जस्टिस संजय करोल: न्यायाधीश भगवान नहीं, इंसान हैं

Atal Hind Team Online23 August 20269 min read45 viewsभारत
जस्टिस संजय करोल: न्यायाधीश भगवान नहीं, इंसान हैं

न्यायाधीश भगवान नहीं, इंसान हैं—विनम्रता में ही न्याय की असली ताकत

23 अगस्त 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स /सौरभ वार्ष्णेय

लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों, संसद और सरकार के कामकाज से नहीं मापी जाती। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इस बात से भी तय होती है कि देश का सामान्य नागरिक अपने अधिकारों और न्याय के लिए किस संस्था पर भरोसा करता है। जब शासन-प्रशासन से निराशा मिलती है, जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी बात कहीं नहीं सुनी जा रही, तब उसकी नजर अंतत: अदालत की ओर जाती है। न्यायालय उसके लिए केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि अंतिम उम्मीद का दरवाजा होता है। इसलिए न्यायपालिका की जिम्मेदारी असाधारण रूप से बड़ी है।

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इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल का विदाई समारोह में दिया गया संदेश विशेष महत्व रखता है। उन्होंने न्यायपालिका के मानवीय पक्ष पर जोर देते हुए कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं हैं और उनसे हर मामले में बिल्कुल सही फैसला देने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। पहली नजर में यह कथन सामान्य लग सकता है, लेकिन इसके भीतर भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक गहरा संदेश छिपा है। न्यायाधीश का पद जितना शक्तिशाली है, उतना ही जिम्मेदारीपूर्ण भी है। इस शक्ति की वास्तविक गरिमा अचूक होने के दावे में नहीं, बल्कि विनम्रता, संवेदनशीलता और संविधान के प्रति निष्ठा में है।

न्यायाधीश भी आखिर इंसान ही हैं। वे कानून, संविधान, उपलब्ध साक्ष्यों, दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर निर्णय लेते हैं। उनके सामने आने वाला प्रत्येक मुकदमा अपनी परिस्थितियों में अलग होता है। कई बार तथ्य जटिल होते हैं, साक्ष्य अधूरे होते हैं और कानून की व्याख्या को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण संभव होते हैं। ऐसे में न्यायाधीश सर्वोत्तम संभव निर्णय देने का प्रयास करता है, लेकिन मनुष्य होने के नाते उससे भूल की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। यही मानवीय वास्तविकता है।

इसलिए न्यायाधीशों को भगवान की तरह अचूक मानना न तो न्यायपालिका के हित में है और न ही लोकतंत्र के। न्यायाधीश के पद का सम्मान होना चाहिए, लेकिन व्यक्ति-पूजा नहीं। किसी न्यायाधीश के निर्णय पर प्रश्न उठाना और उसके तर्कों की संवैधानिक या कानूनी समीक्षा होना न्यायपालिका की कमजोरी नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। न्यायपालिका की शक्ति किसी व्यक्ति की अचूकता से नहीं, बल्कि संस्था की स्वतंत्रता, निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादा से आती है।

जस्टिस करोल के संदेश का दूसरा और शायद अधिक महत्वपूर्ण पक्ष न्याय के मानवीय चेहरे से जुड़ा है। अदालत में आने वाला व्यक्ति केवल एक 'याचिकाकर्ताÓ, 'प्रतिवादीÓ, 'अपीलकर्ता या 'अभियुक्त नहीं होता। वह एक जीवित इंसान होता है, जिसके पीछे एक परिवार, संघर्ष, उम्मीद और कभी-कभी पूरी जिंदगी की पीड़ा छिपी होती है। किसी मुकदमे के कागजों के पीछे किसी मां की चिंता हो सकती है, किसी पिता की आखिरी उम्मीद हो सकती है, किसी मजदूर की रोजी-रोटी का सवाल हो सकता है या किसी परिवार के भविष्य का संकट हो सकता है।

न्यायालय में खड़ा व्यक्ति अक्सर पहले ही किसी कठिन परिस्थिति से गुजर चुका होता है। यदि वह आर्थिक रूप से कमजोर है, कानूनी प्रक्रिया से अनजान है या सामाजिक रूप से प्रभावशाली नहीं है, तो अदालत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उसके लिए न्यायालय केवल कानून की किताबों और प्रक्रियाओं का संसार नहीं, बल्कि वह स्थान है जहां उसे उम्मीद होती है कि कम से कम उसकी बात निष्पक्ष रूप से सुनी जाएगी।

यहीं से न्याय का मानवीय पक्ष सामने आता है। न्याय केवल यह नहीं है कि कानून की धारा क्या कहती है। न्याय यह भी है कि उस कानून को लागू करते समय परिस्थितियों, संवैधानिक मूल्यों और मानव गरिमा को कितना महत्व दिया गया। कानून का अक्षर आवश्यक है, लेकिन कानून की आत्मा को समझना भी उतना ही जरूरी है। यदि कानून की प्रक्रिया के बीच इंसान ही दिखाई देना बंद हो जाए, तो न्याय व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक सकती है।

भारतीय संविधान नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। इसलिए न्यायालय का प्रत्येक निर्णय केवल दो पक्षों के बीच विवाद समाप्त करने का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में स्थापित करने का अवसर भी होता है। न्यायाधीश को इसी व्यापक दृष्टि के साथ अपने दायित्व का निर्वहन करना होता है।
न्यायाधीश के लिए कानून का ज्ञान अनिवार्य है, लेकिन केवल कानून का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। न्यायिक विवेक, धैर्य, संवेदनशीलता, निष्पक्षता और विनम्रता भी उतनी ही आवश्यक हैं। कठोर कानूनी भाषा और न्यायिक गरिमा के बीच मानवीय संवेदना के लिए स्थान बना रहना चाहिए। अदालत की गंभीरता का अर्थ यह नहीं कि वहां संवेदना के लिए कोई जगह न हो।

जस्टिस संजय करोल

इसीलिए जस्टिस करोल द्वारा न्यायाधीशों में विनम्रता की आवश्यकता पर जोर देना बेहद महत्वपूर्ण है। विनम्रता का अर्थ निर्णय लेने की क्षमता में कमजोरी नहीं है। इसके विपरीत, अपनी सीमाओं को समझना ही वास्तविक शक्ति है। जो व्यक्ति यह मानता है कि उससे कभी गलती नहीं हो सकती, वह आत्ममुग्धता का शिकार हो सकता है। लेकिन जो यह समझता है कि उसे हर मामले में पूरी सावधानी, निष्पक्षता और ईमानदारी से सर्वोत्तम निर्णय देने का प्रयास करना है, वही न्याय की वास्तविक भावना के करीब पहुंचता है।
आज भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने अनेक चुनौतियां हैं। अदालतों में लंबित मामलों का बोझ, न्यायिक प्रक्रिया की लंबाई, मुकदमों का खर्च, गरीब और सामान्य नागरिक के लिए कानूनी सहायता की कठिनाइयां तथा कानूनी प्रक्रिया की जटिलता ऐसे प्रश्न हैं, जिनका समाधान लगातार खोजा जाना चाहिए। आम नागरिक के लिए न्याय केवल उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है; न्याय समय पर और सम्मानजनक तरीके से उपलब्ध होना भी आवश्यक है।

कई बार वर्षों तक चलने वाला मुकदमा अपने आप में पीड़ा बन जाता है। न्याय में देरी का प्रभाव केवल अदालत के रिकॉर्ड पर नहीं पड़ता, बल्कि संबंधित परिवारों के जीवन पर पड़ता है। किसी व्यक्ति की संपत्ति, नौकरी, विवाह, शिक्षा, व्यवसाय या सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला यदि वर्षों तक लंबित रहता है तो उसका प्रभाव आने वाली पीढिय़ों तक महसूस हो सकता है। इसलिए न्यायपालिका के सामने केवल सही फैसला देने की चुनौती नहीं है, बल्कि समयबद्ध और प्रभावी न्याय देने की चुनौती भी है।

हालांकि इस पूरी स्थिति के लिए केवल न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा। मुकदमों की बढ़ती संख्या, सरकारी विभागों की बड़ी संख्या में मुकदमेबाजी, बार-बार होने वाली अपीलें, प्रक्रियात्मक जटिलताएं और संसाधनों की सीमाएं भी न्यायिक बोझ को बढ़ाती हैं। इसलिए न्याय व्यवस्था में सुधार एक सामूहिक जिम्मेदारी है।
इसके साथ यह भी जरूरी है कि जनता न्यायपालिका से अपेक्षाएं रखते समय उसकी संवैधानिक सीमाओं को समझे। अदालतें कानून और संविधान के दायरे में निर्णय करती हैं। हर सामाजिक या राजनीतिक समस्या का समाधान अदालत के आदेश से नहीं हो सकता। न्यायपालिका शासन का विकल्प नहीं है और न ही उसे राजनीतिक या प्रशासनिक जिम्मेदारियों का स्थान लेना चाहिए। संस्थाओं के बीच संतुलन और संवैधानिक मर्यादा लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

जस्टिस करोल के संदेश में 'धर्मÓ को कर्तव्य के रूप में देखने का विचार भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। न्यायाधीश का धर्म किसी धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक कर्तव्य से तय होता है। उसका धर्म है—निष्पक्ष रहना, कानून का सम्मान करना, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और बिना किसी भय या पक्षपात के न्याय करना। न्यायाधीश की सर्वोच्च निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए।

न्यायपालिका के प्रति जनता का विश्वास किसी एक फैसले से नहीं बनता। यह विश्वास वर्षों में निर्मित होता है और कभी-कभी एक गलत धारणा या अनुभव से कमजोर भी हो सकता है। इसलिए अदालत में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार का महत्व बहुत अधिक है। जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति अपने पक्ष में फैसला लेकर अदालत से बाहर निकले। लेकिन उसे यह जरूर महसूस होना चाहिए कि उसकी बात सुनी गई, उसके तर्कों पर विचार किया गया और उसके साथ कानून के अनुसार समान व्यवहार हुआ।

न्यायालय की गरिमा केवल उसकी भव्य इमारतों, न्यायाधीशों की औपचारिक पोशाक या कठिन कानूनी भाषा से नहीं बनती। उसकी वास्तविक गरिमा तब दिखाई देती है जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी अदालत की चौखट पर खड़े होकर यह विश्वास कर सके कि उसके अधिकारों की रक्षा होगी। जिसके पास पैसा नहीं, सत्ता नहीं और राजनीतिक प्रभाव नहीं, यदि वह भी न्याय की उम्मीद कर सकता है, तभी न्यायपालिका लोकतंत्र की सबसे मजबूत संस्थाओं में गिनी जाएगी।आज के दौर में न्यायपालिका के बारे में सार्वजनिक बहस भी लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने न्यायिक फैसलों पर तत्काल प्रतिक्रियाओं का वातावरण बना दिया है।

एक फैसला आते ही समाज दो हिस्सों में बंट जाता है—एक उसे सही बताता है और दूसरा गलत। ऐसे समय में यह समझना जरूरी है कि न्यायिक निर्णय भावनाओं की लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि कानून, संविधान और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किए जाते हैं। इसी तरह न्यायपालिका को भी यह ध्यान रखना होगा कि उसके निर्णयों की भाषा और तर्क आम नागरिक के लिए समझने योग्य हों।

जस्टिस करोल की लंबी न्यायिक यात्रा का संदेश भी यही है कि न्यायिक सेवा केवल अधिकार का पद नहीं, बल्कि निरंतर आत्ममंथन की प्रक्रिया है। न्यायाधीश जितना अधिक अनुभव प्राप्त करता है, उतना ही उसे यह समझ में आता है कि हर मामला केवल कानून की धारा नहीं है। हर मामले के पीछे मनुष्य हैं, उनकी परिस्थितियां हैं और उनके जीवन पर निर्णय का सीधा प्रभाव पड़ता है।इसलिए न्यायाधीश का विनम्र होना किसी प्रकार की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

विनम्र न्यायाधीश अपने पद की गरिमा को कम नहीं करता, बल्कि उसे और ऊंचा करता है। वह यह स्वीकार करता है कि न्याय करने की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है और इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए उसे हर दिन सीखना, सुनना और स्वयं का मूल्यांकन करना होगा।अंतत: न्याय का उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं है। न्याय का उद्देश्य नागरिक के भीतर यह विश्वास पैदा करना है कि व्यवस्था उसके साथ खड़ी है। अदालत में आने वाला व्यक्ति यदि यह महसूस करके लौटता है कि उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार हुआ, उसकी गरिमा सुरक्षित रही और संविधान ने उसे अकेला नहीं छोड़ा, तो यही न्यायपालिका की सबसे बड़ी सफलता है।

जस्टिस संजय करोल का संदेश इसलिए केवल उनके विदाई समारोह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह न्यायपालिका, कानून के विद्यार्थियों, वकीलों और आम नागरिक—सभी के लिए विचार का विषय है। न्यायाधीशों को भगवान मानना उचित नहीं; उन्हें संवैधानिक दायित्व निभाने वाले मनुष्य के रूप में देखना अधिक स्वस्थ लोकतांत्रिक दृष्टिकोण है। उनसे ईमानदारी, निष्पक्षता, विवेक और संवेदनशीलता की अपेक्षा होनी चाहिए, लेकिन उन्हें अचूक मान लेना स्वयं न्याय की अवधारणा को कमजोर करता है।न्याय की असली ताकत आदेश की कठोरता में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है जो नागरिक को अदालत से मिलता है। न्यायाधीश की महानता इस बात में नहीं कि वह स्वयं को त्रुटिहीन समझे, बल्कि इस बात में है कि वह अपनी मानवीय सीमाओं को पहचानते हुए भी संविधान और न्याय के प्रति पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाए। न्यायाधीश भगवान नहीं, इंसान हैं। और शायद यही स्वीकार करना
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।

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