संत रामपाल, भाजपा विधायक और हरियाणा की डेरा राजनीति: 2022 की बहस फिर क्यों लौटी?
चंडीगढ़, 17 जून 2026 | अटल हिन्द | राजकुमार अग्रवाल
हरियाणा की राजनीति में धार्मिक डेरों और चुनावी प्रभाव को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। सोनीपत के धनाना स्थित सतलोक आश्रम में संत रामपाल से मुलाकात करने पहुंचे भाजपा विधायकों के वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो गई है। वीडियो में कुछ जनप्रतिनिधि अपनी चुनावी सफलता का श्रेय संत रामपाल के आशीर्वाद को देते दिखाई दे रहे हैं, जबकि संत रामपाल स्वयं यह दावा करते सुनाई देते हैं कि उनके पास “विधायक बनवाने की चाबी” है।
खरखौदा से भाजपा विधायक पवन खरखौदा और नलवा से विधायक रणधीर पनिहार की संत रामपाल से मुलाकात के वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं। वीडियो में विधायक पवन खरखौदा अपनी चुनावी जीत को संत रामपाल के आशीर्वाद का परिणाम बताते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए संत रामपाल कथित रूप से कहते हैं कि विधायक बनवाने से लेकर अन्य कार्यों तक की “चाबी” उनके पास है।
यह घटनाक्रम हरियाणा की राजनीति में डेरों और धार्मिक संगठनों की भूमिका को लेकर पुराने सवालों को फिर से सामने ले आया है। दरअसल, ऐसा पहला अवसर नहीं है जब किसी प्रभावशाली धार्मिक संगठन और राजनीतिक नेताओं के संबंध चर्चा का विषय बने हों।
वर्ष 2022 में भी सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा को लेकर इसी प्रकार का राजनीतिक विवाद सामने आया था। उस समय डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पैरोल मिलने के बाद कई भाजपा नेता उनके ऑनलाइन सत्संगों और कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। करनाल की तत्कालीन मेयर रेणु बाला गुप्ता, डिप्टी स्पीकर रणबीर गंगवा सहित कई भाजपा नेताओं की मौजूदगी ने विपक्ष को सरकार पर निशाना साधने का अवसर दिया था।
उस दौरान भाजपा नेताओं ने इन कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी को व्यक्तिगत आस्था का विषय बताया था। तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश धनखड़ ने भी कहा था कि आस्था व्यक्ति का निजी मामला है और किसी की धार्मिक मान्यता को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि विपक्षी दलों ने इसे चुनावी राजनीति और वोट बैंक से जोड़कर सवाल उठाए थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में धार्मिक डेरों का सामाजिक प्रभाव लंबे समय से रहा है। यही कारण है कि चुनावी मौसम में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं का इन धार्मिक संस्थाओं के प्रति झुकाव अक्सर चर्चा और विवाद का विषय बन जाता है।
संत रामपाल के हालिया बयान और भाजपा विधायकों की मुलाकात के बाद एक बार फिर यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि क्या धार्मिक प्रभाव और राजनीतिक सफलता के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध है, या फिर यह केवल व्यक्तिगत आस्था और सामाजिक संपर्क का मामला है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।


