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क्या आज़मगढ़ के पलिया गांव में दलितों को सबक सीखने के लिए उनके साथ बर्बरता की गई?

क्या आज़मगढ़ के पलिया गांव में दलितों को सबक सीखने के लिए उनके साथ बर्बरता की गई?
BY मनोज सिंह
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आजमगढ़: ‘रात 8:30 बजे मैं दवा खाने जा रही थी. उसी वक्त खूब शोर होने लगा. अचानक बिजली चली गई और अंधेरा हो गया. घर के सभी लोग चिल्लाने लगे कि भाग जाओ, पुलिस आ गई है. मैं कुछ समझ पाती कि दर्जनों पुलिस वाले धड़धड़ाते हुए घुस गए. एक पुलिसवाले ने गाली देते हुए लोहे के राड से मेरे हाथ पर मारा. मैं चिल्लाने लगी. पुलिस वाले घर के हर सामान को तोड़ रहे थे. मैंने अपनी बहन का हाथ पकड़ा और घर के पीछे की तरफ भागी. उस रात को मैं कभी भूल नहीं पाऊंगी. लग रहा था कि घर में लुटेरे घुस गए हों. उस रात पुलिस नहीं लुटेरे आए थे.’
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के रौनापार थानाक्षेत्र के दलित बाहुल्य पलिया गांव की 22 वर्षीय संध्या जब 29 जून की रात को पुलिस द्वारा की गई बर्बरता को बयां कर रही थीं तो उनकी आंख में समाया खौफ दिख रहा था.

Were Dalits vandalized in Azamgarh’s Palia village to teach them a lesson?

घटना के 10 दिन बाद ग्राम प्रधान मंजू पासवान, उनके पति मुन्ना पासवान के चचेरे भाई स्वतंत्र कुमार और चाचा राजपति के घर में हुई तोड़फोड़ को देख कर लगता है कि जैसे कि यहां कोई भूकंप आया हो, जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया है.
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पलिया गांव एक पखवाड़े से अधिक समय से ग्राम प्रधान मंजू पासवान और उनके तीन परिजनों के घरों में कथित तौर पर पुलिस द्वारा किए गए व्यापक तोड़फोड़, महिलाओं के साथ अभद्रता और मारपीट की घटना को लेकर चर्चा के केंद्र में है.
कांग्रेस सहित कई दलों के प्रदर्शन के बाद दबाव में आए प्रशासन ने रौनापार के थानाध्यक्ष को लाइन हाजिर कर दिया है और सीओ सगड़ी का तबादला कर दिया है.
हालांकि जिस तरह इस घटना को अंजाम दिया गया उससे लगता है कि यह घटना दो पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की प्रतिक्रिया में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई नहीं है, बल्कि दलितों से बदला और सबक सिखाने के लिए की गई हिंसा है.
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मऊ कुतुबपुर चौराहे की घटना
पूरा घटनाक्रम 29 जून की शाम 6ः30 बजे मऊ कुतुबपुर चौराहे पर छेड़खानी की कथित घटना को लेकर शुरू हुआ, जिसमें पहले दो पक्षों में मारपीट के बाद मौके पर आई पुलिस से गांववालों की झड़प होती है. इसके बाद 3 जुलाई तक पुलिस का गांव में तांडव चलता है.
ग्राम प्रधान के पति मुन्ना पासवान ने बताया कि गांव की एक लड़की की मऊ कुतुबपुर चौराहे पर रहने वाले चिकित्सक आनंद विश्वास के बेटे लिट्टन विश्वास से मोबाइल पर बातचीत होती थी. इसे लेकर लड़की का भाई 29 जून को शाम छह बजे लिट्टन विश्वास से बातचीत करने गया था.
साथ में उनका भतीजा 21 वर्षीय संतोष भी था. दोनों पक्षों में कहासुनी हो गई और लिट्टन ने हंसुए और डंडे से हमला कर दिया. लड़की के भाई का सिर फट गया और संतोष के पीठ में चोट लगी. घटना की खबर सुन गांव के लोग चौराहे पर पहुंच गए.
उस वक्त मुन्ना पासवान अपने चचेरे भाई स्वतंत्र कुमार उर्फ अप्पू के ईंट-भट्ठे पर थे. यह ईट-भट्ठा दोनों साझेदारी में चलाते हैं.
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मुन्ना पासवान के अनुसार, घटना की जानकारी के बाद वे भी वहां पहुंचे. लोगों ने बताया कि हमला करने के बाद लिट्टन भाग गया है. उसके पिता आनंद ने अपने को शटर के अंदर बंद कर लिया है. उन्होंने गांव के लोगों को समझाया और वापस गांव जाने को कहा.
उनके अनुसार, वह संतोष और उसके साथी को लेकर इलाज के लिए जाने लगे. गांव की तरफ बढ़े थे कि एक गाड़ी से दो पुलिसवाले उनके पास पहुंचे और पूछा कि ग्राम प्रधान (पति) मुन्ना पासवान कौन हैं? उन्होंने परिचय दिया तो पुलिसकर्मियों ने कहा कि वे थाने चलें.
मुन्ना ने कहा, ‘मैंने कहा कि दोनों लड़कों का इलाज कराकर मैं थाने पहुंच रहा हूं, लेकिन दोनों में से एक सिपाही विवेक त्रिपाठी उन्हें गाड़ी में बैठने के लिए जबर्दस्ती करने लगा. मेरे इनकार करने पर उसने मुक्का मारा, जिससे मेरी नाक से खून निकलने लगा. यह देख गांव के लोग सिपाहियों से उलझ गए. हाथापाई हो गई. मैंने लोगों को शांत कराया और सबको गांव जाने को कहा. मैं खुद गांव चला आया.’
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हालांकि इस घटना के बारे में लिट्टन विश्वास और पुलिस दूसरी कहानी बताते हैं. लिट्टन का कहना है कि पलिया गांव के लड़के चौराहे पर लड़कियों को छेड़ रहे थे. वे इस घटना का मोबाइल से वीडियो बना रहे थे. इस कारण उस पर हमला किया गया. उसने पुलिस को घटना की सूचना दी. जब दो पुलिसकर्मी घटनास्थल पर पहुंचे तो लोगों ने उन पर हमला कर दिया.
मऊ कुतुबपुर चौराहे की घटना के बारे में रौनापार थाने के हेड कॉन्स्टेबल मुखराज यादव द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में कहा गया है कि मुन्ना पासवान, उनके भाई बृजभान, स्वतंत्र कुमार उर्फ अप्पू आदि ने उन पर हमला किया, जिसमें हेड कॉन्स्टेबल विवेक त्रिपाठी गंभीर रूप से घायल हो गए. उन्हें आजमगढ़ जिला अस्पताल में भर्ती कराया है.
रौनापार थाने में 16 नामजद- मुन्ना पासवान, बृजभान, स्वतंत्र कुमार, सुनील, श्रीभजन, संतोष, श्रवण, दीपक, आकाश, साहुल, सूर्य प्रकाश, कवि, सुभाष, राहुल, राजपति, आशुतोष राय और 100 अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 1860 की धारा 147, 148, 149, 307, 323, 325, 333, 352, 353, 504, 506, 188, 269, 270, 427 और दंड विधान संशोधन अधिनियम 2013 की धारा 7 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है.
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एफआईआर में कहा गया है कि आरोपियों ने लाठी-डंडा, राड, हॉकी और धारदार हथियार से दोनों सिपाहियों पर हमला किया. मुन्ना पासवान के ललकारने पर स्वतंत्र कुमार ने अपनी लाइसेंसी राइफल से गोली चलाई.
पुलिस ने लिट्टन की तहरीर पर भी मुन्ना पासवान सहित 12 नामजद और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ छेड़खानी व मारपीट का केस दर्ज किया है.
मुन्ना पासवान का कहना है कि एफआईआर में जिस स्वतंत्र कुमार पर लाइसेंसी राइफल से गोली चलाने की बात कही गई है, वे घटना के दिन गांव में थे ही नहीं. स्वतंत्र कुमार का एक ऑपरेशन हुआ था और वह अपनी पत्नी के साथ अस्पताल में थे.
तीन जेसीबी के साथ तीन दर्जन गाड़ियों से पुलिस द्वारा तोड़फोड़ का आरोप
गांव के लोगों के अनुसार, मऊ कुतुबपुर चौराहे की घटना के करीब दो घंटे बाद रात 8ः30 बजे सैकड़ों पुलिसकर्मी चार पहिया और दो पहिया वाहनों से पलिया गांव पहुंचे. पुलिस अपने साथ तीन जेसीबी मशीन लाई थी. गांववालों के अनुसार 30-40 गाड़ियों में करीब 200 पुलिसकर्मी आए थे.
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Were Dalits vandalized in Azamgarh’s Palia village to teach them a lesson?

आरोप है कि मुन्ना पासवान और उनके चचेरे भाई स्वतंत्र कुमार का घर गांव जाने वाली मुख्य सड़क के दाहिने तरफ है. बाएं ग्राम पंचायत का सामुदायिक भवन है. इससे सटे स्वतंत्र कुमार का एक और घर है, जहां ट्रैक्टर व स्कूटी रखी हुई थी जिसे तोड़कर पूरी तरह नष्ट कर दिया गया.
मुन्ना पासवान ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को देखकर वह डर गए और घर से भाग गए. उन्होंने पत्नी व बच्चों को भी भाग जाने को कहा. घर में उस वक्त उनकी पत्नी ग्राम प्रधान मंजू, बेटा सूर्य प्रकाश (17 वर्ष), अन्नू (15) और सत्यम (12) थे. उनकी मां चम्पा देवी, बहन संध्या और सुमन घर भी में थे. संध्या की इसी मई महीने में शादी हुई है.
ग्राम प्रधान मंजू ने बताया, ‘पुलिस ने गांव पहुंचते ही पहले सड़क के पोल से उनके और आसपास के घरों की बिजली काट दी. पुलिसवाले उनके घरों की तरफ बढ़े और जो भी मिला पीटने लगे. जेसीबी से घरों का तोड़ा जाने लगा. मैं बच्चों सहित घर के पीछे से ताल की तरफ भाग गई. मैं रात एक बजे तक ताल के पास छिपी रही. गांव के लोग भी ताल की तरफ छिपने के लिए आ रहे थे. हमें घरों को तोड़ने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी.’
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उन्होंने बताया, ‘रात एक बजे जब पुलिस की गाड़ियां वापस लौट गईं, तब हम वापस आए. हमने घर का सारा सामन बिखरा और टूटा पाया. आलमारियां टूटी थीं. उसमें से गहने, जेवर और नकदी गायब थे. जमकर तोड़फोड़ की गई थी. कपड़े और बच्चों की किताबें तक फाड़ दी गई थीं.’
मुन्ना पासवान का आरोप है कि उन्होंने ईंट-भट्ठे का 6.5 लाख रुपये आलमारी में रखे थे. वह भी गायब हैं. उन्होंने बताया कि उनके घर में रखे एलसीडी टीवी, इनवर्टर, लैपटॉप समेत सारा सामान तोड़ दिया गया था. मंजू ने बताया कि बच्चों की मार्कशीट तक गायब है.
मुन्ना की बहन संध्या ने बताया कि वह अपने कमरे में थीं. घर में घुसे पुलिसकर्मियों में से एक ने उन्हें गाली देते हुए डंडे से बाएं हाथ पर मारा. संध्या ने बताया कि वह अपनी छोटी बहन सुमन और मां को लेकर घर के पीछे के रास्ते से ताल की तरफ भागीं. महिला पुलिसकर्मी भी आई थीं, लेकिन वे ज्यादा कुछ नहीं कर रही थीं. मारने-पीटने और तोड़फोड़ का काम पुरुष पुलिसकर्मी कर रहे थे.
संध्या का आरोप है कि पुलिसवाले उसका मोबाइल और लैपटॉप तक उठा ले गए.
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मुन्ना पासवान के घर के दो पिलर जेसीबी से तोड़ दिए गए हैं. इससे मकान के आगे का हिस्सा टूटकर गिरने का खतरा पैदा हो गया है. इसी तरह की तोड़फोड़ स्वतंत्र कुमार के घर में हुई है. उस वक्त घर पर उनकी मां, उनके बड़े भाई सूर्यभान की पत्नी सुनीता, चार वर्ष का बेटा थे.
स्वतंत्र कुमार का घर बुरी तरह तोड़ दिया गया है. किचन और बाथरूम तक क्षतिग्रस्त किया गया है. एक कमरे में मंदिर था, वह भी तोड़ा गया है.
गांव की निवासी 45 वर्षीय सुनीता ने बताया कि उनकी सास दमा की मरीज हैं. वह उस रात खाना बना रही थीं, जब पुलिसवाले उनके घर आए. वे भद्दी-भद्दी गालियां दे रहे थे. जेसीबी से उनके घर के आगे का हिस्सा तोड़ा जाने लगा. वह बच्चे और सास के साथ भागकर गांव के एक घर में छुप गईं.
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उनका आरोप है कि पुलिस का तांडव रात एक बजे तक चलता रहा. इस घटना से सास की तबियत बुरी तरह खराब हो गई है और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है.
मुझे डंडे से पीटते हुए घर के अंदर से घसीट कर बाहर लाए
स्वतंत्र कुमार के सामने वाला घर राजपति पासवान का है. उस रात उनकी बेटी प्रियंका भोजन बना रही थीं. प्रियंका ने इसी वर्ष बीए की पढ़ाई पूरी की है. प्रियंका ने बताया कि उनकी भाभी मंजू अपने चार महीने के बच्चे को दूध पिला रही थीं, तभी पुलिसवाले उनके घर का दरवाजा तोड़ते हुए अंदर घुसे.
प्रियंका ने कहा, ‘मैंने उनसे कहा कि हमारे घर को क्यों तोड़ रहे हो तो एक पुलिसकर्मी ने पूछा कि प्रधान का घर कौन है. मैंने कहा कि यह प्रधान का घर नहीं है. उनके चाचा का घर है. इसके बाद पुलिसकर्मी मुझे गाली देते हुए डंडे से मारने लगे. मुझे घसीटते हुए घर से बाहर लाकर डंडे से पीटा गया. कुछ पुलिसकर्मियों ने भाभी मंजू की पिटाई शुरू कर दी. उसकी गोद में चार महीने का बच्चा गिर गया और उसके सिर में चोट आई.’
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उन्होंने आगे कहा, ‘भाभी का चार महीने पहले ऑपरेशन हुआ था और वे बेल्ट लगाई हुई थीं. फिर भी पुलिसवाले उन्हें पीटते रहे. मैं उनके आगे हाथ जोड़ कहती रही हमें छोड़ दीजिए लेकिन कोई असर नहीं हुआ. पिटाई से घायल भाभी और उनका चार महीने का बच्चा अब अस्पताल में भर्ती हैं.’
पूरी जिंदगी इस घटना को नहीं भूल सकती
सुनीता ने बताया कि अगले दिन 30 जून की दोपहर जब पुलिस दोबारा आई तो वह अपने घर में हुए तोड़फोड़ को देख रही थीं. तब पुलिस गालियां देने के साथ उन्हें लाठियों से पीटने लगी.
उन्होंने बताया, ‘आज 10 दिन बाद भी पूरे शरीर में घाव है. मुझे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि किस गलती के लिए मुझे मारा गया है. ऐसी दरिंदगी मैने देखी नहीं हैं. मैं घर की बड़ी बहू हूं. घर के बाहर कम निकलती हूं, लेकिन उस दिन पुलिस ने पूरे गांव के सामने मुझे मारा, बेइज्जत किया. पूरी जिंदगी इस घटना को नहीं भूल सकती.’
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सुनीता की ननद ने अपने पिता, भाई के बच्चे की टूटी फोटो फ्रेम दिखाते हुए कहा कि घर में रखीं सभी तस्वीरों को पुलिसकर्मियों ने बूट से कुचल दिया. पापा (श्यामदेव) की तस्वीर भी उठा ले गए. स्वतंत्र कुमार के बेटे की तस्वीर को चाकू से रेता गया. आखिर तस्वीर को काटने बूट से कुचलने का क्या मकसद हो सकता है.
गांव के 25 वर्षीय पिंटू ने बताया कि 40 गाड़ियों से पुलिस आई थी. उन्होंने सबको पीटना शुरू कर दिया. मेरी बड़ी भाभी सुनीता के अलावा दो लड़कियों को बुरी तरह मारा. पुलिस हाईस्कूल में पढ़ रहे चंदन और चंद्रजीत (40 वर्ष) को पकड़ कर ले गई.
पिंटू ने बताया कि तीन जुलाई की रात पुलिस फिर गांव में आई और रात दो बजे तक तांडव मचाया. मजदूर सुरेश को भी पकड़ कर ले जाया गया, जिसे चार दिन बाद छोड़ा गया.
उन्होंने कहा, ‘पुलिस जब मेरे घर में घुसी तो मैं गोबर के उपले का ढेर में छिप गया. सम्हारू के घर में 20-25 पुलिसकर्मियों ने महिलाओं से अभद्रता करते हुए कहा कि शिववचन यदि हाजिर नहीं हुआ तो तुम्हारा घर भी ग्राम प्रधान की घर की तरह तोड़ दिया जाएगा.’
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क्या दलितों को सबक सीखने के लिए कार्रवाई की गई
सुनीता के ससुर श्यामदेव अधिशासी अधिकारी थे. उनकी पिछले साल मृत्यु हो गई थी. श्यामदेव दलितों की शिक्षा और उन्हें आगे बढ़ने के लिए मदद किया करते थे. उनके प्रयास से न सिर्फ उनके घर बल्कि पूरे गांव के पासी बिरादरी के लोग शिक्षा, रोजगार की तरफ बढे़, गांव में तमाम लोग नौकरियों में हैं, जो इसका श्रेय श्यामदेव को देते हैं.
लालगंज के रामजानकी मंदिर के महंत कन्हैया प्रभु गिरि देश के पहले दलित महामंडलेश्वर हैं, जो जूना अखाड़े से जुड़े हुए हैं. वह कहते हैं कि श्यामदेव जी की प्रेरणा से ही आज वह इस मुकाम पर हैं. जिस पैमाने पर तोड़फोड़ और लूटपाट की गई है, उससे साफ लगता है कि यह कार्रवाई बदला लेने की भावना से की गई है.
उन्होंने कहा कि पलिया और आसपास के इलाके में पासी बिरादरी के काफी लोग हैं, जो शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में काफी आगे बढ़े हैं. संगठित हैं और राजनीति में भी भागीदारी कर रहे हैं. मुन्ना पासवान काफी लोकप्रिय हैं और 20 वर्ष से उनके परिवार या समर्थक प्रधान चुने जाते रहे हैं. इस कारण जातीय वर्चस्व की भावना से ग्रस्त लोगों ने साजिश कर पुलिस को उकसा कर यह कार्रवाई कराई है.
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वह इलाके के एक भाजपा नेता की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से मुन्ना पासवान के परिवार को परेशान करने और उत्पीड़ित करने की कोशिश की जा रही है. एक वर्ष पहले स्वतंत्र कुमार के ईंट-भट्ठे पर शराब रखकर फंसाने की कोशिश की गई थी.
कन्हैया गिरि सात जुलाई को मुन्ना पासवान को लेकर डीएम और एसपी से मिले थे. उन्होंने मांग की कि तोड़फोड़ से हुए नुकसान का मुआवजा दे. दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करे. गिरफ्तार लोगों को छोड़े और गांव के लोगों पर दर्ज केस वापस ले.
गांव में धरना दे रहे आजाद समाज पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एहसान खान ने कहा कि इस गांव की दलित बिरादरी के लोग अपनी मेहनत से आगे बढ़ गए हैं. संपन्न हो गए हैं. उन्होंने अच्छे घर बनवाए हैं. ट्रैक्टर-कार खरीदी है. दलितों की समृद्धि ताकतवर लोगों को देखी नहीं जा रही है. एहसान पुलिस की कार्यवाही को बड़ी साजिश का हिस्सा मानते हैं और जांच की मांग करते हैं.
पलिया गांव की घटना दबी ही रह जाती यदि कांग्रेस के संगठन सचिव अनिल कुमार यादव गांव नहीं पहुंचे होते. चार जुलाई की रात जब वह गांव पहुंचे तो महिलाओं ने उनसे अनुरोध किया कि वे गांव से न जाएं क्योंकि पुलिस रोज उत्पीड़न कर रही है. अनिल यादव अपने साथियों के साथ गांव में रुक गए और अगले दिन उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष विश्व विजय सिंह, जिलाध्यक्ष प्रवीण सिंह के साथ गांव में धरना शुरू कर दिया.
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कांग्रेस नेता ने तीन दिन तक गांव में धरना दिया. इसके बाद पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने पांच जुलाई को घटना को लेकर ट्वीट किया. फिर बसपा सुप्रीमो मायावती ने ट्वीट किया. इसके बाद पलिया गांव में दलितों के साथ हुआ अत्याचार सुर्खियों में आ गया. कांग्रेस ने बाद में जिला मुख्यालय पर उपवास किया.
बीते 19 जुलाई को गांव पहुंचे भीम आर्मी के प्रमुख और आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर ने पीड़ित परिवारों को पांच करोड़ का मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. उन्होंने कार्रवाई नहीं होने पर गांव में महापंचायत के आयोजन करने को कहा है.
गांव में तोड़फोड़ की कार्रवाई से पुलिस का इनकार
आजमगढ़ के पुलिस कप्तान सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि सिपाही विवेक त्रिपाठी के साथ गंभीर मारपीट की गई थी. उनका आपरेशन कराना पड़ा. लिट्टन विश्वास के साथ हुई मारपीट और पुलिसकर्मियों पर हमले के मामले में दो एफआईआर दर्ज की गई है.
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उन्होंने पुलिस द्वारा तोड़फोड़ की कार्यवाही किए जाने से इनकार किया और कहा कि घरों में हुई तोड़फोड़ के मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए महिलाओं को आगे कर धरना-प्रदर्शन कराया जा रहा है.
हालांकि बढ़ते दबाव के बाद बड़े अफसर छह जुलाई की दोपहर पलिया गांव पहुंचे और ग्रामीणों से बातचीत की.
इसी दिन रौनापार के एसओ तारकेश्वर राय को लाइन हाजिर कर दिया गया और घटना की मजिस्ट्रेटी जांच की घोषणा की गई. चार दिन बाद सीओ सगड़ी गोपाल स्वरूप वाजपेयी का तबादला कर दिया गया. इसी सीओ पर सुनीता देवी ने आरोप लगाया था कि उन्होंने कहा था कि रात में जो मजा चाहिए था नहीं मिला, इसलिए दिन में आए हैं. सुनीता का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है.
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आंदोलन के दबाव में फिलहाल पलिया गांव में पुलिस की कार्रवाई रुक गई है. गांव से भागे पुरुष वापस आ रहे हैं. लोग अपने टूटे घर, बिखरे सामान को व्यवस्थित करने में लगे हैं, लेकिन लेकिन पुलिस द्वारा की गई इस विध्वंसक कार्रवाई के घाव दलितों के दिल में हमेशा बने रहेंगे.
(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)
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