ताकतवर की सेवा करना और कमजोर को धोखा : क्या यही न्याय है?

Atal Hind Team Online12 September 202611 min read14 viewsभारत
ताकतवर की सेवा करना और कमजोर को धोखा : क्या यही न्याय है?

न्याय प्रणाली पर सवाल: ताकतवर की सेवा और कमजोर से छल

आलेख : एम ए बेबी, अनुवाद : संजय पराते

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ पर प्रिंट मीडिया में वह सवाल पूछा है, जो उनके पद पर बैठे बहुत कम लोगों ने पूछने की हिम्मत की है : हम, भारत के नागरिक, कितने आजाद हैं? 'द ट्रिब्यून' में उनका जवाब बहुत ही नरम था : संवैधानिक अदालतों ने ज़रूरी संवेदनशीलता या ताकत नहीं दिखाई है ; आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन किया जाता है और कोई सजा नहीं मिलती, और कई मामलों में अदालतें मूकदर्शक बनी हुई हैं ; और कॉलेजियम प्रणाली नाकाम हो गई है ; यह पूरी तरह से धुंधला हो गया है। एक आदमी, जिसने विधि के क्षेत्र में आधी सदी बिताई हो और सबसे ऊंची पीठ पर बैठा हुआ था, जब यह कहता है, तो देश को सुनना चाहिए।

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असल में, सीपीआई(एम) भी सालों से कमोबेश यही कहती आ रही है। जो टूट रहा है, वह है न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा। मुद्दा किसी एक या दूसरे न्यायाधीश का नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रणाली का है। अपनी देरी, अपने चयन और अपनी सामाजिक बनावट के कारण, यह ताकतवर लोगों की सेवा करने और बाकी लोगों को विफल करने पर उतारू है।

देरी का अंकगणित

शुरू करते हैं उन आंकड़ों से, जो कानून मंत्री ने 23 जुलाई, 2026 को राज्यसभा में रखा था। 16 जुलाई, 2026 तक, 5.64 करोड़ मामले लंबित थे ; सुप्रीम कोर्ट में 96,024, हाई कोर्ट में 64.72 लाख और जिला अदालतों में 4.98 करोड़। केवल सुप्रीम कोर्ट में ही, 10,094 मामले दस साल से ज़्यादा और 26 तीस साल से ज़्यादा से निपटारे इंतज़ार कर रहे हैं। हाई कोर्ट में स्वीकृत 1,122 न्यायाधीशों के मुकाबले 781 न्यायाधीश हैं ; यानी 30 प्रतिशत खाली हैं। जिलों की अदालतों में 7,310 पद  खाली हैं। विधि आयोग ने 1987 में हर दस लाख लोगों पर पचास न्यायाधीशों की सिफारिश की थी ; जबकि इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, हर दस लाख लोगों पर कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या केवल 15 हैं।

इन आंकड़ों में वे लोग छुपे हुए हैं, जिन्हें इसके लिए भुगतना पड़ता हैं। एनसीआरबी के 2024 की जेल सांख्यिकी बताती है कि भारत की जेलों में बंद 5.11 लाख लोगों में से 73 प्रतिशत विचाराधीन हैं, जिन्हें बेगुनाह माना जाता है, और वे न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं ; इनमें से ज्यादातर दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम हैं। न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है, और भारत में बड़े पैमाने पर एक वर्ग को न्याय देने से इंकार किया जाता है।

देरी, एक राजनीतिक हथियार

देरी भी एक राजनीतिक हथियार बन गई है और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी खुद को एक राजनीतिक हथियार के रूप में अपना इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ याचिकाएं अगस्त 2019 में दायर की गई थीं। मार्च 2020 से जुलाई 2023 तक उन्हें एक बार भी सूचीबद्ध नहीं किया गया। फैसला 11 दिसंबर, 2023 को आया, जम्मू-कश्मीर के विभाजन के चार साल और चार महीने बाद, जब सरकार की मंशा पूरी हो गई। फिर भी न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल की इस बात को स्वीकार करते हुए कि राज्य का दर्जा यथाशीघ्र बहाल किया जाएगा, पुनर्गठन अधिनियम पर फैसला देने से इंकार कर दिया। अक्टूबर 2025 में केंद्र ने राज्य के दर्जे पर जवाब देने के लिए चार सप्ताह का और समय मांगा ; तब से मामले की सुनवाई नहीं हुई है। सोनम वांगचुक 24 सुनवाइयों के दौरान हिरासत में रहे ; जब सरकार ने फैसले का सामना करने के बजाय आदेश वापस ले लिया, तो न्यायालय के लिए निर्णय करने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

सीपीआई(एम) इस तरीके को अंदर से समझती है। अगस्त 2019 में, कॉमरेड सीताराम येचुरी को श्रीनगर एयरपोर्ट से दो बार वापस भेजा गया। कॉमरेड मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, जो तब 72 साल के थे और बीमार थे और बिना किसी नजरबंदी आदेश के हिरासत में रखे गए थे, के लिए उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। विधि में बंदी प्रत्यक्षीकरण सबसे पुरानी याचिका है ; यह राज्य को किसी व्यक्ति को अदालत में पेश करने और उसकी हिरासत को सही ठहराने के लिए मजबूर करता है। इस याचिका पर सुनवाई के बजाय अदालत ने एक अनुमति जारी की। एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव को अपने साथी से मिलने के अलावा किसी और मकसद से श्रीनगर जाने की इजाज़त नहीं दी गई, चेतावनी दी गई कि इसके अलावा कुछ भी करना आदेश का उल्लंघन करना होगा, और लौटने पर शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया। उसके बाद ही, 5 सितंबर को, तारिगामी को एम्स जाने का आदेश दिया गया। याचिका का अंतिम रूप से मई 2023 में यह कहते हुए निपटारा कर दिया गया कि कामरेड तारिगामी अब आज़ाद हैं। उस पतझड़ से आज तक सैकड़ों कश्मीरियों के बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का कभी भी गुणदोष के आधार पर फैसला नहीं किया गया है।

जमानत नहीं, जेल

13 सितंबर को उमर खालिद हिरासत में छह साल पूरे कर लेंगे। अभी आरोप तय नहीं हुए हैं ; मुकदमा शुरू नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उन्हें एक ऐसी साजिश में उनकी मुख्य और अहम भूमिका के लिए जमानत देने से मना कर दिया था, जिसकी किसी अदालत ने जांच नहीं की है। मई में एक अलग पीठ ने उस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए और फिर से कहा कि यूएपीए के तहत भी, जमानत नियम है और जेल अपवाद ; कुछ दिनों बाद एक तीसरी पीठ ने इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया। इस बीच, उमर खालिद अभी भी तिहाड़ जेल में बंद हैं, जबकि अदालत अपने पर ही बहस कर रही है।

भीमा कोरेगांव मामले का नौवां साल चल रहा है। फादर स्टेन स्वामी की जुलाई 2021 में हिरासत में मौत हो गई। सुरेंद्र गाडलिंग को लगभग आठ साल बाद मई 2026 में जमानत मिली, लेकिन वे दूसरे मामले में जेल में ही हैं। अब तक बचे हुए सभी आरोपियों को जमानत मिल चुकी है ; किसी पर भी मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि अभी भी आरोप तय नहीं हुए हैं, और फोरेंसिक जांच से पता चला है कि गलत फाइलें मैलवेयर से कंप्यूटर में प्लांट की गई थीं, लेकिन कभी भी इसकी कानूनी जांच नहीं हुई। कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा है, और अदालत का दखल न देना ही इस प्रक्रिया को जिंदा रखता है।

वोट का अधिकार और अदालत, जिसने नज़रें फेर लीं

वोट देने के अधिकार के मामले को अदालत ने जिस तरह छोड़ दिया है, उससे इस अधिकार का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। भारत के चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम हटा दिए हैं, जो मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत हैं। फैसले के लिए रखे गए लगभग 60 लाख नामों में से 27.16 लाख को वोट देने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। लगभग 38 लाख अपील दाखिल की गईं हैं। एक आरटीआई जवाब से पता चलता है कि अगस्त तक, मुश्किल से दो प्रतिशत अपीलों का फैसला हुआ था। 13 अप्रैल को, मतदान से दस दिन पहले, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सिर्फ अपीलों के लंबित रहते, कोई नागरिक वोट देने का हकदार नहीं है। 24 अप्रैल को, चुनाव के पहले चरण के अगले दिन, उसने परेशान लोगों को कलकत्ता हाई कोर्ट भेजा और मतदान प्रतिशत पर अपनी खुशी जताई। 27 मई को उसने एसआईआर को सही ठहराया। अगस्त के आखिर में, जब 31 चुनाव क्षेत्रों के नतीजों को दिखाया गया, जहां नाम हटाने की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी, तो मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, क्या अदालत इस पर नए चुनाव का आदेश दे सकती है?

अदालत को पता ही नहीं था। जस्टिस बागची ने खुद कहा कि चुनाव आयोग ने बिहार की सुनवाई में वादा किया था कि 2002 की मतदाता सूची में नाम होने पर मतदाताओं को दस्तावेज दिखाने की ज़रूरत नहीं है और अब वह सुधार कर रहा है, और फिर उन्होंने पूछा कि क्या होगा, अगर जीत का अंतर दो प्रतिशत हो और चिन्हित किए गए 15 प्रतिशत मतदाता वोट न दे सकें। सवाल पूछने के बाद, पीठ ने चुनाव होने दिया। हमारे पोलिट ब्यूरो ने मई के निर्णय को लोकतंत्र के लिए एक बड़ा झटका बताया, क्योंकि यह मतदान को स्वीकृत दस्तावेजों पर निर्भर बनाता है, एनआरसी दूसरे रास्ते से यही काम करता है। 2026 में 27 लाख बंगालियों को मतदाता सूची से बाहर किया गया। इसके बाद तीसरे चरण में, 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 6.15 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।

विचारधारात्मक बहाव

यह सब अचानक नहीं हुआ है। पीठ सरकार के साथ बह रही है, और कभी-कभी उससे आगे भी। जुलाई 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सीपीआई(एम) को गाजा में नरसंहार के खिलाफ विरोध आयोजित करने की इजाज़त देने से मना कर दिया था, और कहा कि हम देशभक्त हैं, अपने देश को देखो और गजा के बजाय कचरा डंपिंग, प्रदूषण, सीवरेज और बाढ़ जैसे मामलों पर ध्यान दो। उसने यहां तक कहा कि जिस पार्टी का तुम प्रतिनिधित्व करते हो, उसके अनुसार हम विदेशी मामलों को नहीं समझ सकते। एक संवैधानिक अदालत ने फिलिस्तीन के साथ एकजुटता को देशद्रोही माना, और अपनी परिभाषा में वामपंथ को संदेहास्पद माना। अदालत को इस बात का पता ही नहीं था कि यह वही स्टैंड था, जिसका महात्मा गांधी ने हमारे उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान समर्थन किया था, और नेहरू के बाद से हर भारतीय सरकार ने इस स्टैंड का समर्थन किया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की एक सभा में कहा कि देश बहुमत की इच्छा के अनुसार चलेगा ; उनके खिलाफ महाभियोग की नोटिस पर कभी कार्रवाई नहीं हुई और वे अप्रैल 2026 में सेवा निवृत्त हो गए। एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश राज्यसभा में पहुंच गए ; सुप्रीम कोर्ट के एक और न्यायाधीश राजभवन में पहुंच गए। नवंबर 2025 में, राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की राय ने राज्यपालों के लिए समय सीमा तय करने वाले अपने ही अप्रैल के फैसले को रद्द कर दिया।

सबक यह नहीं है कि अदालत हिल नहीं सकती। जब नीट लीक के बाद लाखों छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतर आए, तो अदालत ने 1 सितंबर को देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दीं और कहा कि सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना दंड कानून के तहत जुर्म नहीं है। यह वही अदालत है, जिसके मुख्य न्यायाधीश ने मई में बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। मई और सितंबर के बीच जो बदला, वह कानून नहीं था, बल्कि यह आंदोलन था।

कॉलेजियम, कार्यकारी और रास्ता

न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली इसके मूल में है। कॉलेजियम किसी को कोई कारण और उत्तर नहीं देता। 'द वायर' के एक विश्लेषण में पाया गया है कि 2021 से 2026 के बीच उच्च न्यायालयों में नियुक्त 593 न्यायाधीशों में से लगभग 80 प्रतिशत उच्च जाति, चार प्रतिशत दलित, दो प्रतिशत आदिवासी और 14 प्रतिशत से कम ओबीसी हैं ; सर्वोच्च न्यायालय के लगभग एक तिहाई वर्तमान न्यायाधीश ब्राह्मण हैं, और पाँच वर्षों में एक महिला को नियुक्त किया गया है। फिर भी, सरकार के विकल्प निकृष्ट है। कार्यपालिका पहले से ही कॉलेजियम की सिफारिशों पर कुंडली मारकर बैठी रहती है और राजनीतिक आधार पर आपत्ति जताती है, जैसा कि उसने 2024 में सीपीआई (एम) समर्थक कहे जाने वाले केरल के एक वकील के साथ किया था। इसका उद्देश्य, जैसा कि हमारे पोलिट ब्यूरो ने दिसंबर 2022 में कहा था, नियुक्तियों पर कार्यकारी नियंत्रण है, जिसका हमारी पार्टी बिना किसी समझौते के विरोध करती है। जवाबदेही का मामला भी कुछ बेहतर नहीं है ; मार्च 2025 में जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी पाई गई, जांच में पाया गया कि मई 2026 में हर आरोप साबित हो गया, और उनको हटाने का प्रस्ताव अभी भी मतदान का इंतजार कर रहा है।

सीपीआई(एम) लंबे समय से यह मानती है कि न तो बंद कॉलेजियम और न ही कार्यकारी के दबदबे वाला आयोग उसे मंज़ूर है। ज़रूरत है एक व्यापक आधार वाले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की, जिसकी स्थापना कानून से हो, जिसमें न्यायपालिका, विधानमंडल, बार और नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व हो, जो सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो, जिसकी कार्यप्रणाली उजागर मानदंडों और कारणों के आधार पर संचालित हो,  जिसे यह सुनिश्चित करने का अधिकार हो कि बेंच में देश की सामाजिक बनावट की झलक मिले, और जिसे न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जांच करने का अधिकार हो। कॉमरेड बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में ऐसा ही विधेयक रखा था। हमारी पार्टी का स्टैंड भी यही है।

लेकिन कोई भी संस्थागत डिज़ाइन अपने आप ऐसे जज पैदा  नहीं कर सकती, जिनमें जस्टिस गुप्ता जैसी रीढ़ हो। न्यायपालिका राज्य का हिस्सा है, और आज राज्य एक कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक गठबंधन के हाथों में है, जो चाहता है कि अदालत भी चुनाव आयोग की तरह उसकी आज्ञा का पालन करें। न्यायिक स्वतंत्रता कभी भी ऊपर से मिला तोहफा नहीं होती। इसकी रक्षा हमेशा उन लोगों ने की है, जो अदालती कक्ष के बाहर लामबंद हुए हैं। छात्रों ने इस गर्मी में यह साबित कर दिया ; बंगाल के मतदाता भी, जो अपने नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए लड़ रहे हैं, अब यह साबित कर रहे हैं। एक ऐसी न्यायपालिका के लिए संघर्ष, जो सत्ता के बजाय संविधान के प्रति जवाबदेह हो, एक ऐसा संघर्ष है, जिसे मेहनतकशों को खुद ही लड़ना होगा। सीपीआई(एम) इस संघर्ष का अभिन्न हिस्सा होगी।

एम ए बेबी
एम ए बेबी

लेखकएम ए बेबी सीपीआई(एम) के महासचिव और पूर्व सांसद हैं। वे केरल के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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