हंसो मत रोओ संजय पराते का तीखा व्यंग्य

हंसो मत रोओ
मामला केवल एक विराम (कॉमा) का है। मोदी सरकार जीडीपी के आंकड़े दिखा रही है, कह रही है : रोओ मत, हंसो। हंसो कि देश प्रगति कर रहा है। दुनिया संकट में है, युद्ध की आग में सुलझ रहा है और इस संकट में भी हम प्रगति कर रहे हैं। वैश्विक व्यापार अस्थिर है, अमेरिका टैरिफ पर टैरिफ लगाए जा रहा है, कह रहा है रूस-ईरान का सस्ता तेल मत खरीदो, हमने खरीदना बंद कर दिया। उसने कहा, घुटने को पेट से लगाकर दिखाओ, हमने यह कसरत भी कर दिखाई। मोदीजी ने कहा, विदेशी मुद्रा का संकट है, सोना मत खरीदो। हमने प्याज और शक्कर जैसी तुच्छ चीजों के लिए सोने का बलिदान स्वीकार कर लिया। यह बलिदानियों का देश है। अंग्रेजों के जमाने से हम बलिदान करते आ रहे हैं। आज भी कर रहे हैं। केवल इसलिए न कि अडानी-अंबानी-सुभाष चंद्रा प्रगति करते रहे! अडानी-अंबानी-सुभाष चंद्रा की प्रगति याने देश की प्रगति। हमने उन्हें प्रगति दी, उन्होंने हमें जीडीपी दी। और क्या चाहिए, मोदी जी की जान ले लोगे क्या?!
लेकिन ये पब्लिक है, खुश होना जानती ही नहीं। कह रही है : रोओ, मत हंसो। रोओ कि महंगाई बढ़ रही है। वह प्याज की कीमत बढ़ने पर रो रही है। शक्कर की कीमत बढ़ने पर रो रही है। जीडीपी बढ़ने पर भी रो ही रही है। उसने हंसना कहां सीखा है? रोते-झींकते दम निकालने का अभ्यास जो करके रखा हुआ है! कह रही है : जीडीपी बढ़ गई, तो हमें क्या! हमारे लिए तो महंगाई कम नहीं हुई! हमारे लिए तो बेरोजगारी बढ़ गई!! पेपर लीक और घोटाले तो बदस्तूर जारी है! एक परीक्षा देकर बाहर भी नहीं निकल पाते कि परीक्षा कैंसल। ढंग से एक नौकरी पकड़ भी नहीं पाते कि नियुक्ति कैंसल। ऐसे में कैसे हंसे?
वैसे भी भारत की जीडीपी पूरी दुनिया में हंसने लायक ही रह गई है। कोई भी हमारे आंकड़ों को मानने के लिए तैयार नहीं है। सरकार रोजगार के विश्वसनीय आंकड़ों को दिखाती है, तो हमारे बेरोजगार हंस देते हैं। सरकार गरीबों की संख्या कम होने के आंकड़े दिखाती हैं, तो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं हंस देती हैं। इसलिए सरकार ने सोचा कि पूरी दुनिया हम पर हंसे और हमारे आंकड़ों पर थू-थू करें, उसके पहले हम ही हंस देते हैं।
मोदीजी आजकल इंस्टाग्राम पर प्रकट हो रहे हैं। जेन-ज़ी ने उनकी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का दिवालिया जो निकाल दिया है! लेकिन मुकाबला टक्कर का है। वे इंस्टाग्राम पर आधी रात को प्रकट हुए, 17-18 घंटे काम करने के बाद, अपनी नींद छोड़, थका-हारा चेहरा लेकर इंस्टाग्राम पर प्रकट हुए। जेन-ज़ी को विश्वास में लेने की कोशिश की, लेकिन जेन-ज़ी ने हंस दिया। मोदी जी ने हार नहीं मानी। इस बार वे फिर प्रकट हुए जीडीपी के लिए बधाई के साथ। लेकिन इस बार जनता ने भी झटक कर हंस दिया। वह जानती है कि अच्छे दिनों की याद में मोदी जी आज हंसी का खजाना है, टॉनिक है। रोती-झींकती उनकी जिंदगी में रोज-रोज प्रधानमंत्री नहीं आने वाले! फुर्सत निकालकर आ रहे हैं, तो मजे ले लो। यह आध्यात्मिक मजा है, स्वर्गीय मजा है। वरना कब तक आलू-प्याज-शक्कर जैसी भौतिक चीजों के लिए रोते रहोगे!
जनता जानती है कि प्रधानमंत्री के आंकड़े सही नहीं है, तो गलत भी नहीं है। गलत इसलिए नहीं कि आजादी के बाद से देश प्रगति पर प्रगति ही कर रहा है। कोई सरकार आज तक इस पर ब्रेक नहीं लगा पाई है। जैसे ही जीडीपी बढ़ती है, आय और संपत्ति की असमानता भी बढ़ जाती है। अमीर, और अमीर हो जाते हैं और गरीब, और गरीब। चूंकि यह अनवरत प्रगति आजादी के बाद से लगातार जारी है, इसलिए जीडीपी बढ़ने पर किसी को शक नहीं होना चाहिए।
शक ही करना है, इतनी ही मति मारी गई है, इतना ही रोने का मन कर रहा है, तो अपने पर शक करो, रोओ अपने पर। प्रधानमंत्री ने सोना न खरीदने के लिए कहा है। ये नहीं कहा था कि मंगलसूत्र से सोना नोच-नोच कर प्याज और शक्कर खरीदो। भाई साहब, यही कर रहे हैं और महंगाई का रोना रो रहे हैं। जेब में पैसे नहीं और बाजार में खरीदारी नहीं, तो काहे की महंगाई! लेकिन नहीं, सोना बेच-बेचकर खरीदारी करेंगे और महंगाई का रोना रोएंगे। फिर कहेंगे कि : हंसो मत, रोओ कि आलू-प्याज-शक्कर सब एक ही भाव बिक रहे हैं : टका सेर भाजी, टका सेर खाजा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो राजा को फांसी पर चढ़ा दिया था। लेकिन वो राजशाही थी, राजा जो चाहे, सो कर लें। उसकी मर्जी हुई, तो फांसी पर चढ़ गया। चाहता, तो साधुओं को भी फांसी पर चढ़ा सकता था कि देख कर आ, और हमें बता कि स्वर्ग के 'अच्छे दिन' कैसे लगते हैं। लेकिन ये तो लोकशाही का जमाना है, जहां राजा की कोई मर्जी नहीं चलती। चलती है, तो केवल जनता की। वह रोना चाहती है, तो रो रही है, दहाड़े मार-मारकर रो रही है। रो-रोकर सबको रुला रही है। प्रधानमंत्री हंसाना भी चाहते हैं, तो घुड़क कर कहती है : हंसो मत, रोओ। जनता के डर से सभी रो रहे हैं। रोते-रोते एक-दूसरे को देखते हैं और अच्छे दिनों की याद में फिर रोना शुरू कर देते हैं। प्रधानमंत्री जीडीपी का झुनझुना लेकर आ रहे हैं, लेकिन पब्लिक है कि उसका रोना बंद ही नहीं हो रहा है। ऐसा लगता है कि देश एक लंबे रुदन काल से गुजर रहा है, अमृत काल रुदन काल में बदल रहा है।
प्रधानमंत्री को गुस्सा आ रहा है। उसका बस चले, तो इस रुदाली जनता को फांसी पर चढ़ा दें। लेकिन बेबस है, क्योंकि लोकतंत्र का एक टुकड़ा टूटकर आजादी की चौखट पर फंस गया है। न दरवाजा बंद होगा, न जनता को फांसी पर चढ़ाया जा सकता है।

व्यंग्यकार संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)