केरल का अनोखा मंदिर: लड़के साड़ी पहनकर मंदिर में दर्शन क्यों करते हैं?

केरल का अनोखा मंदिर: जहां पुरुष साड़ी पहनकर आते हैं दर्शन करने? जानिए इस अनोखी धार्मिक परंपरा की वजह, इतिहास, स्थानीय मान्यता और इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बातें।
केरल का अनोखा मंदिर: जहां पुरुष साड़ी पहनकर करते हैं देवी की पूजा
नई दिल्ली / 10 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
भारत की संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं में कई ऐसे रहस्य और परंपराएं छिपी हैं, जो पहली बार सुनने पर काफी हैरान करती हैं। आमतौर पर हम मंदिरों में महिलाओं और पुरुषों को अपने पारंपरिक पहनावे में पूजा-अर्चना करते देखते हैं। लेकिन देश में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां की परंपरा सबसे अलग और अनोखी है। इस मंदिर में पुरुष केवल धोती या कुर्ते में दर्शन करने नहीं आते, बल्कि उन्हें महिलाओं की तरह पूरा श्रृंगार करना पड़ता है।
यह अनोखा मंदिर दक्षिण भारत के केरल राज्य के कोल्लम जिले में स्थित है। इस मंदिर का नाम कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर है। इस मंदिर में हर साल एक विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों की संख्या में पुरुष भाग लेते हैं। इस उत्सव की सबसे खास बात यह है कि इसमें हिस्सा लेने वाले पुरुष महिलाओं की तरह साड़ी पहनते हैं, गहने पहनते हैं और पूरा मेकअप करते हैं। इसके बाद ही उन्हें मंदिर परिसर में प्रवेश करने और पूजा करने की अनुमति मिलती है।
कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर में मनाए जाने वाले इस प्रसिद्ध उत्सव को 'चाम्याविलक्कु' (Chamyavilakku) के नाम से जाना जाता है। यह उत्सव हर साल मार्च के महीने में आयोजित किया जाता है और यह दो दिनों तक चलता है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर रोशनी और भक्ति के माहौल में डूब जाता है। उत्सव की रात को हजारों पुरुष 16 श्रृंगार करके अपने हाथों में जलते हुए दीये लेकर देवी मां की परिक्रमा करते हैं। यह दृश्य बहुत ही अलौकिक और देखने लायक होता है।
इस मंदिर में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि देश और विदेश के अलग-अलग हिस्सों से भी लोग आते हैं। इस परंपरा को लेकर लोगों के मन में गहरी आस्था और श्रद्धा है। कई लोग अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए इस उत्सव में हिस्सा लेते हैं। माना जाता है कि जो भी पुरुष सच्चे मन से साड़ी पहनकर और देवी मां का ध्यान करके यह पूजा करता है, उसकी हर इच्छा पूरी हो जाती है। चाहे नौकरी की बात हो, सेहत की हो या परिवार की सुख-शांति की, देवी मां सभी की पुकार सुनती हैं।
इस अनोखी परंपरा के पीछे क्या है पौराणिक कहानी?
कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर में पुरुषों के साड़ी पहनने की इस परंपरा के पीछे कई पौराणिक कहानियां और लोक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे लोकप्रिय कहानी चरवाहों से जुड़ी हुई है। प्राचीन समय में इस जगह पर बहुत घने जंगल हुआ करते थे। गांव के चरवाहे रोजाना अपनी गायों और मवेशियों को चराने के लिए इस जंगल में आया करते थे। एक दिन कुछ चरवाहों को जंगल में खेलते समय एक नारियल मिला।
चरवाहों ने उस नारियल को तोड़ने के लिए पास में पड़े एक पत्थर पर मारा। जैसे ही नारियल पत्थर से टकराया, उस पत्थर से अचानक खून बहने लगा। यह देखकर सभी चरवाहे बहुत डर गए और तुरंत गांव की तरफ भागे। उन्होंने गांव के बुजुर्गों और ज्ञानियों को इस घटना के बारे में बताया। जब गांव के लोग वहां पहुंचे और उस पत्थर को ध्यान से देखा, तो उन्हें समझ आया कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं है, बल्कि उसमें देवी मां की दिव्य शक्ति विराजमान है।
गांव के लोगों ने फैसला किया कि वे उस स्थान पर देवी मां की पूजा-अर्चना करेंगे। लेकिन उस समय वहां कोई मंदिर या पूजा की कोई पक्की व्यवस्था नहीं थी। चरवाहों ने देवी मां को प्रसन्न करने के लिए एक अनोखा रास्ता निकाला। वे खुद महिलाओं के कपड़े पहनकर, बाल बनाकर और फूल लगाकर देवी मां की पूजा करने लगे। उन्होंने नारियल के दूध से बना एक खास प्रसाद देवी को चढ़ाया, जिसे स्थानीय भाषा में 'कोट्टन' कहा जाता है।
चरवाहों की इस मासूम और सच्ची भक्ति से देवी मां बहुत प्रसन्न हुईं। कहा जाता है कि उसके बाद से ही उस स्थान पर पूजा का सिलसिला शुरू हो गया। धीरे-धीरे लोगों की मनोकामनाएं पूरी होने लगीं और उस जगह पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। चरवाहों की उसी पुरानी घटना की याद में आज भी पुरुष महिलाओं का रूप धारण करके मंदिर आते हैं और अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
चाम्याविलक्कु उत्सव और श्रृंगार का महत्व
चाम्याविलक्कु उत्सव के दौरान मंदिर का नजारा पूरी तरह से बदल जाता है। ऐसा लगता है मानो कोई बहुत बड़ा सांस्कृतिक मेला लगा हो। मंदिर के आसपास की दुकानों और शेड्स में पुरुषों को तैयार करने के लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं। इसके लिए बकायदा मेकअप आर्टिस्ट, ब्यूटीशियन और ड्रेसिंग रूम तैयार किए जाते हैं। जो पुरुष घर से तैयार होकर नहीं आ पाते, वे मंदिर के पास बने इन अस्थायी कमरों में आकर तैयार होते हैं।
इस उत्सव में हर उम्र के पुरुष हिस्सा लेते हैं। छोटे बच्चों से लेकर नौजवान और बुजुर्गों तक, सभी बहुत उत्साह के साथ महिलाओं की पोशाक पहनते हैं। वे सुंदर-सुंदर साड़ियां चुनते हैं, अपने बालों में गजरा लगाते हैं, कानों में झुमके और गले में हार पहनते हैं। कई पुरुष तो इतना बारीकी से श्रृंगार करते हैं कि उन्हें देखकर पहचानना भी मुश्किल हो जाता है कि वे पुरुष हैं या महिला। इस पूरे काम में परिवार की महिलाएं भी अपने घर के पुरुषों की मदद करती हैं।
उत्सव की रात को जब हजारों की संख्या में पुरुष हाथों में जलते हुए दीये लेकर कतार में खड़े होते हैं, तो वह दृश्य देखने योग्य होता है। इन दीयों की रोशनी में मंदिर का कोना-कोना जगमगा उठता है। श्रद्धालु धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए देवी मां के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। इस दौरान ढोल-नगाड़ों की आवाज और देवी मां के जयकारों से पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। यह उत्सव पूरी रात चलता है और तड़के सुबह समाप्त होता है।
इस उत्सव का एक और महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू भी है। यह मंदिर और यह त्योहार समाज में समानता का संदेश देता है। यहां पुरुष अपनी वेशभूषा और अहम को भूलकर पूरी तरह से भक्ति में लीन हो जाते हैं। इसके अलावा, किन्नर (थर्ड जेंडर) समुदाय के लोग भी इस उत्सव में बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह मंदिर देश के उन गिने-चुने स्थानों में से एक है जहां ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को भी पूरा सम्मान और बराबरी का अधिकार मिलता है।
श्रद्धालुओं की आस्था और मनोकामना पूर्ति
कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था बहुत गहरी है। लोगों का मानना है कि यदि कोई पुरुष किसी भी तरह की समस्या से जूझ रहा हो, तो वह इस मंदिर में आकर मन्नत मांग सकता है। कई लोग अच्छी नौकरी मिलने, शादी में आ रही रुकावटों को दूर करने या गंभीर बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए मन्नत मांगते हैं। जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है, तो वे अगले चाम्याविलक्कु उत्सव में साड़ी पहनकर धन्यवाद देने आते हैं।
कई ऐसे श्रद्धालु भी हैं जो पिछले कई सालों से लगातार इस उत्सव में शामिल हो रहे हैं। वे इसे केवल एक रस्म नहीं मानते, बल्कि इसे देवी मां के प्रति अपने समर्पण का जरिया मानते हैं। पुरुषों का कहना है कि जब वे साड़ी पहनकर मंदिर परिसर में कदम रखते हैं, तो उनके मन के अंदर का सारा अहंकार खत्म हो जाता है। उन्हें एक अजीब सी मानसिक शांति और ऊर्जा का अहसास होता है जो उन्हें पूरे साल सकारात्मक बनाए रखती है।
समय के साथ-साथ इस उत्सव की ख्याति बहुत बढ़ गई है। अब यह केवल केरल या दक्षिण भारत तक सीमित नहीं रहा है। देश के विभिन्न राज्यों जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर भारत से भी लोग इस अनोखी पूजा को देखने और इसमें हिस्सा लेने आते हैं। विदेशी पर्यटक भी इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में कोल्लम पहुंचते हैं। सोशल मीडिया के दौर में इस उत्सव की तस्वीरें और वीडियो अक्सर वायरल होते रहते हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि भारत की विविधता और आस्था का यह मंदिर एक बेहतरीन उदाहरण है। जहां एक तरफ आधुनिक दुनिया में कई तरह के भेदभाव देखने को मिलते हैं, वहीं कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर में भक्ति और आस्था के आगे सारे नियम और सामाजिक बंदिशें ढीली पड़ जाती हैं। साड़ी पहनकर दर्शन करने की यह सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा, नियम और उत्साह के साथ निभाई जा रही है।