हिन्दी दिवस विशेष: भारत की राजभाषा का इतिहास फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) , यूट्यूब ,गूगल की एक रिपोर्ट के अनुसार,

हिन्दी : भारत की सांस्कृतिक चेतना, बहुलता और एकता का सशक्त प्रतीक है
लेखक/सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्/अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। तब से हर साल 14 सितंबर को देश में 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। हिंदी केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, बहुलता और एकता का सबसे सशक्त प्रतीक है।
संस्कृत की कोख से जनम लेकर, प्राकृत, अपभ्रंश और अवहट्ट के पड़ावों को पार करती हुई आज की वैश्विक और डिजिटल हिंदी का सफर अत्यंत गौरवशाली रहा है।नीचे हिंदी भाषा की उत्पत्ति, उसके विकासक्रम, ऐतिहासिक आंदोलनों, संवैधानिक दर्जे और वर्तमान समय में उसकी वैश्विक तथा तकनीकी भूमिका असाधारण है। 'हिंदी' शब्द का इतिहास जितना रोचक है, उतना ही यह भारत की भौगोलिक स्थिति से जुड़ा हुआ है।
भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार, 'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति 'सिंधु' से हुई है। प्राचीन काल में जब ईरानी (पारसी) भारत आए, तो उन्होंने भौगोलिक पहचान के रूप में सिंधु नदी के आस-पास के क्षेत्र को 'हिंदु' कहा। ईरानी भाषा में 'स' का उच्चारण 'ह' और 'ध' का उच्चारण 'द' के रूप में किया जाता था। इस प्रकार 'सिंधु' शब्द 'हिंदु' बना। 'हिंद' शब्द में फारसी का संबंधवाचक प्रत्यय 'ई' जुड़ने से 'हिंदी' शब्द बना, जिसका प्रारंभिक अर्थ था—"हिंद (भारत) का" या "हिंद की भाषा"।
मध्यकाल में महान सूफी संत और कवि अमीर खुसरो ने अपनी रचनाओं में इस देश की भाषा के लिए 'हिंदवी' और 'हिन्दी' दोनों शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना 'खालिकबारी' में लिखा, "ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराय नैना बनाए बतियां। कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां, न लेहु काहे लगाये छतियां।" हिंदी के विकासक्रम को मुख्य रूप से तीन व्यापक चरणों में विभाजित किया जा सकता है।
पहला आदिकाल (सन 1000 ई. से 1400 ई. तक), इस काल में हिंदी अपने शैशव काल में थी। अपभ्रंश के प्रभाव से मुक्त होती हुई भाषा एक नया आकार ले रही थी। इस काल में मुख्य रूप से वीरगाथा काल की रचनाएं हुईं। रासो साहित्य (जैसे चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो) इस युग की पहचान है। इस समय की भाषा में डिंगल, पिंगल और अपभ्रंश मिश्रित देशभाषा का प्रयोग प्रमुख था। दूसरे मध्यकाल (सन 1400 ई. से 1850 ई. तक), मध्यकाल को हिंदी साहित्य का 'स्वर्ण युग' माना जाता है।
इस काल में हिंदी की दो मुख्य उपभाषाएं,बोलियां,ब्रजभाषा और अवधी,साहित्य के शिखर पर पहुंचीं। इसे दो भागों में बांटा जाता है। प्रथम भक्तिकाल-कबीरदास की सधुक्कड़ी, मलिक मुहम्मद जायसी की अवधी (पद्मावत), गोस्वामी तुलसीदास की अमर कृति रामचरितमानस (अवधी), और सूरदास के कृष्ण पद (ब्रजभाषा) ने हिंदी को जन-जन के कंठ का हार बना दिया। द्वितीय रीतिकाल-इस काल में भाषा अधिक परिष्कृत, दरबारी और आलंकारिक हुई।
महाकवि बिहारी, भूषण और घनानंद ने ब्रजभाषा को साहित्यिक सौंदर्य की पराकाष्ठा पर पहुंचाया। तीसरे आधुनिक काल (सन 1850 ई. से अब तक), आधुनिक काल में आकर हिंदी गद्य का विकास हुआ और 'खड़ी बोली' (जो आज की मानक हिंदी है) ने ब्रज और अवधी का स्थान ले लिया। भारतेंदु युग- (1850–1900): भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है।
उन्होंने नाटक, निबंध और पत्रिकाओं के माध्यम से खड़ी बोली को जनमानस की मुख्य भाषा बनाया।द्विवेदी युग (1900–1920)- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पत्रिका सरस्वती के माध्यम से हिंदी के व्याकरण को परिष्कृत किया और उसे त्रुटिहीन मानक रूप दिया। छायावाद और उसके बाद- जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे रचनाकारों ने हिंदी को दार्शनिक और भावुकता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।इसके बाद प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता के दौर ने हिंदी को पूरी तरह आधुनिक और यथार्थवादी बना दिया।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी ने पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए 'सेतु' का कार्य किया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर असम तक, देश की विविध भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करने का जिम्मा हिंदी ने उठाया।गैर-हिंदी भाषियों का समर्थन- हिंदी को राष्ट्रभाषा या संपर्क भाषा बनाने की वकालत सबसे पहले गैर-हिंदी भाषी मनीषियों ने की थी।
राजा राममोहन राय (बंगाल), महात्मा गांधी (गुजरात), सुभाष चंद्र बोस (बंगाल), और बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र) ने पुरजोर शब्दों में कहा था कि स्वतंत्रता के लिए पूरे देश की एक संपर्क भाषा होना अनिवार्य है, और वह केवल हिंदी हो सकती है।महात्मा गांधी ने 1918 में इंदौर के 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की अध्यक्षता करते हुए कहा था कि "हिन्दी जनमानस की भाषा है और इसे देश की राष्ट्रभाषा होना चाहिए।"
उन्होंने इसे 'राष्ट्रीय एकता की रीढ़' माना था। देश जब 1947 में आजाद हुआ, तो सबसे बड़ा सवाल यह था कि आधिकारिक कामकाज की भाषा किसे बनाया जाए। भारतीय संविधान सभा में लंबी बहस हुई। ऐतिहासिक निर्णय (14 सितंबर 1949)-- संविधान सभा ने काफी विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को सर्वसम्मति से देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा स्वीकार किया। इस निर्णय को व्योहार में लाने वालों में राजेंद्र सिंह, काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त और सेठ गोविंद दास जैसे विद्वानों का अथक संघर्ष शामिल था।
विशेष रूप से 14 सितंबर को व्योहार राजेंद्र सिंह का 50 वां जन्मदिन भी था। भारतीय संविधान के भाग 17 और अनुच्छेद 343 (1) में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि-- "संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।" हालांकि निर्णय 1949 में हुआ था, लेकिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहल पर 14 सितंबर 1953 से प्रतिवर्ष देश में आधिकारिक तौर पर 'हिंदी दिवस' मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना और आम जनता में इसके प्रति गौरव का भाव जगाना था। अक्सर लोगों में 'हिंदी दिवस' को लेकर भ्रम रहता है।
भारत में दो अलग-अलग तिथियों पर हिंदी से जुड़े उत्सव मनाए जाते हैं। तिथि 14 सितंबर व 10 जनवरी। ऐतिहासिक संदर्भ 1949 में संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा घोषित करने की स्मृति में। 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम 'विश्व हिंदी सम्मेलन' की याद में। मुख्य उद्देश्य भारत के भीतर प्रशासनिक और व्यावहारिक स्तर पर हिंदी को बढ़ावा देना।
वैश्विक मंच पर हिंदी का प्रचार-प्रसार करना और इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाना। आज के दौर में हिंदी केवल सरकारी दफ्तरों या फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने अपनी ताकत के बल पर वैश्विक बाजार और मनोरंजन जगत पर कब्जा कर लिया है। भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) ने हिंदी को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। मध्य पूर्व के देशों, रूस, चीन, अफ्रीका और यूरोप के कई हिस्सों में लोग हिंदी फिल्मों और गानों के जरिए हिंदी शब्द सीख रहे हैं।
एथनोलॉग और विश्व के भाषाई सर्वेक्षणों के अनुसार, हिंदी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली शीर्ष तीन भाषाओं में शामिल है। विश्व भर में लगभग 60 से 70 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, समझते या लिख सकते हैं। भारत के अलावा फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, गयाना, नेपाल और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में हिंदी बोलने वालों की भारी तादाद है। दुनिया के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में भी अब हिंदी का गूंज सुनाई देने लगी है। यूएन की आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया हैंडल्स पर हिंदी में महत्वपूर्ण जानकारियां प्रसारित की जाती हैं। एक समय आशंका जताई जा रही थी कि कंप्यूटर और इंटरनेट के आने से अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ जाएगा और हिंदी पिछड़ जाएगी। लेकिन हिंदी ने अपनी लचीली प्रकृति के कारण डिजिटल दुनिया को पूरी तरह अपने रंग में ढाल लिया है।
गूगल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में सामग्री की मांग अंग्रेजी की तुलना में तेजी से बढ़ रही है, जिसमें हिंदी सबसे आगे है। आज ग्रामीण इलाकों का आम नागरिक भी गूगल असिस्टेंट या एलेक्सा पर "हिंदी में गाने सुनाओ" या "आज का मौसम कैसा है" बोलकर तकनीक का लाभ उठा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (जैसे चैटजीपीटी, जेमिनी) अब उच्च स्तरीय और शुद्ध हिंदी में संवाद करने में पूरी तरह सक्षम हैं।
फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब पर हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स की बाढ़ आ गई है।'हिंग्लिश' (हिंदी + अंग्रेजी का मिश्रण) और देवनागरी लिपि दोनों में ही डिजिटल संवाद अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। सफलता के इन तमाम शिखरों के बावजूद, हिंदी के सामने आज भी कुछ गंभीर आंतरिक चुनौतियां मौजूद हैं। आज भी हमारे समाज में अंग्रेजी बोलने वाले को अधिक 'बुद्धिमान' और हिंदी बोलने वाले को कमतर आंकने की संकीर्ण मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। रोजगार के बड़े अवसरों, कॉरपोरेट जगत और उच्च शिक्षा (विशेषकर चिकित्सा और इंजीनियरिंग) में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है।
हमें यह समझना होगा कि अंग्रेजी ज्ञान की भाषा हो सकती है, लेकिन हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएं हमारे संस्कारों की भाषा हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने की वकालत इस दिशा में एक सराहनीय कदम है। हिंदी को समृद्ध करने के फेर में इसे इतना कठिन नहीं बना दिया जाना चाहिए कि यह आम बोलचाल से दूर हो जाए। हिंदी की खूबसूरती उसकी सहजता और दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता में है।
सारांश यह कि अपभ्रंश की पगडंडियों से शुरू होकर डिजिटल और एआई के सुपर हाइवे तक का हिंदी का सफर बेहद जीवंत और प्रेरणादायी रहा है। हिंदी दिवस केवल 14 सितंबर को मनाया जाने वाला एक औपचारिक सरकारी उत्सव या भाषणबाजी का माध्यम नहीं होना चाहिए। यह दिन आत्म-मंथन का है कि हम अपने दैनिक जीवन, व्यवसाय और लेखन में अपनी राजभाषा को कितना स्थान दे रहे हैं। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश को यदि कोई एक धागा आपस में मजबूती से जोड़ सकता है, तो वह हिंदी और हमारी क्षेत्रीय भाषाओं का अनूठा समन्वय ही है। जब तक हम स्वयं अपनी भाषा पर गर्व नहीं करेंगे, तब तक उसे वैश्विक पटल पर सर्वोच्च स्थान नहीं दिला पाएंगे। भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी ने इस सम्बन्ध में जो कहा कि--- "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।" आज ही नहीं सदैव प्रासंगिक रहेंगी।