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‘थप्पड़’ लोकतंत्र की ज़मींदारी है!

‘थप्पड़’ लोकतंत्र की ज़मींदारी है!

व्यंग्य: क्या ‘थप्पड़’ ही रामबाण इलाज है!

======मनोज सिंह===

भारतीय प्रशासनिक अधिकारी (Indian Administrative Officer) पिछले साल से थप्पड़ (Slap) का इस्तेमाल कोरोना (Corona) संक्रमण की रोकथाम के लिए कर रहे हैं. इस साल भी रोज़ ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं. सड़क पर खुले सांड की तरह घूम रहे संक्रमण का इलाज़ थप्पड़ मार कर किया जा रहा है. यदि थप्पड़ का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया होता तो अस्पतालों में ऑक्सीज़न, वेंटिलेटर की कमी नहीं हुई होती. ज़मींदारी काल का थप्पड़ आज कोविड काल में हमारी गौरवशाली प्रशासन परंपरा की याद दिला रहा है.

डीएम साहब ज़मींदार हैं. सीओ साहब ज़मींदार हैं. एसपी साहब ज़मींदार हैं. कलेक्टर साहब ज़मींदार हैं. मैडम हों या साहब हों सभी ज़मींदार हैं. साहब और मैम साहब दोनों को ग़ुस्सा आता है. ख़ूब आता है. जब कोई आम आदमी जो अक्सर ग़रीब होता है, उनके आदेश की अवहेलना करता दिखता है. ग़ुस्सा इसलिए भी ज्यादा आता है कि, आदेश तेरी भलाई के लिए जारी किए थे बे! सरकारी अधिकारी हैं. जनता की सेवा का शपथ लिए हैं. शपथ पूरी करने के लिए चपेड़ भी लगानी पड़ती है. भारत में आज नहीं बल्कि जब से ज़मींदारी प्रथा समाप्त की गई है तब से अधिकारी को ज़मींदार की ड्यूटी करनी पड़ रही है.


‘थप्पड़’ लोकतंत्र की ज़मींदारी है!
एक समय था. पुरानी फ़िल्मों में भी देखा होगा. एक ठाकुर साहब हुआ करते थे. एक ख़ान भी हुआ करते थे. अंग्रेज़ों ने उनपर ज़मींदारी की ड्यूटी लगा रखी थी. अंग्रेज़ गए तो कांग्रेसी आ गए. कांग्रेस ने वादा किया था कि वह क्रूर जमींदारी प्रथा को ख़त्म कर देंगे. नेहरू जी ने वादा निभाया. भूमि सुधार किए. ज़मींदारी प्रथा ख़त्म की. लेकिन तब तक जनता को क्रूरता की आदत लग चुकी थी. ज़मींदारों के ना होने की वजह से लोग भी निरंकुश होते जा रहे थे. सिस्टम में एक गैप आ गया था. ठीक इसी वक़्त, अंग्रेज़ों की शासन प्रणाली से निकले साहब लोगों को लगा कि यही अच्छा और देश के भले में होगा कि वह इस गैप को फ़िल कर दें. मसूरी में साहब लोगों का एक स्कूल है. बड़ा कूल है. एकआध को छोड़ दें यहां ज़मींदार टाइप उच्चवर्गीय कुल के बच्चों को ही साहब बनाने की ट्रेनिंग दी जाती रही. प्रशासन की ज़िम्मेदारी अब साहब लोगों पर आन पड़ी थी. साहब लोगों को लोकतंत्र में जनतंत्र का मुखौटा बनना पड़ा. ज़िम्मेदारी निभानी पड़ी. हाथ उठाना पड़ा. चपेट लगानी पड़ी. और थप्पड़ मारना ही पड़ा.

‘थप्पड़’ अहिंसा का परिचायक है!
थप्पड़ मारना कोई बुरी बात नहीं है. यह हमारी सभ्यता-संस्कृति की परिचायक है. थप्पड़ मारना कोई हिंसा भी नहीं है. गांधीजी ने भी यही कहा था, कोई एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो. वह जानते थे कि जनता का गाल ज़मींदार की भूमि है. वह जब चाहे उसपर हल चलवा दे. जब चाहे उसे बंजर छोड़ दे. लेकिन ज़मीन को बंजर छोड़ने से उस पर खर पतवार उग जाते हैं. ठीक वैसे ही अगर गाल पर थप्पड़ ना मारा जाए तो चरित्र में खर पतवार उग आते हैं. लोकतंत्र में जनता के गाल पर यदि समय-समय पर थप्पड़ ना मारा जाए तो लोकतंत्र में खर पतवार उग आने का ख़तरा बना रहता है. हमारे मां बाप भी तो इसीलिए थप्पड़ मारा करते थे.

हां आजकल की न्यू जेनरेशन को यह आपत्तिजनक और हिंसक व्यवहार लगता है. क्या कहें यह जेनरेशन भी किसी खर पतवार से कम नहीं है. स्कूल में कोई टीचर किसी बच्चे को थप्पड़ मार कर तो दिखाए. एफ.आई.आर हो जाएगी. अभिभावक सोशियल मीडिया पर मुहिम चलाकार स्कूल को बदनाम कर देते हैं. भगवान श्री राम और भगवान कृष्ण के ज़माने में थप्पड़ का प्रचलन नहीं था. वह दौर हिंसक था. तब भगवान श्री कृष्ण नाराज़ होने पर सुदर्शन चक्र चला देते थे. गला ही कट जाता था. लक्ष्मण जी चाक़ू चला देते थे. नाक कट जाती थी. राम जी तीर चला देते थे. जान चली जाती थी. क्या वह एक थप्पड़ मार कर काम नहीं चला सकते थे. यदि उस दौर में सिर्फ़ एक थप्पड़ का चलन रहा होता तो, सौ कौरवों का वध नहीं होता. द्रौपदी का चीरहरण होते देख कृष्ण जी दुर्योधन को बस एक थप्पड़ जड़ देते तो कितना अच्छा होता. आज साहब लोगों एक थप्पड़ मारकर ही लोकतंत्र का चीर हरण होने से देश को बचा रहे हैं.

‘थप्पड़’ सुधारक है, सज़ा नहीं!
लोकतंत्र में थप्पड़ एक कारगर हथियार है. चुनाव प्रचार में एक थप्पड़ वो कमाल करता है कि नेता दिल्ली जीत जाता है. जनता थप्पड़ खाने वाले से कनेक्ट करती है. थप्पड़ मारने वाले को वह ज़मींदार समझती है. थप्पड़ खाने वाले के प्रति उसके मन में करुणा का भाव जग जाता है. थप्पड़ खाने के लिए कई बार नेता अपने ही लोगों को प्रलोभन देता है. भाई चुनाव में जनता का मूड ठीक नहीं लग रहा है. कहीं से एक थप्पड़ का इंतज़ाम करवा दो. बस मूड बन जाएगा. वैसे सिर्फ़ नेता ही नहीं जनता में भी थप्पड़ का डर धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है. सोशलमीडिया ने थप्पड़ को सुधारक मानने से इंकार कर दिया है. थप्पड़ मारने वाले को विलेन के रूप में पेश किया जा रहा है. साहब लोग सस्पेंड हो रहे हैं. यह ट्रेंड प्रशासन की राह में रोड़ा बन रहा है. प्रशासन यदि थप्पड़ का इस्तेमाल ना करे तो क्या गोली चला दे. डंडे को समाज ने पहले ही बदनाम कर रखा है. अब एक थप्पड़ ही बचा हुआ है. यह एक प्रशासनिक हथियार है. बल्कि थप्पड़ को राष्ट्रीय हथियार घोषित कर देना चाहिए. हमने अहिंसा के सहारे आज़ादी हासिल की. थप्पड़ से बड़ा अहिंसक हथियार और क्या हो सकता है भला.

‘थप्पड़’ ही रामबाण इलाज़ है!
थप्पड़ तो प्यार से भी मारा जाता है. साहब ने प्यार से किसी को थप्पड़ मार दिया. वह प्यार से थप्पड़ खा गया. अब इस प्यार से अभिभूत वह आम आदमी दोबारा सड़क पर आवारा गर्दी करने नहीं निकलेगा. कोरोना काल है. वैश्विक आपदा का समय है. ऐसे में यह थप्पड़ का ही कमाल है जो दिन प्रति दिन संक्रमण का आंकड़ा घटता जा रहा है. बाबा जी आयुर्वेदिक मिक्सर से इलाज कर रहे हैं. एलोपैथिक डॉक्टर ‘ट्रायल एन्ड एरर’ पद्धति से इलाज़ कर रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को कोई इलाज़ ही नहीं सूझ रहा है. ऐसे में साहब का थप्पड़ ही कोरोना का एकमात्र रामबाण इलाज़ है. आंकड़े घट रहे हैं. साइंटिफ़िक एविडेंस को इग्नोर करना बड़ी भूल होगी. अब हमें थप्पड़ को कोरोना का राष्ट्रीय इलाज़ घोषित कर देना चाहिए. क्योंकि थप्पड़ से नहीं साहब, सिस्टम से डर लगता है!

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