मोदी सरकार को कड़ी फटकार एससी बोला न्यायाधिकरणों में अधिकारियों की नियुक्ति न करके अर्द्ध न्यायिक संस्थाओं को ‘शक्तिहीन’ कर रहा है केंद्र

14 September 20214 min read0 viewsभारत
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकारा,न्यायाधिकरणों की नियुक्तियों में ‘पसंदीदा लोगों के चयन’ पर
मोदी सरकार को कड़ी फटकार एससी बोला  न्यायाधिकरणों में अधिकारियों की नियुक्ति न करके  अर्द्ध न्यायिक संस्थाओं को ‘शक्तिहीन’ कर रहा है केंद्र
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जिस तरह से केंद्र सरकार ने न्यायाधिकरणों में नियुक्तियां की हैं, वह स्पष्ट रूप से ‘पसंद के अनुसार नामों के चयन’ को दिखाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल और इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल में की गई नियुक्तियों के तरीके पर गंभीर असंतोष व्यक्त किया।
इसके बाद अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने न्यायालय में कहा कि सरकार के पास अधिकरणों में रिक्त पदों को भरने के लिए चयन समिति की अनुशंसा को स्वीकार न करने की शक्ति है. इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए न्यायालय ने कहा, ‘हम एक लोकतांत्रिक देश में कानून के शासन का पालन कर रहे हैं.’
प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ ने कहा, ‘हम संविधान के तहत काम कर रहे हैं. आप ऐसा नहीं कह सकते.’
खंडपीठ ने कहा कि केंद्र द्वारा कुछ न्यायाधिकरणों में की गई नियुक्तियां उपयुक्त उम्मीदवारों की अनुशंसित सूची से ‘पसंदीदा लोगों के चयन’ का संकेत देती हैं. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एल. नागेश्वर राव भी पीठ के सदस्य हैं.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने कोविड-19 के दौरान नामों का चयन करने के लिए व्यापक प्रक्रिया का पालन किया और सभी प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं.
जस्टिस रमना ने रोष व्यक्त करते हुए कहा, ‘हमने देशभर की यात्रा की. हमने इसमें बहुत समय दिया. कोविड-19 के दौरान आपकी सरकार ने हमसे जल्द से जल्द साक्षात्कार लेने का अनुरोध किया. हमने समय व्यर्थ नहीं किया.’
पीठ ने कहा, ‘यदि सरकार को ही अंतिम फैसला करना है, तो प्रक्रिया की शुचिता क्या है? चयन समिति नामों को चुनने की लिए एक विस्तृत प्रक्रिया का पालन करती है.’
विभिन्न प्रमुख न्यायाधिकरणों और अपीली न्यायाधिकरणों में लगभग 250 पद रिक्त हैं.
वेणुगोपाल ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम की धारा 3 (7) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि तलाश-सह-चयन समिति अध्यक्ष या सदस्य, जैसा भी मामला हो, के पद पर नियुक्ति के लिए दो नामों की सिफारिश करेगी और केंद्र सरकार अधिमानतः ऐसी सिफारिश की तारीख से तीन महीने के भीतर इस पर निर्णय लेगा.
उन्होंने कहा कि प्रावधान के तीन भाग हैं – यह दो नामों की एक समिति के लिए प्रदान करता है, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया है, फिर यह कहता है कि सरकार ‘तीन महीने के भीतर’ सिफारिशों पर फैसला करेगी, जिसे रद्द कर दिया गया है; लेकिन यह कि केंद्र सरकार समिति द्वारा की गई सिफारिश पर निर्णय लेगी, उसे रद्द नहीं किया गया है.

उनकी दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए, जस्टिस नागेश्वर राव ने कहा, ‘एक पद के लिए दो नाम नहीं हो सकते हैं, लेकिन केवल एक नाम की सिफारिश की जानी चाहिए! और ‘अधिमानतः तीन सप्ताह के भीतर’ को भी हटा दिया गया है.’
उन्होंने कहा, ‘आपको तीन महीने के भीतर नियुक्ति करनी होगी. लेकिन चयन किए जाने और सिफारिशें किए जाने के बाद भी, आप उन्हें नियुक्त नहीं करते हैं और प्रतीक्षा सूची से लोगों को चुनते हैं, तो जिसे भविष्य में इस्तेमाल करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था.’
वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार के पास सिफारिशों को स्वीकार नहीं करने की शक्ति है और इस बारे में उच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के संबंध में कॉलेजियम प्रणाली का हवाला दिया.
गौरतलब है कि पिछले दिनों शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को विभिन्न न्यायाधिकरणों में खाली पड़े पदों पर नियुक्ति करने को लेकर फटकारा था, जिसके बाद केंद्र ने विभिन्न न्यायाधिकरणों में 37 सदस्यों की नियुक्ति की है.
इससे पहले छह सितंबर की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि केंद्र न्यायाधिकरणों में अधिकारियों की नियुक्ति न करके इन अर्द्ध न्यायिक संस्थाओं को ‘शक्तिहीन’ कर रहा है.
अदालत ने कहा था कि न्यायाधिकरण पीठासीन अधिकारियों, न्यायिक सदस्यों एवं तकनीकी सदस्यों की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं.

मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एल. नागेश्वर राव की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस बात पर जोर दिया था कि वह केंद्र सरकार के साथ किसी तरह का टकराव नहीं चाहती, लेकिन वह चाहती है कि बड़ी संख्या में रिक्तियों का सामना कर रहे न्यायाधिकरणों में केंद्र नियुक्तियां करे.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई थी कि मोदी सरकार ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के जरिये उन प्रावधानों को भी बहाल कर दिया है, जिसे पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था.
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