आरएसएस के बारे में धूल झोंकने में एक बार फिर नाकाम रहे भागवत

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आलेख : सवेरा, अनुवाद : संजय पराते
आरएसएस के सरसंघचालक (सुप्रीमो) मोहन भागवत की आरएसएस की विचारधारा – और उसके कट्टर हिंदुत्व ब्रांड को – नरम, सहनशील और समावेशी दिखाने की समय-समय पर की जाने वाली कोशिशें ज़्यादा से ज़्यादा बेकार और अर्थहीन होती जा रही हैं। कोई भी इन उपदेशों पर यकीन नहीं करता, यहाँ तक कि उनके अपने खाकीधारी कार्यकर्ता भी नहीं करते। भागवत के विचारों की हालिया मिसाल न्यूयॉर्क, यूएसए में झलकी, जहाँ उन्होंने कहा, “अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत (इंडिया) में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा।”
आरएसएस के संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े संगठनों ने ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ (सार्वभौमिक एकता उत्सव) नाम से एक सार्वजनिक बैठक रखी थी, जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोगों को बुलाया गया था। हालांकि, बाद में कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्हें नहीं बताया गया था कि भागवत विशिष्ट अतिथि हैं, और अगर उन्हें पता होता, तो वे नहीं आते। भागवत ने लोगों को संबोधित किया। ऐसा करते हुए वे स्वामी विवेकानंद के 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में दिए गए भाषण की नकल कर रहे थे। ऐसा ढोंग करते हुए वह बेकार में ही यह उम्मीद लगाए हुए थे कि इससे शायद कुछ ख्याति उन्हें भी मिल जाएं।
पिछले साल 28 अगस्त को नई दिल्ली में आरएसएस के शताब्दी समारोह के सिलसिले में बोलते हुए भागवत ने कहा था, “जो लोग यह सोचते हैं कि इस्लाम नहीं रहेगा, वे हिंदू विचारों से निर्देशित नहीं हैं। हिंदू दर्शन इस तरह से नहीं सोचता। जब दोनों तरफ विश्वास होगा, तभी यह संघर्ष समाप्त होगा। सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम सब एक हैं।”
हाल के दिनों में भागवत की ये बातें और ऐसे ही शब्द, कई वजहों से कहे गए हैं, जिनके बारे में हम बाद में बात करेंगे। उससे पहले, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि कई मौकों पर भागवत ने मुसलमानों और ईसाइयों के लिए (भारत में रहने की) शर्तें साफ़ तौर पर रखी हैं।
मुस्लिम विरोधी ज़हर की जड़ें
“अगर मुसलमान और ईसाई, अपनी पूजा, रीति-रिवाज़ और परंपराओं को छोड़े बिना भी, इस देश की पूजा करते हैं, भारतीय संस्कृति का पालन करते हैं, और भारतीय पूर्वजों पर गर्व करते हैं, तो वे हिंदू हैं...।" ऐसा उन्होंने 18 नवंबर, 2025 को गुवाहाटी में कहा।
कुछ साल पहले, उन्होंने और भी ज़्यादा स्पष्ट रूप से कहा था : "इस्लाम के लिए डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन साथ ही, मुसलमानों को अपना सर्वोच्चता दिखाने वाली बयानबाज़ी छोड़नी पड़ेगी। हम एक ऊँची नस्ल के हैं ; हमने कभी इस भूमि पर राज किया था, और फिर से राज करेंगे ; सिर्फ़ हमारा रास्ता सही है, बाकी सबका गलत है ; हम अलग हैं, इसलिए हम वैसे ही रहेंगे; 'हम साथ नहीं रह सकते' -- उन्हें यह सब बात छोड़ देनी चाहिए। असल में, यहाँ रहने वाले सभी लोगों को -- चाहे वे हिंदू हों या कम्युनिस्ट -- यह तर्क छोड़ देना चाहिए।" भागवत ने 10 जनवरी, 2023 को आरएसएस प्रकाशनों से बात करते हुए यह कहा था।
हिंदू आक्रामकता के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने उसी साक्षात्कार में कहा, “आप देखिए, हिंदू समाज 1,000 साल से ज़्यादा समय से युद्धरत है – यह लड़ाई विदेशी हमलों, विदेशी असर और विदेशी साज़िशों के ख़िलाफ़ चल रही है। … उन लोगों का आक्रामक होना बहुत स्वाभाविक है, जो लोग युद्ध में हैं।”
और, ऐसा ही होता है। असल में, भागवत जो बात ज़्यादा सोच-समझकर कह रहे हैं, उसकी घोषणा आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक और इसके सबसे प्रभावशाली विचारक एमएस गोलवलकर ने 1939 में अपनी खास किताब ‘वी, ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में ही कर दी थी। यहूदियों को निकालने के लिए जर्मनी की तारीफ करने के बाद, गोलवलकर लिखते हैं, “इस नजरिए से, जो चालाक पुराने देशों के अनुभव से मंज़ूर है, हिंदुस्तान में रहने वाली विदेशी नस्लों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का आदर करना और उसे मानना सीखना होगा, हिंदू नस्ल और संस्कृति, यानी हिंदू राष्ट्र के महिमामंडन के अलावा कोई और विचार नहीं रखना होगा और हिंदू नस्ल में घुल-मिल जाने के लिए अपना अलग अस्तित्व खत्म कर देना होगा, या देश में रहकर, पूरी तरह से हिंदू राष्ट्र के अधीन रहना होगा, उनका कुछ भी दावा मान्य नहीं होगा, उनके पास कोई विशेषाधिकार नहीं होंगे, यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं।”
इस संदर्भ में देखें तो, मुसलमानों के लिए भागवत का उपदेश एकदम साफ़ हैं। वह अच्छी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं – और ज़्यादा भोले-भाले लोगों को धोखा देने की भी कोशिश कर रहे हैं – लेकिन इन भावनाओं की जड़ें गुरुजी द्वारा बनाई गई और आरएसएस द्वारा दशकों से पोषित ज़हरीले स्रोत में गहराई तक जमी हुई हैं। जो लोग सोचते हैं कि शायद कुछ पुनर्विचार किया गया है, कुछ नया स्टैंड लिया जा रहा है, उनके लिए यह याद करना अच्छा होगा कि मोदी राज में, खासकर मुसलमानों और आम तौर पर अल्पसंख्यकों के साथ, कैसा व्यवहार बर्ताव किया गया है।
अल्पसंख्यकों पर हमले
इस सीमित जगह में यह पूरी तरह बताना मुश्किल है कि पिछले 12 सालों में मुसलमानों (और ईसाइयों को भी) को किन-किन तरीकों से अलग-थलग किया गया है, डराया गया है और उन्हें कमजोर किया गया है। ऐसा करने के लिए कानूनी और गैरकानूनी, दोनों तरह के हथकंडे इस्तेमाल किए गए हैं। आर्थिक रूप से ज्यादा पिछड़े मुस्लिम समुदाय को फ़ायदा पहुँचाने वाली कई योजनाएं या तो खत्म कर दी गई है या उन पर रोक लगा दी गई है। अलग-अलग स्तर पर उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में तेजी से कमी आई है। सत्ताधारी भाजपा के पास सिर्फ़ एक मुस्लिम सांसद है, और राज्यों में सैकड़ों विधायकों में से भी मुस्लिम विधायक मुट्ठी भर है। अब एक ऐसा कानून लागू है, जो भारत की नागरिकता चाहने वाले पड़ोसी देशों के मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है। नागरिकता पर सवाल उठाने के लिए मतदाता सूची में बदलाव को हथियार बनाया गया है। गैर-कानूनी आप्रवासन की पहचान करने के नाम पर, कई जगहों पर मुसलमानों को सताया गया है। सरकार की आलोचना करने से लेकर फिलिस्तीन का समर्थन करने तक, मुसलमानों को कई तरह के कामों के लिए पुलिस कार्यवाही का सामना करना पड़ता है। सैकड़ों मुसलमान जटिल कानूनी मामलों का सामना कर रहे हैं या झूठे मामलों में जेल में हैं। अपराधों के आरोपी कई और मुसलमान फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए हैं। भाजपा शासित 13 राज्यों में धर्मांतरण के खिलाफ पारित हुए कानूनों का इस्तेमाल मुसलमानों और ईसाइयों को परेशान करने और उन पर मुकदमा चलाने के लिए किया जा रहा है। चार राज्यों ने तथाकथित समान नागरिक संहिता पारित किए हैं, जो वास्तव में मुस्लिम पर्सनल लॉ को दबाने की कोशिश करते हैं। दर्जनों मामलों में, पुलिस ने अलग-अलग अपराधों के आरोपी मुसलमानों के घरों को गैर-कानूनी तरीके से गिरा दिया है। कुछ मामलों में, पूरे समुदाय पर जुर्माना लगाया गया है। गुजरात के बिलकिस बानो मामला जैसे गंभीर सांप्रदायिक हिंसा के पिछले मामलों में कई आरोपियों को गलत नियमों के तहत जेल से रिहा करने की कोशिश की जा रही है। सांप्रदायिक हिंसा के ज्यादातर मामले अनिश्चित समय तक चलते रहते हैं। हिंदुत्व समूहों द्वारा किए गए बम धमाकों के मामले गवाहों के पलट जाने के कारण विफल हो गए हैं। इन सबने कट्टर हिंदुत्व तत्वों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया है।
ऊपर बताए गए कानूनी तरीकों के साथ-साथ, मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ खुली हिंसा भी बहुत बढ़ गई है। अनगिनत पूजा स्थलों या धार्मिक सभाओं पर हमले हुए हैं, पवित्र चीजों को नुकसान पहुंचाया गया है और झूठे मामले दर्ज किए गए हैं। बीफ खाने या ले जाने, धर्मांतरण करने, महिलाओं का अपहरण करने या उनकी तस्करी वगैरह के झूठे आरोपों का इस्तेमाल समुदायों को डराने-धमकाने या उन पर हमला करने के लिए किया गया है। 2014 से मॉब लिंचिंग के मामले, जिनमें ज्यादातर मुसलमान और कुछ दलित पुरूषों के खिलाफ हुए हैं, भयानक रूप से बढ़ गए हैं। अनुमान है कि ऐसे मामले 189 से 279 तक हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों में, खासकर त्योहारों के दौरान, बेइज्जती वाले गानों के जरिए उन्हें भड़काना आम बात हो गई है। ऐसी उकसावे बाज़ी पर कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त करना सांप्रदायिक हिंसा और प्रशासनिक कार्रवाई की ओर ले जाता है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय को और नुकसान पहुंचता है।
यह छोटी-सी जानकारी, जिसके विवरण 'लोकलहर' के पिछले अंकों में मिल सकते हैं, यह दिखाने के लिए है कि भागवत की ‘एकता’ और ‘सबको साथ लेकर चलने’ और सभी धर्मों के सम्मान की बातें -- सब बकवास हैं। असल में, गुरुजी के सिद्धांतों को आरएसएस के अगुआ संगठन, जो अब समाज में फैले हुए हैं, पूरी तरह से लागू कर रहे हैं, और सत्ता में बैठे लोग उन्हें बिना किसी रोक-टोक के छूट दे रहे हैं। जो लोग सोचते हैं कि भागवत की बातें एक नया स्टैंड लेने की कोशिश हैं, उन्हें यह सब देखने की ज़रूरत है।
भागवत के बयानों के पीछे क्या है?
भागवत के इस ढोंग का, कि आरएसएस (और हिंदुत्व) दूसरे धर्मों, खासकर इस्लाम का सम्मान करता है, और पूरी इंसानियत को शामिल करने और एकता के लिए कोशिश करता है, का एक सीधा सादा कारण है। यह ढोंग, उन लोगों का दिल जीतने की बढ़ती अहमियत को दिखाता है, जो आरएसएस और उसके मोर्चे भाजपा के प्रति आलोचनात्मक रुख रखते हैं। इसमें भारत के लोग और विदेशी लोग, चाहे वे भारतीय मूल के हों या नहीं, दोनों शामिल हैं। इन तबकों का दिल जीतना इतना जरूरी क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि भाजपा और उसका उस्ताद आरएसएस, दोनों भारत में घिरे हुए हैं। आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार की ज़बरदस्त नाकामी, बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में नाकामी से लेकर भयानक बेरोजगारी, बढ़ता कर्ज़, कम आय, बहुत ज्यादा आर्थिक कुप्रबंधन, अति-धनिकों के प्रति बेशर्मी भरा झुकाव और अमेरिका के आर्थिक दबाव के आगे समर्पण -- इन सब कारणों से, खासकर युवाओं में, नाराजगी बढ़ी है। हाल ही में भ्रष्ट परीक्षा प्रणाली के खिलाफ युवाओं का बढ़ता विरोध, और उसके बाद, किसान संगठनों और ट्रेड यूनियनों द्वारा जन विरोधी नीतियों के खिलाफ संयुक्त रूप से किया गया विरोध, मोदी के राज से बढ़ते मोहभंग के संकेत हैं। चुनावी सफलताओं के बावजूद, आरएसएस/भाजपा जानती है कि लोगों में गुस्सा और नाराजगी किस कदर तेजी से बढ़ रहा है और यह असंतोष मजबूती से जमी ताकतों को हटा सकता है। इसलिए, भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष लोगों कुछ हिस्सों को जीतने के लिए कदम उठाने की ज़रूरत है। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यह एहसास बढ़ रहा है कि मोदी सरकार ‘चुनावी तानाशाही’ की ओर बढ़ रही है और दुनिया भर में घोर दक्षिणपंथी सरकारों के सभी लक्षण दिखा रही है – जनतंत्र पर रोक, अप्रवासन विरोधी रवैया, मीडिया पर रोक और इस्लाम के प्रति दुर्भावना। मोदी से यह नाराजगी प्रवासी भारतीयों में भी अभिव्यक्त हो रही है, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन में भागवत के सार्वजनिक कार्यक्रमों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में दिखा।
बहरहाल, भागवत और आरएसएस की अपने शताब्दी वर्ष में स्वीकार्य बनने की ये कोशिशें नाकाम हो गई हैं। कार्यक्रम प्रबंधन और झूठ कुछ समय के लिए ही काम कर सकते हैं, हमेशा के लिए नहीं। और, आरएसएस को अपने ही प्रचारक के भारत का प्रधानमंत्री बनने से जो फायदे हुए हैं, वे अब अपनी हद पार कर चुके हैं – अब भागवत और उनकी खाकी सेना के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। मीठी-मीठी बातें आरएसएस/भाजपा द्वारा दिए गए दर्द पर बाम (मरहम) का काम नहीं कर सकतीं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)