वंदे मातरम् राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं , संघ की सांप्रदायिक राजनीति का पर्दाफाश

Atal Hind Team Online30 August 20267 min read32 viewsभारत
वंदे मातरम् राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं , संघ की सांप्रदायिक राजनीति का पर्दाफाश

वंदे मातरम् राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं

आलेख : संजय पराते

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संघी गिरोह हमेशा ऐसे मुद्दों की तलाश में रहता है, जिससे हमारे देश की आम जनता में एकता की भावना पैदा होने के बजाय सांप्रदायिक फूट परस्ती की भावना पैदा हो। वंदे मातरम्  ऐसा ही एक मुद्दा है। जिन लोगों ने आजादी के आंदोलन के दौरान वंदे मातरम गाना तो दूर, अपने मुंह से कभी वंदे मातरम्  का नारा तक नहीं लगाया और जिनकी जुबान से हमेशा 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' ही निकला, आजादी के बाद वे ही वंदे मातरम् के सबसे बड़े समर्थकों में अपने आपको रखने लगे। उन्होंने नारा लगाया -- भारत में रहना है, तो वंदे मातरम्  कहना होगा। सत्ता में आने के 12 सालों बाद अब उन्होंने एक नया ढोंग रचा है और वह है वंदे मातरम् के पूरे छह छंद गाने का, जिसके लिए 3 मिनट से भी ज्यादा का समय लगता है। अपनी संसदीय ताकत का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने संसद से एक कानून भी पारित करा लिया है, जिसके जरिए वंदे मातरम्  को राष्ट्र गान 'जन गण मन' के समकक्ष रख दिया है। सच्चाई तो यह है कि इस कानून में वंदे मातरम् को गाने की भी कोई बाध्यता नहीं है, पूरे छह छंद गाने की तो बात ही छोड़िए। लेकिन गृह मंत्रालय द्वारा जारी कार्यकारी निर्देशों के जरिए इसे पूरा गाने को बाध्य होने या फिर सजा भुगतने का डर दिखाया जा रहा है। कांग्रेस ने इन्हीं निर्देशों को मानने से इनकार करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी भावना के अनुरूप पहले की तरह ही केवल दो छंद ही गाने का फैसला किया है। कांग्रेस के इस फैसले से संघी गिरोह बौखलाया हुआ है, क्योंकि उसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की अपनी मुहिम असफल होती नजर आ रही है।

संघी गिरोह की असली मंशा तो जन गण मन को प्रतिस्थापित करके उसकी जगह वंदे मातरम् को स्थापित करने की है। उसने न कभी बाबा साहेब के संविधान का सम्मान किया है और न कभी रवींद्रनाथ टैगोर के जन गण मन का। यदि उसके मन में संविधान का सम्मान होता, तो वह संवैधानिक अवधारणाओं और उसके मूल्यों से खिलवाड़ नहीं करती। जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में काफी सोच-विचार के बाद हमारी संविधान सभा ने स्वीकृत किया था। इस विचार-विमर्श में केवल रवींद्रनाथ ठाकुर और जवाहरलाल नेहरू ही नहीं, आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने वाले लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल तक शामिल थे और सभी जन गण मन के पक्ष में इसलिए थे, क्योंकि इस कविता में भारत के उस विचार का प्रतिबिंबन है, जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने की भावना को मान्यता देती है, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि सभी धर्म, भाषा और क्षेत्र के लोग शामिल है।

सांप्रदायिक नफरत की खाद-पानी से बढ़ने वाले संघी गिरोह को 'आइडिया ऑफ इंडिया' की सोच से ही नफरत है। इसलिए उसे जन गण मन से भी नफरत है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष का 'राष्ट्रगान' के गायन के दौरान बीच में ही बाहर चले जाना इसी बात का प्रतीक है। राष्ट्र गान और राष्ट्र ध्वज के अपमान के आरोप में इस व्यक्ति पर भाजपा सरकार को सबसे पहले मामला दर्ज करना चाहिए। यदि वास्तव में संघी गिरोह की देशभक्ति जोर मार रही होती, तो वह जन गण मन के पूरे छंदों को गाने का पहले कानून बनाती, न कि वंदे मातरम् के।

वंदे मातरम् के मूल दो छंदों को गाने में हमारे देश के किसी भी समुदाय को कभी कोई आपत्ति नहीं रही है। आजादी के आंदोलन के दौरान इसे गाते हुए, नारे लगाते हुए जिन लाखों लोगों ने अपनी शहादत दीं, उनमें से एक भी संघी गिरोह से नहीं था। ये दो छंद 'सुजलाम सुफलाम' भारत की अद्भुत छवि पेश करते हैं। लेकिन साहित्य के इतिहास का यह स्थापित और पुष्ट तथ्य हैं कि वंदे मातरम् के बाकी छंद बहुत बाद में बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास 'आनंद मठ' के लिए लिखे थे और इस कविता में जोड़ दिए थे। ये छंद मुस्लिमों के कत्लेआम के लिए देवी-शक्ति की स्तुति और आह्वान है। अपनी सांप्रदायिक पृष्ठभूमि के कारण यह उपन्यास और बाद में जोड़े गए छंद हमेशा विवादास्पद रहे हैं, जिसे उपनिवेशवाद विरोधी संग्राम के दौरान हमारे देश की जनता ने कभी स्वीकार नहीं किया। इसलिए यह केवल मुस्लिम समुदाय द्वारा विरोध का मामला भर नहीं था, जैसा कि संघी गिरोह दुष्प्रचार कर रहा है। वास्तव में, आचार्य कृपलानी ही थे, जिन्होंने सबसे पहले इस गीत की उपयुक्तता पर सवाल उठाया था। इस प्रकार, जन गण मन हमारे उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि वंदे मातरम् के बाद के छंद सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का, आरएसएस-भाजपा जिसका अपने जन्म से ही प्रतिनिधित्व करती आई है।

आज संघी गिरोह इसी सांप्रदायिक राष्ट्रवाद को देश की जनता पर थोपने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि वह वंदे मातरम् को राष्ट्रीयता की कसौटी बनाने पर तुला हुआ है और अल्पसंख्यक समुदाय को डरा धमकाकर, उसे यह जताकर कि अब उसकी स्थिति इस देश में दोयम दर्जे के नागरिक की ही रह गई है, अपने हिंदुत्व के समर्थकों की भावनाओं को तुष्ट करना चाहता है, ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए देश को हिंदू राष्ट्र की ओर धकेला जा सके।

इतिहास के इस तथ्य पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि बंकिम चंद्र चटर्जी ब्रिटिश राज में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। उस दौरान, जब पूरे देश में आजादी के दीवाने अंग्रेजों के कोप का शिकार हो रहे थे, बंकिम अंग्रेजों के प्रिय पात्र थे, क्योंकि 'आनंदमठ' जनता को सांप्रदायिक रूप से विभाजित कर ब्रिटिश हितों की ही पूर्ति कर रहा था। आजादी के आंदोलन के दौरान ठीक यही काम आरएसएस भी कर रही थी। 1942 में जब पूरा 'देश करो या मरो' की भावना के साथ अंग्रेजी राज से लड़ रहा था, 'माफीवीर' सावरकर की अगुआई में संघी गिरोह ‘हिंदूकरण करो राष्ट्र का और सैन्यीकरण करो हिंदुत्व का’ के नारे के साथ देश के युवाओं से ब्रिटिश साम्राज्यवादी सेना में भर्ती होने की अपील कर रहा था। साफ है कि बंकिम चंद्र और आरएसएस दोनों का चरित्र अंग्रेज परस्त और मुस्लिम विरोधी था। इससे ही समझा जा सकता है कि बंकिम चंद्र के प्रति संघी गिरोह का अथाह प्रेम क्यों उमड़ रहा है।

आजादी के आंदोलन के दौरान और आजादी के बाद भी संघी गिरोह का संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति कभी लगाव नहीं रहा। हमारी संविधान सभा ने अंबेडकर के नेतृत्व में जो संविधान बनाया और अपनाया, उसे विदेशी अवधारणाओं से प्रेरित बताते हुए उसकी जगह उन्होंने मनुस्मृति को लागू करने की मांग की। उन्होंने तिरंगे के तीन रंगों को अशुभ बताते हुए भगवा ध्वज अपनाने की मांग की। राष्ट्रीय ध्वज में लगे अशोक चक्र से भी उन्हें आपत्ति है, क्योंकि उन्हें इससे साम्राज्यवाद की गंध आती है। लेकिन कौन-सा साम्राज्यवाद? ब्रिटिश और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद से तो उन्हें जी-जान से प्यार है। यह सम्राट अशोक का बौद्ध साम्राज्य है, जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ तनकर खड़ा हुआ था और जिसके कारण, संघी गिरोह के मन में अशोक और उसके चक्र के प्रति, जिसकी व्याख्या प्रेम, समता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में की जाती है, कूट-कूटकर नफरत भरी हुई है। यह नफरत इतनी गहरी है कि संसद भवन की छत पर जो अशोक स्तंभ बनाया गया है, उसमें अंकित सिंहों की मुखमुद्रा को ही विकृत कर दिया गया है, इतनी विकृत की मूल कृति के विपरित लगती है।इसलिए तिरंगा और वंदे मातरम् जैसे प्रतीक संघी गिरोह के लिए देशभक्ति के नहीं, बल्कि यहां की जनता की देशभक्ति की भावनाओं का अपने सांप्रदायिक हितों के लिए दोहन के प्रतीक है। यदि ऐसा नहीं होता, तो जम्मू कश्मीर के कठुआ में वर्ष 2018 में एक बच्ची के बहुचर्चित मामले में बलात्कारियों के समर्थन में तिरंगा लहराते हुए रैली करने की हिमाकत संघी गिरोह नहीं करता।

संघी गिरोह द्वारा यह विवाद उस समय उछाला जा रहा है, जब जेन-ज़ी हमारी जनता की बुनियादी समस्याओं को लेकर आंदोलित है। इस आंदोलन से पिछले 12 वर्षों में संघी गिरोह द्वारा गोदी मीडिया की मदद से बनाई गई सर्वशक्तिमान की छवि धूमिल हुई है और मोदी सरकार की नीतियों को संसद के अंदर और बाहर कड़ी चुनौतियां मिल रही है। इस परेशानी से निजात पाने का उसके पास केवल यही एक जाना-पहचाना-आजमाया तरीका है कि अपने सांप्रदायिक तरकश का और तेजी से इस्तेमाल करें। लेकिन शायद अब यह चतुराई काम आने वाली नहीं है। आखिरकार, जन संघर्षों पर आधारित जन एकजुटता हमेशा किसी भी सांप्रदायिक लामबंदी से बड़ी और मजबूत साबित हुई है। यह हमारे साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का सबक भी है और विरासत भी ; जिससे संघी गिरोह का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है।

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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