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क्या भारत में कारगर है दो बच्चों की नीति?

क्या भारत में कारगर है दो बच्चों की नीति?


के. पी. मलिक
साल 1979 में चीन ने बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के लिए एक बच्चा पैदा करने की नीति बनाई थी। लेकिन तीस साल बाद वहां की सरकार को अपनी इस नीति में बदलाव करते हुए दंपतियों को दो बच्चे पैदा करने की इजाजत देनी पड़ी। इस बदलाव की वजह क्या रही और चीन को इससे कितना फायदा मिला? इस बात को समझने के लिए एक बच्चा पॉलिसी से होने वाले नुक्सानों और दो बच्चा पॉलिसी के फायदों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
हालांकि इसके कई पहलू हैं, लेकिन अगर मोटे तौर पर देखा जाए, तो सिंगल बच्चे चिड़चिड़े, तनावग्रस्त, गुमसुम, डरपोक और हिल-मिलकर प्यार से रहने से परहेज करने वाले होते हैं। वहीं दो बच्चे या अधिक बच्चे आपस में खेलने-कूदने, मिलकर खाने, उठने, बैठने, सोने और आपस में बातचीत करने से सामाजिक रिश्तों की डोर से बंधने का अभ्यास करते हैं और बड़े होकर एक सामुदायिक प्यार, व्यवहार वाला समाज बनाते हैं और रिश्तों के महत्व को समझते हैं।
हालांकि इसके दूसरे पहलू पर भी गौर किया जाये तो भारत में आजकल शिक्षित वर्ग अपने परिवार को सीमित ऱखकर उसका अच्छी प्रकार से पालन पोषण और बच्चों की शिक्षित करने के लिए प्रयासरत रहता है। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि एक बच्चा नीति (वन चाइल्ड पॉलिसी) देश की संस्कृति और सुरक्षा के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है। जाहिर है कि आज देश में ज्यादातर संभ्रांत और शिक्षित वर्ग के लोग सिर्फ एक ही बच्चा पैदा करते हैं। जबकि अगर पहला बच्चा लड़की हो जाए तब ही वह दो बच्चे पैदा करने की बात सोचते हैं।
इस उम्मीद में कि शायद दूसरा बच्चा बेटा हो जाए, अब ज़रा ध्यान से सोचो जब आपका एक ही बेटा होगा, तो क्या वह अपने बेटे को सेना में बॉर्डर पर लड़ने के लिए भेजेगें? क्यों भेजेगें? क्योंकि उन्हें हमेशा ये डर लगा रहेगा कि एक ही बच्चा है, कहीं मर गया तो बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा? दूसरी ध्यान देने योग्य बात कि अगर हमारे आस पड़ोस में दंगा-फ़साद हो जाये और मोहल्ले में लोगों की सम्प्पति को नुकसान पहुंचाने या जलाने का प्रयास किया जाये, तो क्या हम कभी अपने एक बेटे को कमरे के बाहर निकाल पाएंगे? शायद नहीं निकाल पाएंगे।
क्योंकि हम सब चाहते हैं कि क्रांतिकारी भगतसिंह पडौस में पैदा हो, न कि हमारे घर में। लेकिन अगर अपने ही घर में मुसीबत आ पड़े, तो क्या इकलौता बच्चा घर और बूढ़े मां-बाप या दूसरे घर वालों की हिफाजत कर पाएगा, वह भी लड़का हुआ, तब तो यह और मुश्किल होगा। तो क्या यहां यह मान लिया जाए हम अपने एकलौते बच्चे को बचपन से ही सिर्फ़ अपना ख्याल ऱखने और केवल अपने और अपने परिवार के विषय में ही सोचने की ट्रेनिंग देंगे कि बेटा दंगे फ़साद में उलझना हमारा काम नहीं है, वह पुलिस प्रशासन देख लेगा।
हालांकि सामाज के कुछ जानकारों का मानना है कि ‘अगर हम ये सोच रहे हो कि हम तो अपने एकलौते बेटे को पढ़ा-लिखाकर नौकरशाह, अधिकारी या कर्मचारी बना देंगे। तो ऐसा भी नहीं होगा, क्योंकि अनपढ़ और अशिक्षित लोग आज भी गांव व दूर दराज़ के क्षेत्रों में पांच-पांच बच्चे पैदा कर रहे हैं। भले ही वे बड़े होकर खेतों, कारखानों, मिलों और अन्य उधोगों में मजदूरी करें। सड़क पर चाय बेचें, बिजली के उपकरण सुधारें, पंचर की दुकान खोलें या ढाबों पर बर्तन धोएं।
लेकिन एक बात तो तय है कि वे लोकतंत्र के अधिकार के मुताबिक अपनी क़ीमती वोट की ताक़त से सरकार में सत्ता के फेरबदल का अचूक हथियार सिद्ध होंगे, जिससे अशिक्षित और अनपढ़ लोग सत्ता के शीर्ष पर बैठकर देश को किस ओर लेकर जाएंगे, इसका अंदाजा बड़ी आसानी से हाल-फिलहाल के माहौल को देखकर लगाया जा सकता है। क्योंकि सत्ता हासिल करने के बाद इस प्रकार के लोग अपनी सुविधानुसार नियम-कानून बदलवाने का काम करेंगे। जिससे तुम्हारा उच्च शिक्षा प्राप्त इकलौता बेटा जो मतदान के दिन मतदान करने भी नहीं जाएगा, बल्कि छुट्टी मानकर पिकनिक मनाने चला जाएगा और बेरोज़गार ही रहेगा।
क्योंकि कम पढ़े-लिखे और अनपढ ऊंची पहुंच रखने वाले लोग पहुंच के आधार पर नौकरियां पा चुके होंगे। हालांकि अभी इस प्रकार की बातों पर विश्वास करना मुश्किल लग रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। जो महत्व अति पिछडों और वनवासियों को दिया जाना चाहिए था, उसमें कई अन्य अनुप्रयुक्त लोगों को भी सरकारी लाभ की कैटेगरी में डाल दिया गया है।
अब शहरों, महानगरों और विकसित इलाकों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा नौकरी और रोजगार के लिए सरकार का मुंह ताक रहैं हैं और पहुंच की आड़ में कई अयोग्य उम्मीदवार नाममात्र की शिक्षा प्राप्त करके भी सरकारी और अर्द्ध सरकारी नौकरियाँ प्राप्त कर रहें हैं। अगर हालात यही रहे, तो वो दिन दूर नहीं जब इनको नौकरी तो क्या? छोकरी भी नहीं मिलेगी। मतलब धीरे-धीरे परिस्थितियां ऐसी होती जाएंगी कि पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं की शादियां भी मुश्किल से ही होंगी। क्योंकि जब रोजी-रोजगार ही नहीं होगा, व्यापार नहीं होगा, काम नहीं होगा, तो कोई ऐसे बेरोजगार से शादी क्यों करेगा?’
जाने माने अधिवक्ता और विचारक ओमेंद्र सिंह ‘राघव’ कहते हैं कि ‘देश की आबादी जिस गति से बढ रही है शीघ्र ही हम चीन को पछाडकर नंबर वन बन सकते है। पुराने समय में महिलाएं बच्चों के जन्म में अंतर या रोकने के साधनो के संबध मे कुछ जानती नही थी। सोलह सतरह की उम्र मे शादी हो जाती थी और तीस साल की उम्र आते-आते आधे दर्जन और पैतालिस से ऊपर की उम्र मे एक दर्जन बच्चो की माँ बन जाती थी। मगर बाद मे स्थिती बदली पढी लिखी महिलाओं ने जानवरों की तरह हर साल प्रजनन का विरोध करना शुरु कर दिया और बच्चों की संख्या एक दर्जन से घटाकर वो दो-तीन पर ले आयीं।
जबकि अशिक्षित वर्ग मे चाहे वो किसी भी जाति धर्म का हो, बच्चे पैदा करने का आंकडा 4 से 6 के बीच का है। उन मजदूरों के बच्चे भूख से मरते रहते हैं। झूठन खाकर पेट भर रहते है। मांये बीमारियों से मरती रहती है। बाप सुबह से शाम तक मजदूरी करते रहते है। आज देश में जहां मंहगाई अपने चरम पर है मगर बच्चे पैदा करने का उनका काम बदस्तूर जारी है। मैने कभी किसी सरकारी नुमांईदों या गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को इन गली कूंचों और झुग्गी झोपड़ियों मे जाकर इन लोगों को यह समझाते नही देखा की वो बच्चे एक दो से ज्यादा पैदा न करें।’
देश में इंदिरा सरकार के बाद किसी भी सरकार ने आबादी घटाने की बात तो दूर, बढ़ती आबादी को रोकने की ईमानदारी से कोशिश ही नही की। हालाकि वह बात अलग है कि इंदिरा सरकार के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम का व्यापक विरोध हुआ और जो इंदिरा सरकार के पतन का एक कारण भी बना। लेकिन अफसोस ये है कि देश के कई धार्मिक संगठन अपने धर्म और जाति के लोगों की बढती आबादी मे अपने समाज और धर्म का उन्नत भविष्य तलाश कर रहे है। राजनीतिक दलों पर इन धार्मिक संगठनों के दबाव के कारण सत्ता मे आने के बाद कोई भी दल आबादी को बढने से रोकने के लिए ठोस कदम उठाने से परहेज करते है। यदि कोई दल ऐसा करे भी तो उसका विपक्ष द्वारा घोर विरोध किया जाता है और उस पर एक धर्म विशेष और उस समुदाय के विरोधी होने का आरोप लगता है।
लेकिन अब समय आ गया है कि देशहित में सभी राजनीतिक दलों और जाति-धर्म के लोग एक जाजम पर बैठकर बढती आबादी को रोकने के उपायों पर गम्भीरता से विचार करें। कुछ कट्टर धर्मांध ये दुष्प्रचार करते है कि वों अपने धर्म कि ज्यादा से ज्यादा आबादी बढाकर, इस देश की सत्ता अपने हाथों मे लेगें, ऐसे धातक बेतुके विचारों पर तत्काल रोक लगायी जानी चाहिए। हालांकि अन्य दूसरे धर्म के लोग जो ये सोचते है कि सत्ता मे बने रहने के लिए उनके धर्म के लोगों की आबादी भी कम नही होनी चाहिये, इस हानिकारक धातक सोच को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। ये दोनों ही प्रकार की सोच भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए हानिकारक है।
बहरहाल आआज समय की जरूरत है कि सरकार को हर परिवार पर दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों को हतोत्साहित करने के लिए उनकी हर प्रकार की सरकारी सहायता, सब्सिडी, अनुदान और सुविधाएं तत्काल बंद कर देनी चाहिये। जिसकी शुरुआत सरकार की तमाम योजनाओं, अस्पतालों और स्कूलों के लाभार्थीयों से हो जानी चाहिए। जो भी व्यक्ति सरकारी सहायता लेने, अस्पताल मे इलाज का पात्र हो उससे दो से ज्यादा बच्चे न होने का एफीडेवीट लिया जाये।
यदि वो नही दे, तो उनके इलाज के साथ पति-पत्नी मे से किसी एक की नसबंदी कर दी जाये। विवाह के लिए सरकारी अनुमति लेना आवश्यक कर दिया जाये, जिसमे दहेज व दो से ज्यादा बच्चे पैदा न करने का प्रतिबंधित एफीडेविट लिया जाये। फ़िर चाहे वो किसी भी जाति या धर्म से हो। यही नहीं दो से अधिक बच्चों के माता-पिता की नौकरी में तरक्की रोके जाने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि इस बात की प्रबल संभावना है कि कुछ दिन भयंकर विरोध होगा। वोटों और धर्म के ठेकेदार सड़कों पर आयेगें।
मगर देश हित को ध्यान मे रखते हुये, चुनी हुई पूर्ण बहुमत की सरकार को कडे और सख्त कदम उठाने होगें। वरना अगले पचास सालों मे ये भारतभूमि बढती आबादी का भारी बोझ नही झेल पायेगी। इतनी बडी आबादी के लिए भविष्य में कोरोना जैसी महामारी से बचाव, रोजगार, अनाज, पानी, दवाए, अस्पताल, घर और बिजली मुहैया कराना मुश्किल ही नही नामुमकिन हो जायेगा। यहां तक की आने वाली हमारी बदनसीब पीढ़ियों के लोगों के अंतिम संस्कार या दफनाने के लिए दो गज जमीन भी नसीब न होगी।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

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