बीजेपी की शरारत राष्ट्रीय चिन्हों के साथ छेड़छाड़

Atal Hind17 February 20268 min read0 viewsलेख
बीजेपी की शरारत  राष्ट्रीय चिन्हों के साथ छेड़छाड़

 

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

 

 

 

 

 

 

आलेख : अटल हिन्द /राजेंद्र शर्मा

यह अगर संयोग भी हो, तो भी बहुत ही अर्थपूर्ण संयोग है। ठीक उस समय, जब अमरीका के विदेश सचिव, मार्क रूबियो एक कथित अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा कान्फ्रेंस में योरप का, ट्रम्प की अगुआई में वैश्विक दक्षिण के उपनिवेशीकरण का प्रोजैक्ट पुनर्जीवित करने के लिए भावपूर्ण आह्वान कर रहे थे, ताकि दुनिया भर में साम्राज्यवाद की धाक को लौटाया जा सके। ठीक तभी भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा की सरकार, भारत की आजादी की लड़ाई के हासिलों को पलटने के अपने प्रोजैक्ट के हिस्से के तौर पर, स्वतंत्रता के संघर्ष से जुड़े, स्वतंत्र भारत के प्रतीकों को औपचारिक रूप से पलटने के सिलसिले की शुरूआत कर रही थी। हम बात कर रहे हैं, राष्ट्र गीत ”वंदे मातरम्” के संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ताजा निर्देशों की, जिन्हें इसी 6 फरवरी को मंत्रालय के वैबसाइट पर अपडेट किया गया है।  यह सवाल किया जा सकता है कि क्यों नहीं इन निर्देशों को, डेढ़ सौवीं सालगिरह पर उस ”वंदे मातरम” को सम्मान देना ही माना जाए, जिसे स्वतंत्रता के बाद भारत की संविधान सभा ने, ‘भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में एक ऐतिहासिक भूमिका अदा करने’ के लिए, राष्ट्र गान के रूप में स्वीकार किए गए ”जन गण मन” के ‘बराबर सम्मान देने’ और बराबर का दर्जा देने का निर्णय लिया था? गृह मंत्रालय के ताजा निर्णय में ऐसा क्या है, जिसे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और स्वतंत्र भारत द्वारा स्वीकार किए गए राष्ट्रीय चिन्हों के साथ छेड़छाड़ कहा जा सकता है?

 

 

 

 

अमित शाह (Amit Shah)के नेतृत्व में केंद्रीय गृह मंत्रालय (Union Home Ministry)द्वारा बिना किसी बहस या चर्चा के अचानक थोपे गए इस फैसले के कम से कम दो पहलू ऐसे हैं, जो आदर करने के नाम पर वंदे मातरम को, राष्ट्र गान ”जन गण मन” के अनादर का हथियार बनाए जाने की गवाही देते हैं। प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र गान का अनादर किए जाने का साक्ष्य तो, नये निर्देशों का यह प्रावधान ही है कि जब भी राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत दोनों गाए जाने हों, ”वंदे मातरम(Vande Mataram)” ही पहले गाया/ बजाया जाएगा, जबकि ”जन गण मन(Jana Gana Mana)” बाद में गाया/ बजाया जाएगा। इसे इन्हीं निर्देशों के दूसरे हिस्सों से जोड़कर देखें, जहां 26 जनवरी तथा 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय ध्वजारोहण के मौकों से लेकर, केंद्र तथा राज्यों के स्तर पर लगभग सभी सरकारी समारोहों में ”वंदे मातरम” के गाए/बजाए जाने को अनिवार्य किया गया है, सभी सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्र गीत का राष्ट्र गान के ऊपर रखा जाना बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।

और बात सिर्फ सरकारी समारोहों तक ही सीमित नहीं रहती है। गृह मंत्रालय के इन निर्देशों में जिस तरह से स्कूलों में दैनिक प्रार्थना में ”वंदे मातरम” को अपनाए जाने का इशारा किया गया है, उसके बाद हैरानी की बात नहीं होगी कि हम वर्तमान सत्ताधारी आरएसएस विचार परिवार के बढ़ावे के सहारे, इसे कम से कम सरकारी/ गैर-सरकारी स्कूलों के स्तर पर, ”वंदे मातरम” से जन गण मन को पूरी तरह से प्रतिस्थापित ही किया जाता देखें।

 

 

 

 

केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश, कम से कम भाजपा-शासित राज्यों में सहज ही शिक्षा तंत्र के लिए आदेश बन जाएंगे और ”वंदे मातरम” को गले लगाने के लिए, जन गण मन को बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाएगा। याद रहे कि यह तो शुरुआत है। आगे बात, राष्ट्रगान को व्यवहार में प्रतिस्थापित करने के बाद, औपचारिक रूप से प्रतिस्थापित किए जाने तक जाएगी। और जन गण मन से तो शुरुआत होगी, एक-एक कर सभी राष्ट्रीय चिन्हों की बारी आएगी। और अंतत: संविधान के ही पलटे जाने की।

वास्तव में ”वंदे मातरम” का सम्मान बहाल करने के नाम पर, राष्ट्र गान पर ही हमला करने की मोदी सरकार की नीयत का कुछ अंदाजा तो तभी लग गया था, जब मोदी मंत्रिमंडल ने अचानक राष्ट्र गीत, ”वंदे मातरम्” की डेढ़ सौवीं सालगिरह का वर्ष देश भर में जोर-शोर पालन करने का एलान किया था। इसके चंद रोज बाद, 7 नवंबर 2025 को राजधानी में इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में इन आयोजनों का उद्घाटन करते हुए अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस वर्ष के पालन का मकसद, राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा के, जिसका नेतृत्व कांग्रेस करती थी, आशयों, मंतव्यों तथा चिंताओं के सांप्रदायिक विकृतीकरण को आगे बढ़ाना और राष्ट्रीय आंदोलन की समावेशी सर्वानुमति की दुर्व्याख्या करना था। हैरानी की बात नहीं थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन के ”वंदे मातरम” के पहले दो अंतरे कांग्रेस के सभी आयोजनों में गाए जाने के निर्णय को अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण का सबूत बना दिया, बल्कि इस निर्णय को देश के विभाजन की नींव डालने वाला भी बना दिया।

 

 

 

राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की इसी कुव्याख्या को आगे बढ़ाने के लिए, आगे चलकर सत्ताधारी पार्टी और उसके सहयोगियों ने संसद के पिछले शीतकालीन सत्र पर, बाकी सभी विषयों से पहले वंदे मातरम पर विस्तृत विशेष बहस थोपी, जिसमें संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय आंदोलन की अपनी सांप्रदायिक दुर्व्याख्या और भी विस्तार से पेश करने का मौका मिल गया।

इसके बाद, 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड में एक प्रकार से, सरकारी आयोजन में जन गण मन के मुकाबले वंदे मातरम् को बढ़कर महत्व दिए जाने की शुरूआत करते हुए, कम से कम तीन झांकियों में वंदे मातरम् का महत्व दर्शाने के बाद, एक प्रकार से सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा पेश की गयी समापन झांकी में वंदे मातरम की विशाल और भव्य प्रस्तुति के नाम पर, एक रीमिक्स आधारित, लंबी संगीत-नृत्य प्रस्तुति भी की गयी। और बाद में परेड की बेहतर झांकी और बेहतरीन प्रस्तुति के दोनों पुरस्कार भी, वंदे मातरम को ही दे दिए गए। उसके बाद, वंदे मातरम को राष्ट्र गान के ऊपर रखे जाने की गृह मंत्रालय की घोषणा, एक ही कदम दूर रह जाती थी।
वंदे मातरम के संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा बनाए गए नियमों का दूसरा, उसे राष्ट्र गान से ऊपर रखे जाने जितना ही महत्वपूर्ण पहलू, सरकारी कार्यक्रमों में इसके सभी छ: बंद गाए/बजाए जाने का प्रावधान है। याद रहे कि राष्ट्र गीत के रूप में पूरा गीत गवाए/बजाए जाने का आग्रह इसके बावजूद है कि इसमें लगने वाला मानक समय 3 मिनट 10 सैकेंड का है, जो न सिर्फ एक मिनट से कम से हमारे राष्ट्र गान से साढ़े तीन गुना ज्यादा है, बल्कि सरकारी आयोजनों में प्रस्तुति के लिहाज से अनुपातहीन तरीके से बड़ा हो जाता है।

 

 

लेकिन, जैसाकि हमने पीछे इशारा किया, इस गीत के राष्ट्रीय आंदोलन में तथा उसका अनुसरण करते हुए, स्वतंत्रता के बाद संविधान में स्वीकार किए गए, पहले दो अंतरों तक सीमित स्वरूप के विरोध में ही तो, संघ-भाजपा के वंदे मातरम प्रेम का प्राण है। वर्ना सचाई यह है कि एक राष्ट्रीय पुकार के रूप में वंदे मातरम की सारी महत्ता के बावजूद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने न तो 1925 में अपनी स्थापना के समय वंदे मातरम को अपनी शुरुआती मराठी प्रार्थना पर वरीयता देने लायक समझा था और न बाद में अपनी वर्तमान प्रार्थना, ”नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” को अपनाते समय, उसे अपनाने लायक समझा था।

संघ-भाजपा का वंदे मातरम प्रेम सिर्फ इसीलिए है कि राष्ट्रीय आंदोलन की समावेशी प्रकृति ने, मुस्लिम अल्पसंख्यकों की दुविधाओं तथा धर्मनिरपेक्ष विचार के लोगों के आग्रह को ध्यान में रखते हुए, राष्ट्रीय धारा की अभिव्यक्ति के रूप में इस गीत के पहले दो बंदों को ही अपनाया था। और संघ-भाजपा, जो राष्ट्रीय आंदोलन की इस मुख्यधारा के विपरीत, उस दौर की विभाजनकारी बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक धारा के वारिस हैं, वंदे मातरम संंबंधी उक्त सर्वानुमति को पलटने के जरिए, उसे सांप्रदायिक धारा को वर्तमान में आगे बढ़ाने का हथियार बनाना चाहते हैं। हैरानी की बात नहीं है कि उक्त निर्णय राष्ट्रीय आंदोलन के कमोबेश समूचे शीर्ष नेतृत्व का था, जिसमें खुद रवींद्र नाथ टैगोर की आवाज सबसे महत्वपूर्ण थी। नेहरू पर हमले के बहाने, वे वास्तव में इस राष्ट्रीय सर्वानुमति को ही पलटना चाहते हैं। पूरा वंदे मातरम गाने/गवाने का आग्रह, इसी का सांप्रदायिक औजार है। यह एक राष्ट्रीय पुकार के रूप में वंदे मातरम के प्रेम से ठीक उल्टा है।

 

 

 

और यह भी मोदी-शाह निजाम के चरित्र के अनुरूप ही है कि वह एक प्रकार से चोरी-छिपे, राष्ट्रगान की जगह पर, वंदे मातरम को बैठाने की कोशिश कर रहा है। यह संयोग ही नहीं है कि राष्ट्रीय चिन्हों से संबंधित ऐसा महत्वपूर्ण बदलाव, गृह मंत्रालय द्वारा गुपचुप तरीके से नियमों की अपडेटिंग के नाम पर किया गया है। और जाहिर है कि यह इसके बावजूद किया जा रहा है कि राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत(National Anthem and National Song) की दो गीतों की व्यवस्था स्वीकार करते हुए भी, राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा को इसमें कोई दुविधा नहीं थी कि जन गण मन ही राष्ट्रगान है और राष्ट्रगीत के रूप में वंदे मातरम को उसके बराबर ही सम्मान दिया जाना था। जो मिसाल के तौर पर संसद का सत्र शुरू होने या राष्ट्रपति के अभिभाषण आदि के आरंभ में राष्ट्र गान तथा समापन पर राष्ट्र गीत, दोनों के ही स्वीकृत संपादित रूपों के गायन/वादन के रूप में अब तक भी किया जा रहा था। लेकिन, भाजपा राष्ट्र गान के तौर पर, वंदे मातरम को ही गवाना चाहती और वह भी पूरा, क्योंकि यह समावेशी राष्ट्रवाद का निषेध करता है और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाता है। पर यह सब चोर दरवाजे से किया जाना है ; संविधान सभा के फैसले को महज एक नौकरशाहीपूर्ण आदेश के जरिए बदला जाना है, जैसे संविधान की धारा-370 को निरस्त करने में किया गया था। 2024 के चुनाव में जनता ने भले ही संघ-भाजपा के संविधान को बदलने के मंसूबों को विफल कर दिया हो, पिछले दरवाजे से और किस्तों में संविधान को बदलने की उनकी कोशिशें बराबर जारी हैं। राष्ट्रगान का आंशिक रूप से प्रतिस्थापित किया जाना, इसी का सबूत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

Share:

Comments

Leave a comment