स्वतंत्र भारद्वाज पर कानून का सवाल

Atal Hind Team Online7 September 202612 min read28 viewsभारत
गुजरात के फैजल और स्वतंत्र भारद्वाज पर कानून का सवाल

फैजल और स्वतंत्र भारद्वाज के मामले में बड़ा सवाल: कानून सबके लिए बराबर है?

राजकुमार अग्रवाल /दिल्ली /01 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

भारत में कानून की सबसे बड़ी ताकत यही मानी जाती है कि वह किसी व्यक्ति का धर्म, जाति, विचारधारा, राजनीतिक पहचान या सामाजिक हैसियत देखकर नहीं चलता। कानून के सामने हर व्यक्ति बराबर है। लेकिन जब अलग-अलग घटनाओं में पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई सामने आती है, तो यही सवाल बार-बार उठता है कि क्या भारत में कानून का इस्तेमाल वास्तव में एक जैसा हो रहा है?

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हाल के दो मामले इस बहस को फिर सामने ले आए हैं। गुजरात के भावनगर में हत्या के आरोपी फैजल लखानी को पुलिस द्वारा कथित तौर पर रस्सियों से बांधकर पीटे जाने का वीडियो सामने आया। दूसरी तरफ दिल्ली में स्वतंत्र भारद्वाज पर जंतर-मंतर के एक प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी के पिता पर कथित हमले का मामला सामने आया, जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई और अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं। एक व्यक्ति हत्या के आरोप में गिरफ्तार हुआ और दूसरे पर कथित हमले का मामला है। इसलिए दोनों को अपराध की गंभीरता में बराबर रखना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों घटनाएं एक समान सवाल जरूर खड़ा करती हैं—आरोप चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, क्या पुलिस किसी आरोपी को अदालत के फैसले से पहले सजा दे सकती है?

गुजरात के भावनगर में सामने आए वीडियो ने इसी सवाल को गंभीर बनाया है। रिपोर्टों के अनुसार फैजल लखानी को अपराध स्थल पर ले जाकर पुलिसकर्मियों ने उसे रस्सियों से बांधा और डंडे से पीटा। पुलिस अधिकारी की ओर से इस कार्रवाई को अपराध की गंभीरता और अपराधियों में डर पैदा करने की जरूरत से जोड़कर बताया गया।

यहीं से कानून और पुलिस व्यवस्था के बीच की सीमा का सवाल सामने आता है। पुलिस का काम अपराध की जांच करना, सबूत जुटाना और आरोपी को अदालत के सामने पेश करना है। किसी आरोपी को मौके पर पीटना या सार्वजनिक रूप से अपमानित करना अदालत द्वारा सुनाई गई सजा नहीं है।

अगर किसी व्यक्ति पर हत्या का आरोप है तो पुलिस को जांच करनी चाहिए और अभियोजन पक्ष को अदालत में सबूत रखने चाहिए। दोष सिद्ध होने पर अदालत सजा दे सकती है। लेकिन अगर पुलिस ही आरोपी को सजा देने लगे तो फिर अदालत की भूमिका क्या रह जाएगी?

यही कारण है कि मानवाधिकार संगठनों की ओर से पुलिस हिरासत और पुलिस हिंसा के मामलों पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। गुजरात में इससे पहले भी पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से आरोपियों की पिटाई के मामलों पर मानवाधिकार संगठनों ने आपत्ति जताई है। Amnesty International ने 2022 में गुजरात पुलिस द्वारा मुस्लिम आरोपियों की सार्वजनिक पिटाई को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताया था।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी आरोपी को अपराध करने के बाद सहानुभूति दी जाए। पीड़ित को न्याय मिलना जरूरी है। लेकिन न्याय का मतलब यह नहीं हो सकता कि पुलिस सड़क पर फैसला सुनाने लगे।

यही सिद्धांत स्वतंत्र भारद्वाज के मामले में भी लागू होना चाहिए। उनके खिलाफ जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शनकारी के पिता पर कथित हमले का मामला दर्ज हुआ। पुलिस ने उन्हें उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से गिरफ्तार किया और दिल्ली की अदालत में पेश किया। अदालत ने पहले पुलिस हिरासत और उसके बाद न्यायिक हिरासत से संबंधित आदेश दिए।

7 सितंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। इसके बाद दिल्ली की अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की खबर सामने आई। यानी यह मामला अब न्यायिक प्रक्रिया के भीतर है और आरोपों का अंतिम फैसला अदालत को ही करना है।

यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। गिरफ्तारी सजा नहीं है और न्यायिक हिरासत भी दोष सिद्ध होना नहीं है। किसी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक अदालत सबूतों के आधार पर उसे दोषी घोषित न करे।

भारत में लगातार बढ़ता पुलिसिया अपराध और हिरासत में हिंसा इस बात का प्रमाण है कि आंतरिक सुरक्षा के नाम पर तंत्र कितना बेलगाम हो चुका है। थानों और सड़कों पर होने वाला उत्पीड़न इस बात का द्योतक है कि सुधार के तमाम दावों के बावजूद जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है। जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर दोषी पुलिसकर्मियों पर वैसी सख्त और सार्वजनिक कार्रवाई क्यों नहीं की जाती, जैसी आम अपराधियों पर होती है?

वह गृह मंत्रालय जिसके सीधे नियंत्रण और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में देश और राज्यों की पुलिस व्यवस्था आती है, उसकी जवाबदेही कब तय होगी? क्या गृह मंत्री और गृह विभाग के उच्च अधिकारी इन बढ़ती पुलिसिया ज्यादतियों के लिए कभी नैतिक या कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराए जाएंगे? फैजल जैसे मामलों में त्वरित प्रतिक्रिया दिखाने वाला तंत्र जब खाकी के भीतर छिपे अपराधियों को बचाता है, तो जनता का सिस्टम से मोहभंग होना स्वाभाविक है।

संस्थाओं की यह सोची-समझी चुप्पी और जजों की बदलती मानसिकता इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र के चारों स्तंभ अपनी धुरी से भटक रहे हैं। कार्यपालिका की मनमानी और न्यायपालिका का संकोच इस रिश्ते को एक ऐसी दास्तां में बदल देता है जहां आम आदमी केवल पिसने के लिए मजबूर है। इस व्यवस्था को भारत के संदर्भ में क्या नाम दिया जाए, यह आज हर एक प्रबुद्ध नागरिक के लिए विचारणीय प्रश्न बन चुका है।

यदि समय रहते मानवाधिकार आयोग, अदालतें और शासन चलाने वाले नुमाइंदे नहीं चेते, तो यह अनियंत्रित पुलिसिया उत्पीड़न लोकतंत्र के बचे-कुचे ढांचे को भी दीमक की तरह चाट जाएगा। जनता अब और अधिक समय तक कोरे आश्वासनों और फाइलों में बंद जांच रिपोर्टों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। देश को जरूरत है एक ऐसे सख्त और पारदर्शी कानून की, जो वर्दी की आड़ में अपराध करने वालों को भी उतनी ही स्पष्टता और कठोरता से सजा दे, जितनी आम नागरिकों के लिए तय की गई है।

यही लोकतंत्र और कानून के शासन की बुनियादी शर्त है।

लेकिन सवाल सिर्फ आरोपियों तक सीमित नहीं है। सवाल पुलिस की भूमिका का भी है। अगर पुलिस किसी आरोपी के साथ मारपीट करती है, उसे सार्वजनिक रूप से पीटती है या अपमानित करती है तो क्या उसके खिलाफ भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए?

जवाब होना चाहिए—हां।

क्योंकि पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार कानून से मिलता है, कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं।

गुजरात के भावनगर मामले में पुलिस की कार्रवाई को लेकर यही सवाल उठ रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने घटना को क्राइम सीन रीक्रिएशन बताया, जबकि वीडियो में आरोपी को बांधकर पीटे जाने के दृश्य सामने आए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नागरिक अधिकार संगठन PUCL ने इस मामले में कानूनी नोटिस जारी किया है।

अब सवाल यह है कि क्या इस मामले की स्वतंत्र जांच होगी?

क्या संबंधित पुलिसकर्मियों से पूछताछ होगी?

क्या वीडियो की फोरेंसिक जांच होगी?

क्या यह देखा जाएगा कि आरोपी को बांधने और पीटने का आदेश किसने दिया?

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर पुलिसकर्मी दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ वही कानून लागू होगा जिसकी वे आम नागरिकों से अपेक्षा करते हैं?

यही बात मानवाधिकार आयोगों पर भी लागू होती है।

मानवाधिकार आयोग का मतलब केवल शिकायत दर्ज करना नहीं है। उसका महत्व तब दिखाई देता है जब वह पुलिस और प्रशासन से जवाब मांगता है। हाल में पंजाब में कथित हिरासत में यातना के एक मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी और सीसीटीवी फुटेज, मेडिकल रिकॉर्ड तथा हिरासत से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने को कहा।

इससे यह भी साफ होता है कि मानवाधिकार संस्थाओं के पास ऐसे मामलों में कार्रवाई और जवाबदेही मांगने की भूमिका है। लेकिन जनता का सवाल यह है कि हर मामले में ऐसी सक्रियता क्यों दिखाई नहीं देती?

क्या कार्रवाई राजनीतिक पहचान देखकर बदलनी चाहिए?

क्या आरोपी के धर्म से कार्रवाई की गति बदलनी चाहिए?

क्या किसी आरोपी का राजनीतिक झुकाव पुलिस के रवैये को प्रभावित करना चाहिए?

इन सवालों का जवाब यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'नहीं' है, तो व्यवहार में भी उसका असर दिखाई देना चाहिए।

भारत के संविधान की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि राज्य नागरिक के अधिकारों की रक्षा करेगा। पुलिस राज्य की शक्ति का सबसे प्रत्यक्ष चेहरा है। इसलिए जब पुलिस गलत तरीके से किसी नागरिक के साथ व्यवहार करती है तो नुकसान सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि कानून पर जनता का भरोसा भी कमजोर होता है।

इसी वजह से यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि पुलिस के राजनीतिक नियंत्रण की व्यवस्था कितनी प्रभावी और जवाबदेह है।

गृह मंत्रालय या राज्य का गृह विभाग पुलिस प्रशासन पर राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण की व्यवस्था का हिस्सा होता है। लेकिन किसी मंत्री को किसी पुलिसकर्मी की व्यक्तिगत कार्रवाई के लिए सीधे दोषी ठहराना भी सही नहीं होगा। जिम्मेदारी तय करने के लिए यह देखना जरूरी है कि आदेश किसने दिया, किस अधिकारी को जानकारी थी, किस स्तर पर लापरवाही हुई और जांच में क्या सामने आया।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि गृह मंत्री को किसी आरोपी की तरह सजा कब दी जाएगी।

सही सवाल यह होना चाहिए कि अगर पुलिस विभाग में किसी अधिकारी या कर्मचारी ने कानून तोड़ा है तो उसके खिलाफ स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कब होगी और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार सजा कब मिलेगी?

यही लोकतांत्रिक सवाल है।

किसी सरकार को उसके विभाग की हर व्यक्तिगत गलती के लिए अपराधी कहना न्यायसंगत नहीं होगा। लेकिन अगर किसी मामले में संस्थागत विफलता सामने आती है, शिकायतों को दबाया जाता है या दोषी अधिकारियों को संरक्षण मिलता है तो राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल जरूर उठता है।

भारत में पुलिस सुधार की बहस कोई नई बात नहीं है। लंबे समय से पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करने, जांच और कानून-व्यवस्था की भूमिकाओं को बेहतर ढंग से अलग करने और पुलिस शिकायतों की स्वतंत्र व्यवस्था मजबूत करने की मांग होती रही है।

इन सुधारों का मकसद पुलिस को कमजोर करना नहीं बल्कि उसे मजबूत बनाना है।

एक ऐसी पुलिस जो अपराधी से कठोरता से निपटे, लेकिन कानून की सीमा में रहकर।

एक ऐसी पुलिस जो पीड़ित की मदद करे, लेकिन आरोपी को अदालत के फैसले से पहले सजा न दे।

एक ऐसी पुलिस जिसके सामने आम नागरिक भी शिकायत कर सके और पुलिसकर्मी के खिलाफ शिकायत होने पर भी निष्पक्ष जांच हो।

यही फर्क कानून और बदले की भावना के बीच होता है।

फैजल लखानी पर हत्या का गंभीर आरोप है। अगर आरोप अदालत में साबित होते हैं तो कानून के तहत कठोर सजा हो सकती है। लेकिन अदालत के फैसले से पहले पुलिस द्वारा पीटना न्यायिक व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता।

इसी तरह स्वतंत्र भारद्वाज पर गंभीर आरोप हैं तो जांच होनी चाहिए, सबूत अदालत में रखे जाने चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून के मुताबिक सजा होनी चाहिए। लेकिन अदालत से पहले सोशल मीडिया, राजनीतिक बहस या भीड़ को किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया फिलहाल चल रही है।

यहां न्यायपालिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।

लोग अदालत से यह उम्मीद करते हैं कि वह सरकार, पुलिस और आम नागरिक—तीनों के लिए एक समान कानून लागू करेगी। अदालत को यह देखना होता है कि गिरफ्तारी कानून के अनुसार हुई या नहीं, जांच निष्पक्ष है या नहीं और आरोपी के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित हैं या नहीं।

इसलिए अदालत का हर आदेश जनता की नजर में सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं होता। वह कानून के प्रति भरोसा भी बनाता या कमजोर करता है।

लेकिन अदालत से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वह मीडिया या सोशल मीडिया की धारणा के आधार पर फैसला करे।

न्याय सबूत के आधार पर होता है।

यही कारण है कि फैजल और स्वतंत्र भारद्वाज जैसे मामलों में हमें दो अलग-अलग अतियों से बचना चाहिए। पहली अति है आरोपी के अपराध को देखते हुए पुलिस को किसी भी कार्रवाई की छूट दे देना। दूसरी अति है बिना अदालत के फैसले के आरोपी को दोषी मान लेना।

दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक हैं।

आज असली बहस यही होनी चाहिए कि भारत में पुलिस की ताकत और नागरिक के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

अगर पुलिस किसी आरोपी को पीटती है तो उस पर सवाल उठना चाहिए।

अगर कोई नागरिक पुलिस पर झूठा आरोप लगाता है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए।

अगर कोई राजनीतिक कार्यकर्ता कानून तोड़ता है तो कार्रवाई होनी चाहिए।

और अगर कोई पुलिसकर्मी कानून तोड़ता है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

कानून की असली परीक्षा यही है कि वह अपने समर्थक और विरोधी में अंतर न करे।

लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को इसलिए विशेष सुरक्षा नहीं मिल सकती क्योंकि वह किसी विचारधारा के करीब है। और किसी व्यक्ति को इसलिए कानून से कम सुरक्षा नहीं मिल सकती क्योंकि उसके विचार बहुमत को पसंद नहीं हैं।

भारत में पुलिस को अपराध के खिलाफ कठोर होना चाहिए, लेकिन नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील भी।

मानवाधिकार संस्थाओं को राजनीतिक बहस से ऊपर उठकर हर शिकायत को तथ्य और सबूत के आधार पर देखना चाहिए।

अदालतों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस की जांच और कार्रवाई कानून के दायरे में रहे।

और सरकारों को यह समझना होगा कि पुलिस पर नियंत्रण का मतलब पुलिस को मनमानी की छूट देना नहीं है।

आखिर में सवाल फैजल या स्वतंत्र भारद्वाज तक सीमित नहीं है।

सवाल हर उस भारतीय नागरिक का है जो कभी पुलिस थाने में शिकायत लेकर जाता है।

सवाल उस पीड़ित का है जो न्याय चाहता है।

सवाल उस आरोपी का भी है जिसे कानून अपना पक्ष रखने का अधिकार देता है।

और सवाल उस पुलिसकर्मी का भी है जो ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करता है और चाहता है कि कुछ लोगों की गलत कार्रवाई से पूरे विभाग की छवि खराब न हो।

कानून का राज तभी मजबूत होगा जब अपराधी से लेकर पुलिसकर्मी और सत्ता में बैठे जिम्मेदार व्यक्ति तक—हर किसी के लिए जवाबदेही का रास्ता एक जैसा हो।

फैजल को पुलिस की मार से न्याय नहीं मिलेगा। न्याय अदालत के फैसले से मिलेगा।

स्वतंत्र भारद्वाज को सोशल मीडिया की बहस से दोषी या निर्दोष घोषित नहीं किया जा सकता। फैसला अदालत को करना है।

और पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी भीड़ या राजनीतिक दबाव नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां मानवाधिकार, पुलिस सुधार, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक जवाबदेही एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

भारत में रिश्ता अगर सचमुच संविधान से है तो पुलिस और नागरिक दोनों को संविधान की सीमा में रहना होगा।

कानून किसी का दुश्मन नहीं होना चाहिए और किसी का निजी हथियार भी नहीं।

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