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अनाथ बच्चों का मुद्दा कुछ हद तक चर्चा में आ रहा है, लेकिन क्या ये चर्चा कोई गति पकड़ पाएगी?

जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारों. और ये मैं नहीं कहता- सरकार के ही आंकड़ों में लिखा है यारों!

कोरोना ने कर दिया अनाथ, कौन बनेगा इनका माई-बाप!

कोरोना की इस महामारी (Corona Pandemic) की वजह से अब एक बार फिर भारत के अनाथ बच्चों (Orphaned Children in

India) का मुद्दा कुछ हद तक चर्चा में आ रहा है, लेकिन क्या ये चर्चा कोई गति पकड़ पाएगी?

मनोज सिंह

आपको याद है पिछले साल कोरोना (Corona Pandemic) के दौरान वायरल हुआ एक वीडियो, इस वीडियो में देखा गया था- रेलवे स्टेशन पर अपनी मां की लाश के आस-पास खेलता हुआ एक नन्हा सा बच्चा. कई बार वो अपनी निर्जीव मां को छूकर उसे उठाने की भी कोशिश करता है. हंसते खिलखिलाते और अपनी मां की लाश के संग खेलते इस बच्चे का यह हृदय विदारक वीडियो पूरी दुनिया में वायरल हुआ था. अब जरा कोरोना की दूसरी लहर में मरने वालों की उम्र देखिए. कोरोना की इस दूसरी लहर में 30 से 40 साल तक की उम्र वालों की मौत के आंकड़े पिछली बार से कहीं ज्यादा हैं, और ऐसी उम्र में मरने वालों में से ज्यादातर के एक या दो छोटे बच्चे भी हैं, और अब उनकी मौत के बाद इस दुनिया में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा.

इस महामारी ने न जाने कितने ही बच्चों को अनाथ कर दिया है. त्रासदी का ये चेहरा भी अब धीरे-धीरे सोशल मीडिया के जरिए सामने आने लगा है. बच्चों के लिए काम करने वाले प्राइवेट और सरकारी संस्थाओं के हेल्प लाइन नंबर पर लगातार SOS कॉल आ रहे हैं. केंद्रीय महिला और बाल कल्याल मंत्री स्मृति ईरानी (Smriti Irani) ने भी एक ट्वीट कर के राज्य सरकारों से अपील की है कि वे अनाथ हुए बच्चों की देखभाल जुविनाइल जस्टीस ऐक्ट के तहत करें. लेकिन क्या इतना काफी है, और अनाथ बच्चों की देखभाल के लिए सरकारों ने अब तक जो कुछ भी किया, वो काफी है?

कोरोना की इस दूसरी लहर के दौरान रोजाना दिल को झकझोर देने वाली खबरें आ रही हैं. सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के पास लगातार ऑर्फन और सेमी-ऑर्फन बच्चों की मदद के लिए लगातार कॉल्स आ रहे हैं. हालांकि, कोरोना की दूसरी लहर में अनाथ हो रहे बच्चों से संबंधित कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है. वैसे आंकड़े तो कोरोना की पहली लहर में अनाथ हुए बच्चों का भी नहीं है, लेकिन अनाथ बच्चों की देखभाल और योजनाओं से संबंधित जो आंकड़े मौजूद हैं, वे तो यही कहते हैं कि इन अनाथ बच्चों में से ज्यादातर भगवान भरोसे ही हैं.

अब अगर मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी गैर-सरकारी सेवा संस्थाओं की मानें तो भारत में 2 करोड़ से ज्यादा अनाथ बच्चे हैं. हालांकि, यूनिसेफ अनाथ बच्चों की तादाद ढाई करोड़ तो कुछ रिसर्स स्टडीज के मुताबिक अनाथ बच्चों की संख्या 4 करोड़ से भी ऊपर है. आंकड़ों में ऐसा उलटफेर इसलिए भी है कि भारत में अनाथ बच्चों की गिनती और कल्याण के लिए मजबूत सिस्टम नहीं है. महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के अलावा हजारों NGO और चैरिटेबल संस्थाएं अनाथ बच्चों की देखभाल में लगी हुई हैं, लेकिन इतने सारे अनाथ बच्चों में से करीब 0.5 फीसदी बच्चे ही किसी अनाथायल तक पहुंच पाते हैं, और वे भी 18 साल की उम्र के बाद राम भरोसे ही हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अनाथ आश्रम से निकाल दिया जाता है.

कोरोना की इस महामारी की वजह से अब एक बार फिर भारत के अनाथ बच्चों का मुद्दा कुछ हद तक चर्चा में आ रहा है, लेकिन क्या ये चर्चा कोई गति पकड़ पाएगी? क्या इस हल्की-फुल्की चर्चा से भारत देश में अनाथ बच्चों के भविष्य को लेकर कुछ गंभीर नीतियां बनाने पर विचार भी हो पाएगा? उम्मीद कम ही है और इस नाउम्मीदी की वजह भी यही सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़े हैं.

देश के हर पांच जिलों में से एक जिले में कोई अनाथ आश्रम नहीं है. अनाथ बच्चों के लिए देश में कोई अगल से कानून भी नहीं है. ये जुविनाइल जस्टिस कानून के तहत आते हैं, जो असल में बाल अपराध का कानून है. बाल कल्याण के बजट को देखें तो हर बच्चे पर 2 रुपये प्रतिदिन के आस पास ही खर्च किया जा रहा है, वहीं अनाथ बच्चों के गोद लेने की रफ्तार भी सुस्त है. भारत में सालाना औसतन करीब 6,000 अनाथ बच्चों का अडॉप्शन हो रहा है. इन आंकड़ों से तो यही लगता है कि अब तक सरकारों ने भी देश के अनाथ बच्चों को लावारिस ही छोड़ रखा है.

अस्सी के देशक की अमिताभ बच्चन की फिल्म लावारिस का एक गीत है- जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारों. और ये मैं नहीं कहता- सरकार के ही आंकड़ों में लिखा है यारों!

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