परदेश में मानव गरिमा का जाप, देश में मनु का उत्पात!

Atal Hind Team Online6 September 202611 min read20 viewsभारत
परदेश में मानव गरिमा का जाप, देश में मनु का उत्पात!

परदेश में मानव गरिमा का जाप, देश में मनु का उत्पात!

आर एस एस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत अमरीका हो आये हैं। इस विजिट की भूमिका अप्रैल में संघ सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की अगुआई में अमेरिका गए संघ प्रतिनिधिमंडल द्वारा बनाई जा चुकी थी। जब 23 अप्रैल को वाशिंगटन की हडसन इंस्टिट्यूट में अमरीकी विदेश विभाग की डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी बेथनी पोलोस मोरिसन महोदया के सामने संघ के अमरीका के प्रति सदाचरण की प्रस्तुति करते हुए संघ के विचारक माने जाने वाले राम माधव ने  कहा था कि : ‘अमरीका ने कहा ईरान से तेल खरीदना बंद करो, रूस से तेल मत खरीदो, हमने तेल खरीदना बंद कर दिया । अमरीका ने 50% टैरिफ लगा दिया, हमने मान लिया, बाद में औरों से ज्यादा 18% के टैरिफ लगा दिये, हमने मान लिया। विपक्ष की कड़ी आलोचनाओं के बाद भी हमने अमरीका का हर कहा माना। इसके बाद भी अमेरिका भारत पर भरोसा नहीं करता,आखिर वह भारत से चाहता क्या है।‘ ध्यान रहे यहां ‘भारत’ से आशय भारत देश से नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है, जिसके खिलाफ अमेरिकी आयोग ने प्रतिबंध लगाने सहित अनेक सिफारिशें की हुई हैं।

डाक्साब की यात्रा इसकी निरंतरता में थी। इस यात्रा में करने को उन्होंने काफी कुछ किया, कहने के लिए भी बहुत कुछ कहा। जैसे : हिन्दू मुसलमानों के सहअस्तित्व की दुहाई दी, अमरीकी उद्योग घरानों के प्रतिनिधि मंडल से मुलाक़ात की, जिस इस्कॉन के खिलाफ उनके कुनबे के साधू-संत हाथ धोकर पीछे पड़े रहते हैं, उसमें पहुँच कर खाना खिलाने के समारोह में हाजिरी लगाई, मेडिसन चौराहे पर भा भा भा ओं की सभा को संबोधित किया।

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

इसमें सबसे दिलचस्प था इन अमेरिकी-भारतीयों को डोनाल्ड ट्रम्प का नाम लिए बिना उसके प्रिय नारे सबसे पहले अमेरिका  “अमरीका फर्स्ट” की याद दिलाना। उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों के कर्तव्य स्पष्ट किए और उनका आह्वान किया कि भले भारत के प्रति वफादार रहो, न रहो, अमेरिका के प्रति वफादारी में कमी नहीं आनी चाहिए। उनके शब्द थे कि  “भारत (जन्मभूमि) से जुड़ाव रखना व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर है, कोई अनिवार्यता नहीं है। मगर हर हालत में उन्हें अपनी कर्मभूमि अमेरिका के प्रति सच्चा और निष्ठावान होना चाहिए।“  यह ऐसी सलाह थी जिसे देने की न कोई आवश्यकता थी, ना ही इसका कोई औचित्य ही था।  

कूटनीतिक संवाद संहिता में ऐसी बातें कही नहीं जाती। अमरीका, जो दुनिया के लगभग सभी देशों के नागरिकों के सम्मिश्रण से बना देश है, उसमें इससे पहले शायद ही किसी भी देश के नेता ने इस तरह के द्वैत की बात करके स्वयं के देश को गौण करने या प्राथमिकता में ही न रखने का सुझाव दिया  दिया हो। इस तरह से यह राम माधव से आगे की बात थी, जो कही तो आप्रवासी भारतीयों से जा रही थी, लेकिन सुनाई  ट्रम्प को जा रही थी।  

विडम्बना की बात यह है कि यह सब ठीक उस समय कहा जा रहा था, जब अमरीकी प्रशासन और उसका राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से भारत को धमकाने और अपमानित करने की मुहिम में उन्मादी तरीके से भिड़ा हुआ है। पहलगाम के बाद के घटना विकास सहित पिछले कुछ महीनों में भारत के साथ की गयी उसकी बदसलूकी और व्यापार समझौते के लिए बांह मरोड़े जाने की बातें छोड़ भी दें, तो डाक्साब की यात्रा के दौरान, उनके द्वारा कही गयी इतनी ‘अच्छी अच्छी बातों’ के बावजूद ट्रम्प प्रशासन बाज नहीं आ रहा था। ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने 'द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम' रिपोर्ट के हवाले से कहा कि चीन के सामानों की री-पैकेजिंग या हेरफेर करने वाले देशों में "भारत पूरी तरह से अमेरिका के रडार स्क्रीन पर है"। उन्होंने सख्त प्रावधानों के तहत भारत सहित ऐसे देशों को दंडित करने की धमकी भी दी।

अभी 1 सितम्बर को अमेरिका ने भारत की अध्यक्षता वाले  ब्रिक्स देशों को चेतावनी दी है कि वे वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर को कमजोर करने या 'डी-डॉकराइजेशन' का प्रयास न करें। यह खुली चेतावनी तब दी गयी, जब पहले से ही ट्रम्प के दबाव के कारण भारत ब्रिक्स सम्मेलनों में ऐसे किसी भी रुख से बचने की कोशिश कर रहा है, जिसे अमेरिका-विरोधी समझा जाए। एक स्वाभाविक अपेक्षा थी कि कोई भी निडर भारतीय अमेरिका के इस तरह के बर्ताब की,  भले कितने ही धीमे स्वर से ही सही, निंदा करेगा। निंदा नहीं करेगा, तो अप्रसन्नता व्यक्त करेगा, यह भी न कर सका तो असहमति या अफ़सोस जताते हुए कम से कम रिकॉर्ड पर तो लाएगा ही। मगर डाक्साब ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा : जब वे भारत में रहते नहीं कहते, तो अमरीका पहुँच कर तो कहना ही क्या था। अटल जी के अंदाज में कहें तो ‘ये अच्छी बात नहीं है डाक्साब।‘

डाक्साब के न्यूयॉर्क प्रबोधन के एक अंश को मीडिया, खासतौर से सोशल मीडिया, पर कुछ ज्यादा ही सनसनीखेज माना गया। इसमें उन्होंने कहा बताया गया कि "अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा .... ।" कईयों ने तो इसे मुसलमानों की रेहड़ी, खोमचे उलटने, उनकी रसोइयों में झाँकने और मस्जिदों के सामने ढोल बजाने के ‘पुण्य कार्य’ में डटे रणबाँकुरे संघियों के दिल टूट जाने वाला कथन तक मान लिया। बाकी तो जानते ही हैं,संघी भी अच्छी तरह जानते हैं कि ये अमरीका में दिखाने के दांत हैं : खाने के दांत तो वे यहीं काम पर लगाकर  गए हैं।

वैसे भी इस बयान में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नया हो। बीच-बीच में वे ऐसे आप्त-वचन बोलते रहते हैं और हम लिखते रहते हैं। यों यदि उनके वाक्य को धीरज से पढ़ा जाए, तो आसानी से मंतव्य तक पहुंचा जा सकता है। सावरकर साब से गोलवलकर तक किसी ने कभी नहीं कहा कि मुस्लिम या अन्य धर्मों को मानने वाले भारत में नहीं रह सकते। उन्होंने लिखा-पढ़ी में साफ़ कहा है कि वे रह सकते हैं, मगर किसी भी नागरिक अधिकार के बिना।

यही पोंजी स्कीम दलित, आदिवासी, महिलाओं और दिमाग का इस्तेमाल करने वालों के लिए है। मगर उसे हू-ब-हू मुस्लिम या ईसाइयों या बौद्धों या सिखों पर लागू करना मुश्किल है, क्योंकि हिन्दू न होने के चलते वे मनुस्मृति के दायरे में नहीं आते। इसलिए इसका ज्यादा नोटिस न जिनके बीच में बोला गया था, उन्होंने लिया, ना ही बाकियों को लेना चाहिए।
जिसका संज्ञान लिया जाना सामयिक है, वह यह कि न्यूयॉर्क में बोलते हुए डाकसाब ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘हर इंसान की गरिमा बराबर है और मनुष्यों के बीच जन्म या जाति के आधार पर कोई अंतर नहीं है।‘ यह भी कि ‘जाति या समुदाय के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव करना आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है।‘ यह भी कि  ‘जातिगत अंतरों के बावजूद 'एकता' ही हमारी मूल वास्तविकता है।‘ इसी प्रवाह में वे यहाँ तक बोल गए कि ‘समाज में जातियों की अनेकता भले हो, लेकिन कोई भी जाति छोटी या बड़ी नहीं है और सभी को एक समान मानवीय गरिमा मिलनी चाहिये।‘

यह बात इसलिए और ज्यादा दिलचस्प थी कि ठीक जिस समय वे उधर न्यूयॉर्क में यह तत्वज्ञान दे रहे थे कि “जाति या समुदाय के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव करना आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है।“ ठीक उसी समय इधर जम्बूद्वीपे भारतखंडे में उन्हीं के लोग मनु की कपास ओटने के अपने परम्परागत काम में पूरे प्राणपण से जुटे हुए थे।

उनकी यात्रा शुरू होने के पहले मने 15 अगस्त के दिन गाँव-गाँव से ख़बरें आ रही थीं कि दलित, महिला और आदिवासी समुदायों वाले सरपंचों को झंडा नहीं फहराने दिया जा रहा, कि आज भी न जाने कितने सरपंच शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें उनके ही दफ्तर में उनकी ही कुर्सी पर नहीं बैठने दिया जाता। उन्ही के आनुषांगिक संगठन भाजपा की एक विधायिका शिकायत कर रही थीं कि उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में बन रहे एक मंदिर में उन्हें मंदिर की ईंट तक नहीं छूने दी गयी। यह बात सिर्फ नीचे-नीचे या कुछ अनाम और छोटे-मोटे पदों वालों तक सीमित नहीं थी : संसद के उच्च सदन में प्रतिपक्ष के नेता और वरिष्ठ राजनेता मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी में हुयी आमसभा के बाद पूरे मंच और मैदान का यज्ञ और गंगाजल से  शुद्धिकरण किया जा रहा था – क्योंकि खरगे दलित समुदाय से आते हैं।

निर्लज्जता की हद यह थी कि खुद उनकी पार्टी साफ़-साफ़ संघ की ओर इशारा कर रही थी। पहले तो इधर ना, उधर हाँ का दो जुबानों से बोलने का करिश्मा दिखाया गया। संसद में सत्ता पक्ष के नेता जे पी नड्डा ने घटना की निंदा तक करते हुए दावा किया कि ऐसी किसी भी घटना का बीजेपी समर्थन नहीं करती है।" उसके बाद एक अभियान चला कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं है। मगर बाद में संबंधित प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने न केवल घटना का होना मान लिया, बल्कि उसे सही ठहराने की भी कोशिश की। लेकिन इसी के साथ पल्ला झाड़ते हुए बिना नाम लिए उस संघ को ही जिम्मेदार ठहरा दिया, जिसके प्रमुख न्यूयॉर्क में ‘कोई जाति छोटी या बड़ी नहीं है, सबको मानवीय गरिमा मिलनी चाहिए” की दुहाई दे रहे थे।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, "जिन्होंने भी वहां पर शुद्धिकरण किया था, उनमें बीजेपी का कोई कार्यकर्ता शामिल नहीं था।" उनके ही प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुए 'शुद्धिकरण' अनुष्ठान का खुलकर बचाव और समर्थन करते हुए ऐसा किये जाने को सही ठहराया। शुद्धीकरण कार्यक्रम के मुख्य आयोजक कथित ‘श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास’ के अध्यक्ष और  गिरीश चंद्र पांडे ने कहा, "शुद्धिकरण की रस्म, जगह की पवित्रता बहाल करने के लिए की गई थी। "जगह को यज्ञ के लिए उपयुक्त बनाया, इसके बाद हमने इलाके को औपचारिक रूप से शुद्ध करने के लिए यज्ञ किया।"

इस सबको जंतर मंतर पर आरक्षण हटाओ के नाम पर इकट्ठा किये गए तत्वों के उग्र एलानों और भारत की 90% आबादी के बारे में इस्तेमाल किये गए आपराधिक शब्दों के साथ जोड़कर देखने से आने वाले दिनों के लिए बिछाई जा रही बिसात को समझा जा सकता है।

डॉ. मोहन भागवत की अमरीका यात्रा को उनके भगत लोग  स्वामी विवेकानंद की 133 वर्ष पहले की गयी एतिहासिक यात्रा से जोड़कर उन्हें दूसरा विवेकानन्द बताने की जुगत में भिड़े थे। मगर वे भूल रहे थे कि स्वामी विवेकानंद, जितने  कमाल के धार्मिक तत्ववेत्ता थे, उतने ही सुधारक भी थे। ऐसे असाधारण स्पष्ट वक्ता थे कि हिन्दू धर्म का प्रचार करते हुए उसकी विकृतियों को भी धिक्कारते थे। धार्मिक संकीर्णता और जातिवाद पर जितना निर्मम हमला स्वामी विवेकानंद ने किया है, उतना करने का साहस अनेक प्रतिबद्ध नास्तिक भी नहीं जुटा पाते हैं। जिस संकीर्ण हिंदूवाद का आर एस एस प्रतिनिधित्व करता है, उसे विवेकानंद भारतीय सभ्यता का सबसे प्रमुख अवरोध मानते थे। इस संबंध में उनके सैकड़ों उद्धरण हैं, यहाँ सिर्फ चार पर नजर डाल लेते हैं।
 
वे झुंझलाते हुए कहते हैं कि : “अब हमारा धर्म किसमें रह गया है? केवल छुआछूत में – मुझे छुओ नहीं, छुओ नहीं। हम उन्हें छूते भी नहीं और उन्हें ‘दुर’ ‘दुर’ कहकर भगा देते हैं। क्या हम मनुष्य हैं? “ (विवेकानंद साहित्य,भाग 2 , पृष्ठ. 316 )  

इसी के साथ वे कहते हैं कि ''पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म के समान इतने उच्च स्वर से मानवता के गौरव का उपदेश करता हो, और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म के समान गरीबों और नीच जाति वालों का गला ऐसी क्रूरता से घोंटता हो ।“ (विवेकानन्द साहित्य, भाग 1, पृष्ठ-403)

इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि “ब्राह्मण और क्षत्रियों के ये ही अत्याचार चक्रवृद्धि ब्याज के सहित अब स्वयं के सिर पर पतित हुए हैं एवं यह हजारों वर्ष की पराधीनता और अवनति निश्चय ही उन्हीं के कर्मों के अनिवार्य फल का भोग है।  (पत्रावली भाग 9, पृष्ठ 356).

“ब्राह्मणों ने ही तो धर्म शास्त्रों पर एकाधिकार जमाकर विधि-निषेधों को अपने ही हाथ में रखा था और भारत की दूसरी जातियों को नीच कहकर उनके मन में विश्वास जमा दिया था कि वे वास्तव में नीच हैं। यदि किसी व्यक्ति को खाते , सोते, उठते, बैठते, हर समय कोई कहता रहे कि ‘तू नीच है‘, तू नीच है‘, तो कुछ समय के पश्चात उसकी यह धारणा हो जाती है कि ‘मैं वास्तव में नीच हूँ‘, इसे सम्मोहित (हिप्नोटाइज ) करना कहते हैं।“ (पत्रावली भाग 6 , पृष्ठ 147).

ऐसा नहीं है कि डाक्साब और उनके संघ के उच्च पदाधिकारियों ने यह सब नहीं पढ़ा  है। मगर उनका मिशन धार्मिक है ही कहाँ, वह तो शुद्ध राजनीतिक है और उसके लिए उनके मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक कौन है, यह मुसोलिनी और हिटलर से मिलकर लौटे डॉ. मुंजे की डायरी में दर्ज है, सावरकर लिखित हिंदुत्व और गोलवलकर लिखित ‘हम और हमारी राष्ट्रीयता’ "और बंच ऑफ़ थॉट" में लिपिबद्ध है।
अमेरिका में रहने वाले भारतीय और उनके 61 संगठन इसे जानते थे और इसलिए वे इस संगठन के प्रमुख की यात्रा से अपने आपको असम्बद्ध करने का सार्वजनिक ऐलान कर रहे थे।

बादल सरोज

(लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

Share:

Comments

Leave a comment