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KISAN NEWS-राम राज्य का दावा और किसानों के खिलाफ कठोर कदम

राम राज्य का दावा और किसानों के खिलाफ कठोर कदम

किसानों के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करना

 

कॉरपोरेट्स को टैक्स में भारी छूट देने के लिए पैसा है लेकिन एमएसपी फंड के लिए नहीं?
राम राज्य का दावा और किसानों के खिलाफ कठोर कदम
किसानों के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करना
कॉरपोरेट्स को टैक्स में भारी छूट देने के लिए पैसा है लेकिन एमएसपी फंड के लिए नहीं?
BY—एस एन साहू  |
Translated by महेश कुमार
किसानों की मांगों के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार की कठोर उदासीनता कॉरपोरेट्स को दिए बड़ी टैक्स रियायतों के बिल्कुल उलट है।
Farmers
प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन अक्सर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उद्धृत करते हुए कहते थे कि “बाकी सब कुछ इंतजार कर सकता है, लेकिन कृषि नहीं।” यह काफी दुखद है कि नरेंद्र मोदी शासन, जिसने स्वामीनाथन को उनके दुखद निधन के कुछ महीने बाद सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से नवाज़ा, किसानों की मांगों को पूरा करने की उनकी प्रतिबद्धता से मुकर गया है, जिसमें अन्य बातों के अलावा, किसानों के लिए एक स्वामीनाथन फार्मूले के अनुसार एमएसपी गारंटी का एक कानून भी बनाना शामिल था।
प्रदर्शनकारी किसानों का अन्य मांगों के अलावा 2020-21 के दौरान उनके साल भर चले आंदोलन के दौरान उन पर लगाए गए मुक़दमों को वापस लेने, कर्ज़ माफी, पेंशन और विश्व व्यापार संगठन से भारत की वापसी की मांग शामिल है, जो किसानों को सब्सिडी देने से रोकने के लिए सरकार पर दबाव बना रहा है।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, मोदी ने एमएसपी (MSP)का समर्थन किया था
प्रधानमंत्री मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, एमएसपी(MSP) गारंटी कानून की वकालत करते थे और साथ ही स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग की रिपोर्ट को लागू करने बारे में भी बात करते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इन दोनों मुद्दों पर अपना रुख पलट दिया है। परिणामस्वरूप, कृषि क्षेत्र अब अस्तित्व के संकट से बाहर आने के लिए इंतजार कर रहा है, भले ही खाद्यान्न उत्पादन साल-दर-साल बढ़ रहा है और बफर स्टॉक को लगातार अनाज की पर्याप्त आपूर्ति मिल रही है।
2022 तक किसानों की आय दोगुनी होने का रहा दावा
मोदी सरकार ने 2019 (लोकसभा चुनाव अभियान) में पुरजोर तरीके से घोषणा की थी कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। यह दावा, मोदी को दूसरा कार्यकाल जीतने में एक महत्वपूर्ण कारक बना था। अब, एमएसपी की मांग को लेकर किसानों के कठिन संघर्ष के सामने मोदी और भाजपा इस बारे में गहरी चुप्पी साधे हुए हैं।
यह काफी दर्दनाक है कि हरियाणा में भाजपा सरकार ने किसानों को हरियाणा की सीमा पार करके दिल्ली पहुंचने से रोकने, उनकी शिकायतों का समाधान न करने और मोदी सरकार के खिलाफ विरोध करने के लिए असामान्य रूप से कठोर और क्रूर उपाय किए हैं।
राम राज्य का दावा और किसानों के खिलाफ कठोर कदम
भाजपा और मोदी सरकार ने कहा था कि 22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक के बाद राम-राज्य की शुरुआत हो जाएगी। राम-राज्य के तहत कल्पित व्यवस्था में, निष्पक्ष खेल और न्याय का पालन होता है जनता की राय को ध्यान में रखते हुए शासन किया जाता है। लेकिन, विरोधाभासी रूप से, राम राज्य पर केंद्रित ऐसे बड़े-बड़े दावों के साथ, हरियाणा में भाजपा शासन किसानों को देश के किसी भी हिस्से में जाने और विरोध करने के संवैधानिक रूप से गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को कुचल रही है।
पंजाब-हरियाणा सीमा पर रोके गए किसानों को हरियाणा के भाजपा शासन द्वारा ड्रोन से दागे गए आंसू गैस के गोले, पेलेट गन और अन्य जबरदस्त उपायों का उपयोग करके दिल्ली तक मार्च करने से रोका जा रहा है, जिसका उद्देश्य उनकी गतिशीलता को रोकना और उन्हें मजबूर बनाना है।
इस तरह के असंगत दंडात्मक उपायों ने दिल्ली में शांतिपूर्ण मार्च में शामिल सैकड़ों किसानों को घायल कर दिया है। कई किसानों की आंखों में चोटें आई हैं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उनमें से कई की रोशनी चली गई है। उनके खिलाफ आंसू गैस के गोले छोड़ने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया है।
मीडिया में खबर है कि 21 साल के युवा किसान शुभकरण सिंह की गोली लगने से मौत हो गई है। इससे हरियाणा सरकार के खिलाफ व्यापक गुस्सा पैदा हो गया है, आंदोलनकारी किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन को आगे बढ़ाने के अपने संकल्प को दोगुना कर दिया है।
किसानों के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करना
किसानों के साथ किया गया क्रूर व्यवहार उन्हें देश के दुश्मन और आक्रमणकारी मानने के समान है। स्वामीनाथन की बेटी मधुरा स्वामीनाथन ने कहा कि आंदोलनकारी किसान “अन्नदाता” हैं और उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने हरियाणा में उनके लिए जेलें तैयार करने के लिए उठाए गए कदमों की निंदा की और इस बात पर हैरानी जताई कि उनके ‘दिल्ली चलो’ मार्च को रोकने के लिए बैरिकेड्स और अन्य कड़े कदम उठाए गए हैं। इसके बाद उन्होंने आगे कहा कि “अगर हमें एम.एस. स्वामीनाथन को सम्मान देना जारी रखना है तो भविष्य के लिए हम जो भी रणनीति बना रहे हैं उसमें हमें किसानों को अपने साथ लेना होगा।
मधुरा के कथन, उन बढ़ती चुनौतियों का सामना करने में विवेक की आवाज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका किसान न्याय और निष्पक्ष खेल पाने के अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते समय सामना कर रहे हैं।
गोदी मीडिया का झूठा नेरेटिव
कॉरपोरेट-नियंत्रित मीडिया, जिसे ‘गोदी मीडिया’ के नाम से जाना जाता है, लगातार सरकार के लिए प्रचार में लगा हुआ है। इसने एक झूठी कहानी गढ़ी है कि आंदोलन स्थल पर किसानों के ट्रैक्टर और कुछ नहीं बल्कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के खिलाफ हिंसा पैदा करने के लिए तैनात किए गए अस्थायी सैन्य टैंक हैं। ऐसी रिपोर्टों का उद्देश्य किसानों और उनके संघर्ष को बदनाम करना है।
किसानों के प्रति उदासीनता, कॉरपोरेट्स को फायदा
मोदी सरकार के तहत, जबकि कृषि क्षेत्र न्याय के लिए इंतजार कर रहा है, कॉरपोरेट कर दरों में कमी का आनंद ले रहे हैं जिन्हें उन्हें भुगतान करना अनिवार्य था। यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि सितंबर 2019 से प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने उन कंपनियों के लिए आधार कॉर्पोरेट कर की दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया है जो उस समय अपने कार्यों और गतिविधियों को अंजाम दे रही थीं। नई स्थापित कंपनियों के लिए टैक्स की दर 25 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दी गई है।
टैक्स की दरों को कम करने के ये सभी उपाय “निवेश आकर्षित करने” के लिए उठाए गए थे। वित्त मंत्रालय के अनुसार, कॉरपोरेट्स द्वारा उन्हें मिले टैक्स लाभ के बाद कोई अतिरिक्त निवेश नहीं किया गया और इससे सरकारी खजाने को 1,45,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह अनुमान लगाया गया है कि टैक्स कटौती से कॉरपोरेट्स को 6 लाख करोड़ रुपये का भारी लाभ हुआ, जिसके लिए उन्हें कोई आंदोलन नहीं लड़ना पड़ा।
लाखों भारतीयों को खाद्य सुरक्षा और आजीविका प्रदान करने वाला कृषि क्षेत्र लंबे समय से संकट में है। किसानों को अब लाभदायक नहीं माना जाता है। इसलिए, इसके लिए सरकार से अनुकूल उपायों को अपनाने की जरूरत है। यदि कॉरपोरेट बड़े पैमाने पर टैक्स कटौती का इंतजार नहीं कर सकते, तो कृषि को इंतजार क्यों करना चाहिए और किसानों को नुकसान क्यों उठाना चाहिए? फिर नेहरू के वे शब्द याद आते हैं, “बाकी सब कुछ इंतजार कर सकता है, लेकिन कृषि नहीं” इसे हम खुद को जोखिम में डालने के लिए ही नजरअंदाज कर सकते हैं।

एस एन साहू ने भारत के राष्ट्रपति के आर नारायणन के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटि के रूप काम किया है। व्यक्त विचार निजी हैं।

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