खुजली बड़ी काम की चीज: बचपन की याद से चीन में शुरू हुआ अनोखा कारोबार

खुजली बड़ी काम की चीज: बचपन की याद से चीन में शुरू हुआ अनोखा कारोबार

खुजली बड़ी काम की चीज है!

सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र

खुजली बड़ी काम की चीज है। बचपन में कोई शरारत करने पर घर के बड़े पूछते थे कि खोपड़ी में खुजली खा रही है क्या? इस सवाल के साथ सिर पर दो चपत भी जमा दी जाती थीं। तब ऐसा लगता था कि खुजली कोई ऐसी बीमारी है जिसका इलाज नाखून से नहीं बल्कि थप्पड़ से होता है। बड़े होने पर पता चला कि खुजली सिर्फ शरीर में नहीं होती बल्कि दिमाग में भी होती है। कई बार यह इतनी जोर से होती है कि आदमी को चैन से बैठने नहीं देती। भारत में खुजली का बाकायदा अपना लोकविज्ञान है। हथेली खुजले तो धन आने की उम्मीद होती है और महिला की बाईं हथेली खुजले तो लक्ष्मी के आगमन के संकेत माने जाते हैं। अब लक्ष्मी आए या न आए लेकिन खुजली जरूर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती है। हमारी भाषा में भी खुजली खूब फलती-फूलती है। किसी को बोलने की खुजली होती है तो किसी को आंदोलन की। किसी को दूसरों के काम में टांग अड़ाने की खुजली होती है तो किसी को बिना मांगे सलाह देने की आदत होती है। राजनीति में यह खुजली मौसमी बीमारी की तरह उभरती है। चुनाव आते ही नेताओं को जनता से मिलने की खुजली शुरू हो जाती है। पांच साल तक जो मतदाता फोन मिलाकर भी दर्शन नहीं पा सकता है, चुनाव के मौसम में वही मतदाता नेता जी का परिवार बन जाता है। झोपड़ी में चाय पीना, खेत में फोटो खिंचवाना, बुजुर्ग के पैर छूना और बच्चे के सिर पर हाथ फेरना सब अचानक जरूरी हो जाते हैं। चुनाव बीतते ही यह खुजली अपने आप शांत हो जाती है।

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चीन में शरीर खुजलाने का कारोबार

लेकिन अब चीन ने खुजली को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। शेनझेन में 32 वर्षीय उद्यमी झांग शियाओकियाओ ने शरीर खुजलाने को बाकायदा कारोबार बना दिया है। उनकी सुमा सेवा में ग्राहक आराम से लेटते हैं और प्रशिक्षित कर्मचारी खास तौर पर डिजाइन किए गए नाखूनों से पीठ और शरीर के दूसरे हिस्सों की खुजली मिटाते हैं। एक घंटे की इस सेवा की कीमत करीब 4,200 रुपये बताई गई है। दो आउटलेट मिलकर महीने में करीब 14 लाख रुपये का कारोबार कर रहे हैं। यानी जिस काम के लिए हमारे घरों में लोग मुफ्त में कहते थे कि जरा पीठ तो खुजा दे, उसी काम को चीन ने सर्विस इंडस्ट्री में पहुंचा दिया है। इस कहानी का असली मजा इसकी शुरुआत में है। झांग ने इंटरनेट पर एक वीडियो देखा जिसमें एक महिला अपने पति की पीठ खुजा रही थी। नीचे आए कमेंट्स में लोगों ने कहा कि वे ऐसी सुविधा के लिए पैसे देने को तैयार हैं। झांग को अपने बचपन की याद आई जब उनके पिता उन्हें सुलाने के लिए पीठ खुजाया करते थे। उन्होंने वहीं से बिजनेस का आइडिया निकाल लिया। हम बचपन की ऐसी यादों को भावुक होकर याद करते हैं लेकिन उद्यमी उसमें बाजार खोज लेता है। यही शायद कारोबार की पहली शर्त है जहां आम आदमी आदत देखता है, वहीं व्यापारी अवसर देखता है।

व्यापार और बाजार की नई सोच

झांग ने इस सेवा को केवल खुजली मिटाने तक सीमित नहीं रखा। इसे तनाव कम करने, आराम और बेहतर नींद से जोड़ दिया। ग्राहक यह भी बता सकते हैं कि शरीर के किस हिस्से पर ज्यादा ध्यान चाहिए। कुछ लोगों को गुदगुदी होती है, कुछ हंसते हैं और कुछ शायद यह सोचते होंगे कि आखिर वे 4,200 रुपये देकर क्या करवा रहे हैं। मगर बाजार कभी यह सवाल नहीं करता कि चीज कितनी साधारण है। वह सिर्फ यह देखता है कि लोग उसके लिए पैसा देने को तैयार हैं या नहीं। इसी सिद्धांत पर दुनिया में न जाने कितने उद्योग खड़े हुए हैं। कोई हवा बेच रहा है, कोई अनुभव बेच रहा है, कोई सुविधा बेच रहा है और कोई समय बेच रहा है। अब कोई खुजली बेच रहा है। भारत में इसकी संभावनाएं तो और भी ज्यादा व्यापक हैं। यहां शारीरिक खुजली से ज्यादा मानसिक खुजली के ग्राहक मिलेंगे। टिकट की खुजली अलग होती है, पद की खुजली अलग होती है और सत्ता की खुजली अलग होती है। अफसर को फाइल रोकने की खुजली होती है, ठेकेदार को टेंडर की खुजली होती है और सोशल मीडिया विशेषज्ञ को हर विषय पर टिप्पणी करने की खुजली होती है। कुछ लोगों को तो दूसरों की जिंदगी में झांकने की ऐसी खुजली होती है कि अपना घर व्यवस्थित करने से पहले वे पड़ोसी के घर की व्यवस्था पर सलाह दे देते हैं।

सोशल मीडिया और मानसिक खुजली

सोशल मीडिया ने इस बीमारी को पूरी तरह डिजिटल कर दिया है। किसी ने फोटो डाली नहीं कि उसकी शक्ल पर टिप्पणी शुरू हो जाती है। किसी ने यात्रा की तस्वीर साझा की नहीं कि खर्च का हिसाब मांगने वाले लोग तुरंत हाजिर हो जाते हैं। किसी ने अपना राजनीतिक विचार रखा नहीं कि सामने वाले को पार्टी बदलने की सलाह देने की खुजली शुरू हो जाती है। मालवा में ऐसे मौके पर कहा जाता है कि काय रे, घणी खुजली चाल री है। यह वाक्य त्वचा से ज्यादा चरित्र पर लागू होता है। शरीर की खुजली साफ दिखाई देती है लेकिन मन की खुजली आदमी छिपाता फिरता है। वैसे झांग की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि दुनिया में कोई भी काम छोटा नहीं होता है। फर्क सिर्फ नजरिए का होता है। हम जिस काम को घर की मामूली जरूरत समझते रहे, किसी ने उसमें व्यवसाय देख लिया। हमारे यहां मां की उंगली से मिलने वाला सुकून था और वहां वही सुकून 299 युआन के पैकेज में बिक रहा है। अब कल्पना कीजिए कि अगर भारत ने अपनी तमाम खुजलियों का भी बाजार खोल दिया तो कितने नए रोजगार पैदा हो जाएंगे। पद की खुजली थेरेपी, टिकट की खुजली काउंसलिंग, सोशल मीडिया टिप्पणी डिटॉक्स और पड़ोसी निगरानी पुनर्वास केंद्र जैसे हर समस्या का पैकेज और हर पैकेज की फीस तय हो सकती है। हालांकि एक बात बिल्कुल साफ है कि शरीर की खुजली नाखून से मिट सकती है लेकिन लालच, सत्ता और प्रसिद्धि की खुजली का इलाज बहुत मुश्किल है। कुर्सी मिल जाए तो सत्ता की खुजली बढ़ती है, पैसा आ जाए तो पैसे की खुजली बढ़ती है और लाइक्स मिल जाएं तो प्रसिद्धि की खुजली बढ़ती है। इसलिए अगली बार जब कोई बच्चा शरारत करे और बड़े गुस्से में यह पूछें कि खोपड़ी में खुजली खा रही है क्या, तो चपत लगाने से पहले जरा सोचिए। कहीं वह बच्चा भविष्य का कोई बड़ा कारोबारी तो नहीं जो आपकी डांट को भी किसी दिन स्टार्टअप में बदल दे। समय पूरी तरह बदल चुका है साहब। पहले खुजली पर चपत पड़ती थी और अब खुजली पर बिल बनता है। फर्क सिर्फ इतना है कि चीन ने शरीर की खुजली का बाजार खोज लिया है और हम अभी तक मन की खुजली में ही उलझे हुए हैं।

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