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BJP NEWS-नरेंद्र मोदी का दूसरा रिकॉर्ड राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करना

ख़तम होता लोकतंत्र

नरेंद्र मोदी का दूसरा रिकॉर्ड राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करना

मोदी के पहले किए गए कुछ कामों में, उनके 10 साल के शासनकाल में लोकसभा की सबसे कम बैठकें, न्यायिक हस्तक्षेप, सुप्रीम कोर्ट की आलोचना, राज्यपाल का हस्तक्षेप और 20,000 एनजीओ के एफसीआरए रद्द करना शामिल है।
PHOTO—-अगस्त में मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाला एक सेल्फी पॉइंट स्थापित किया गया। फोटो साभार: ट्विटर/@सेंट्रल_रेलवे
BY—पी रमन
आइए संसद के काम-काज़ के साथ लेख की शुरुआत करते हैं, जिसे नरेंद्र मोदी ‘लोकतंत्र की जननी’ के रूप में वर्णित करते हैं। भारत में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान, एक पुस्तिका प्रकाशित की गई थी और लोकतंत्र के गुणों पर एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई थी।narender-modi-ka-dusara
मई 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार संसद भवन में प्रवेश करते समय मोदी के संसद के दरवाजे पर घुटने टेकने के दृश्य अभी भी ताजा हैं। जब घुटने टेके तो वे रोने लगे थे।
फिर, उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान, संसद को एक नई शानदार इमारत में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री ने पिछले साल सितंबर में बड़ी धूमधाम और बड़े शो के साथ किया था न की राष्ट्रपति ने, जो दोनों सदनों के साथ मिलकर संसद का गठन करते हैं।democracy is ending
इस तरह के सभी गीत और नाटक उस एक कड़वी सच्चाई को छुपाने के लिए थे: जिसमें मोदी निज़ाम ने एक जीवंत लोकतंत्र की ताक़त के केंद्र के रूप में संसद का अवमूल्यन करने के लगातार प्रयास किए थे।
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के 10 वर्षों के शासन के दौरान मनमोहन सिंह के 85 सवालों की तुलना में प्रधानमंत्री कार्यालय ने 2022 तक संसद में सिर्फ 13 सवालों के जवाब दिए।
आइए देखें कि मोदी के एक दशक के निज़ाम के दौरान, संसद ने विचार-विमर्श वाले लोकतंत्र के मंच के रूप में अपनी भूमिका कैसे खो दी।
    • पीआरएस रिसर्च के अनुसार, 17वीं लोकसभा 1952 के बाद से सबसे छोटी लोकसभा रही थी। कार्यकाल पूरा करने वाली लोकसभाओं में से, 16वां सदन (मोदी के तहत) में केवल 331 बैठकें हुईं, जो सबसे कम संख्या है।
• मोदी की 17वीं लोकसभा में समिति की जांच के दायरे में सबसे कम विधेयक आए  थे – 210 विधेयकों में से 37 या 17.6 फीसदी थे। 16वीं लोकसभा के दौरान यह 25 फीसदी थे। संसद के पिछले शीतकालीन सत्र के दौरान कोई भी विधेयक समितियों को नहीं भेजा गया था। पिछले मनमोहन सिंह के दशक के आंकड़े क्रमशः 60 फीसदी और 70 फीसदी थे। यह तीव्र गिरावट जांच के प्रति वर्तमान शासन की उपेक्षा को दर्शाती है।
• इसी तरह, 17वीं लोकसभा के दौरान अल्पकालिक चर्चाओं की संख्या में भी बड़ी गिरावट आई है। ऐसी चर्चाओं से सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने का मौका मिलता है।
• 17वीं लोकसभा पूरे कार्यकाल के दौरान बिना उपाध्यक्ष के चलाई गई।
• पहली बार, मोदी के नेतृत्व में संसद ने रिकॉर्ड संख्या में मनमाने ढंग से निलंबन देखा – जो शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा का लगभग 20 फीसदी हिस्सा था।
• खुद पीएम 2021 के दौरान सिर्फ चार घंटे ही लोकसभा में मौजूद रहे।
मोदी के विपरीत, अटल बिहारी वाजपेयी सहित उनके सभी पूर्ववर्ती सभी महत्वपूर्ण दिनों के दौरान उपस्थित रहे, अक्सर नोट्स लिए और बहस में हिस्सा लिया।
आज़ाद भारत में कभी भी एक मुख्यमंत्री सहित इतने सारे विपक्षी राज्य मंत्री, राजनीतिक कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता और मीडियाकर्मी विचाराधीन कैदियों के रूप में जेल के दौरान देश आम चुनाव में नहीं गया था। कई लोग आठ साल से अधिक समय तक जेल में रहे। सबसे वृद्ध फादर स्टेन स्वामी की जेल में मृत्यु हो गई, जबकि यह सुप्रीम कोर्ट था जिसने बीमार वरवर राव को (भीमा कोरेगांव मामले में) रिहा कर दिया था। इसी मामले में एक्टिविस्ट गौतम नवलखा की सजा को कम कर नजरबंद में तब्दील कर दिया गया।
उदाहरण के लिए, पूर्व जेएनयू स्कॉलर उमर खालिद को सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका का 14 बार स्थगन किया गया, और उन्हें शीर्ष अदालत से अपनी जमानत याचिका वापस लेने और ट्रायल कोर्ट में वापस जाने पर मजबूर होना पड़ा।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जेल में हैं। प्रवर्तन निदेशालय के निशाने पर एक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल थे, जिन्हें भी जेल में डाल दिया गया है। मोदी शासन ने ईडी/सीबीआई द्वारा दायर आरोपों पर विभिन्न राज्यों में कई वरिष्ठ विपक्षी राज्य मंत्रियों को जेल में डाल दिया है।
एक सच्चे निर्वाचित सत्तावादी की तरह, मौजूदा प्रधानमंत्री ने प्रशासन के सभी तंत्रों का नियंत्रण अपने हाथ में लेते हुए, शासन के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को कदम-दर-कदम बदल दिया है।
आइए देखें कि उनके 10 साल के शासन के दौरान क्या हुआ:
    • भारत में किसी भी प्रधानमंत्री ने खुद इतनी अधिक आधारशिलाएं नहीं रखीं और इतनी अधिक परियोजनाओं का उद्घाटन नहीं किया जितना मोदी ने किया: 82 वंदे भारत ट्रेनों में से प्रत्येक का उदघाटन किया, कई का उपस्थित होकर और कुछ का वर्चुअली किया, इसमें नमो भारत ट्रेनें, राज्यों में प्रत्येक केंद्रीय परियोजना, जिसमें रक्षा क्षेत्र की परियोजनाएं भी शामिल है, साधारण परियोजनाएं भी लॉन्च की गई। उन्होंने खुद भारत के अंतरिक्ष यात्रियों के नामों की घोषणा की और सुर्खियां बटोरीं।
• अतीत में किसी भी सरकार ने इतनी बेशर्मी से न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं किया। सत्ता में आने के बमुश्किल तीन महीने बाद, मोदी ने अगस्त, 2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति और स्थानांतरण विधेयक पारित करके न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की शक्ति को छीनने की कोशिश की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया और कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया।
• मोदी निज़ाम ने कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को अधिसूचित करने के लिए ‘पिक एंड चूज़’ दृष्टिकोण का सहारा लेकर कॉलेजियम प्रणाली को धता बनाने की कोशिश की। कई बार, कॉलेजियम द्वारा सिफ़ारिश किए गए लगभग 50 नाम सरकार के पास लंबित पड़े रहे थे। सुप्रीम कोर्ट को इस पर सख्त रुख अपनाना पड़ा।
सरकार ने कथित तौर पर फैसले को अपने पक्ष में करने के लिए रोस्टर प्रणाली में हेरफेर करने की भी कोशिश की।
    • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में इतनी अधिक जनहित याचिकाएं कभी नहीं देखीं गई – जो मोदी सरकार की ज्यादतियों या निष्क्रियता का स्पष्ट लक्षण है। पीड़ित नागरिकों के पास न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। हर दूसरे दिन, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करते हैं, कभी-कभी अनुकूल रूप से, और कभी सरकार को उचित ठहराते हुए ऐसा करते हैं।
• मोदी के एक और पहले प्रयास में, सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण का उनका प्रयास शामिल था। पिछले साल संयुक्त कमांडर का सम्मेलन सैन्य स्टेशन में नहीं बल्कि कुशाभाऊ ठाकरे केंद्र में आयोजित किया गया था, जिसकी पृष्ठभूमि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आदर्श सरदार वल्लभभाई पटेल थे। कार्यक्रम स्थल के गेट के बगल में मोदी की एक बड़ी तस्वीर लगाई गई थी, जिसमें उनके साथ राजनाथ सिंह (रक्षा मंत्री) और मध्य प्रदेश के तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान थे।
• पिछले साल, सैन्य संस्थाओं में विभिन्न बिंदुओं पर 822 मोदी सेल्फी पॉइंट (Modi Selfie Point)लगाए गए थे। यह रक्षा मंत्रालय के आदेश पर हुआ था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
• हम पहले ही मोदी कॉलेजों, स्कूलों, नमो कमल, नमो ट्रेनों, मंदिरों, मोदी चालीसा की स्थापना और उनके नाम पर कल्याणकारी योजनाओं का नामकरण करके व्यवस्थित पंथ निर्माण की कोशिशों को देख चुके हैं। मोदी के आलोचक से चीयरलीडर बने, एक नेता ने भारत के हर जिले में मोदी अध्ययन केंद्र स्थापित करने पर भी विचार किया है। अब महाराष्ट्र में कोई ‘मोदी स्क्रिप्ट’ पर काम कर रहा है।
• यदि मुठभेड़ में हत्या एक पुरानी प्रथा है, तो बुलडोजर से न्याय, मदरसों को बड़े पैमाने पर बंद करना और मुस्लिम संस्थाओं पर हमले अल्पसंख्यकों को लक्षित करने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए नवाचार हैं। मध्य प्रदेश जैसे अन्य भाजपा शासित राज्य भी इन तरीकों को जोर-शोर से अपना रहे हैं। इस “एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल दंड” में नवीनतम प्रवेश प्रदर्शनकारी किसानों के समर्थकों के पासपोर्ट और वीजा रद्द करना है।
• मोदी का दूसरा रिकॉर्ड राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न से जुड़ा है(Narendra Modi’s record of harassing political rivals and minorities)। लोकसभा को बताया गया कि 8,947 लोगों को गिरफ्तार किया गया, आतंकवाद विरोधी यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत राजद्रोह के 701 मामले दर्ज किए गए और 2018 और 2022 के बीच यूएपीए के तहत 5,024 मामले दर्ज किए गए। इसमें ईडी, एनआईए, सीबीआई, कर विभाग और अब नारकोटिक्स बोर्डद्वारा की गई गिरफ्तारियां शामिल नहीं हैं।
• मोदी ने केंद्र और भाजपा राज्य सरकारों के खर्च पर व्यक्तिगत प्रचार में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। आम समय में भी, प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया में पूरे पेज या आधे पेज के विज्ञापन देना नियमित बात है। चुनाव बहुत करीब होने के कारण, मार्च के दूसरे सप्ताह में मोदी की तस्वीरों वाले विज्ञापनों में अचानक तेजी देखी गई (10 मार्च को टाइम्स ऑफ इंडिया में सात पेज और इंडियन एक्सप्रेस में छह पेज ऐसे थे)। 12 मार्च को, इंडियन एक्स्प्रेस में छह पूर्ण पृष्ठ और टाइम्स ऑफ इंडिया में सात पृष्ठ थे)। होर्डिंग जैसे बड़े आउटडोर डिस्प्ले लगाने की भी बड़ी योजना है।
• अब हमें बताया गया है कि कम से कम 10 बॉलीवुड फिल्में, जिनमें हाल ही में रिलीज हुई धारा 370 भी शामिल है, जो मोदी की छवि को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हैं, पूरे देश के सिनेमाघरों में आने वाली हैं – वह भी ठीक चुनाव के समय होने वाला है।
ऐसे और बड़े बजट वाले प्रचार का इंतज़ार करें।
    • अतीत में कभी भी केंद्र ने विपक्षी राज्य सरकारों पर राज्यपालों को इतनी खुलेआम छूट नहीं दी थी। उन्होंने विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को रोककर राज्यों को परेशान किया है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी है। केरल और तमिलनाडु में ऐसा हो चुका है। उन्होंने कुलपतियों को बर्खास्त कर दिया है, जिसके कारण पश्चिम बंगाल सहित हर विपक्षी राज्य में विरोध प्रदर्शन हुआ है। केरल के गवर्नर राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान भी इसी रास्ते पर उतर आए हैं।
• मोदी सरकार के लिए एक और बात कि वो हर एनजीओ और थिंक-टैंक जो उनकी सरकार के कामों की आलोचना करने की हिम्मत करते हैं, उसे सख्ती का सामना करना पड़ा है। इसमें प्रतिष्ठित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च भी शामिल है। कुछ को बंद करना पड़ा। रिकॉर्ड संख्या में 20,000 एनजीओ और थिंक-टैंकों के एफसीआरए (विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम) लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं।Narendra Modi’s record
• भारत में पहली बार, मोदी निज़ाम के कर-अधिकारियों ने मनमाने ढंग से मुख्य विपक्षी पार्टी के बैंक खाते से 64 करोड़ रुपये जब्त किए हैं। मतदान के पहले यह हमला हिसाब-किताब जमा करने में देरी के आधार पर किया गया था। जैसा कि अपेक्षित था, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इससे सवाल उठता है: बीजेपी और उसके सहयोगियों को इसी तरह की कार्रवाई से क्यों बचाया गया?Persecuting political rivals and minorities
इसके बाद ईडी ने तृणमूल कांग्रेस से जुड़े 10.29 करोड़ के ड्राफ्ट में एक व्यापारिक समूह को शामिल किया है और उसे ज़ब्त कर लिया है। अगला निशाना राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद था। ईडी ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में लालू यादव के ‘सहयोगी’ सुभाष यादव को गिरफ्तार किया और 2.37 करोड़ रुपये की ‘अस्पष्टीकृत’ नकदी जब्त की। चुनाव आयोग ने, असामान्य रूप से, इस तरह की चुनाव पूर्व जब्ती के लिए ईडी को नियुक्त किया है।
मौजूदा प्रधानमंत्री में सार्वजनिक जांच के प्रति स्वाभाविक घृणा है। अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत, उन्होंने कभी भी कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस या यहां तक कि वार्षिक कॉन्फ्रेंस आयोजित नहीं किया है जहां मीडियाकर्मी पीएम से पूछताछ करते थे। इसके बजाय, हाथ-पैर मारने वाले मीडिया मालिक एक पसंदीदा विकल्प बन गए हैं।
    • दो साल पहले, मोदी ने एक 12 करोड़ रुपये की मर्सिडीज बेंज मेबैक S650 का विकल्प चुनकर एक रिकॉर्ड तोड़ दिया था। दूसरे भाजपा प्रधानमंत्री वाजपेयी ही थे, जिन्होंने हिंदुस्तान मोटर्स की एम्बेसडर से बख्तरबंद बीएमडब्ल्यू 7 श्रृंखला पर स्विच किया था। लेकिन अगले प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने वाले मनमोहन सिंह ने साधारण कारों को प्राथमिकता दी और पर्यटन और राजनयिक पूलों के लिए उच्च-स्तरीय वाहनों को आवंटित किया था।
• मोदी निज़ाम नया निशाना उन्हें ‘फासीवादी’ बताने के लिए गूगल का जेमिनी चैटबॉट है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मंच है। एक कॉलर ने मशीन से पूछा कि क्या मोदी फासीवादी हैं तो उसने घुमा-फिरा कर ‘हां’ कहा। फिर सब गड़बड़ हो गई और भारत सरकार की पूरी मशीनरी ने इसके मालिकों को निशाना बनाया, जिन्होंने तुरंत जेमिनी को बाजार से हटा लिया।
सूची बहुत लंबी है: सीएजी या नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसे वैधानिक निगरानीकर्ताओं को चुप कराना, उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के नवीनतम आंकड़ों में हेराफेरी करना, समवर्ती सूची में शामिल पीएम योजनाओं को राज्यों पर थोपना, विपक्षी राज्यों को धन से वंचित करना इत्यादि इसमें शामिल है।
लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।
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