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अंग्रेजों के जमाने में हम कलायत थाने  के मालिक हुआ करते थे

अंग्रेजों के जमाने में हम कलायत थाने  के मालिक हुआ करते थे ,
गुलाम भारत के पुलिस थाना के साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। काफी समय से नरवाना में रह रहे राजकुमार कंसल इन दिनों अपनी पुरानी हवेली की रिपेयर करवाने में लगे हैं। कंसल की बुजुर्ग पत्नी कलायत नगर पालिका की पहली महिला पार्षद मूर्ति देवी भी उनका हाथ बंटा रही हैं।
कलायत(अटल हिन्द /तरसेम सिंह )
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============कलायत की वह पुरानी इमारत जिसमें अंग्रेजों का थाना चलता था========================
हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं। 15 अगस्त 1975 में रिलीज हुई सुपर हिट हिंदी फिल्म शोले का यह डायलॉग तो हर किसी ने सुना होगा। शायद कभी किसी ने अंग्रेजों के जमाने का थाना मालिक सुना और देखा नहीं होगा। ऐसा है तो आइए कलायत में गुलाम भारत में जन्मे अंग्रेजों के जमाने के थाना मालिक वयोवृद्ध राजकुमार कंसल से आपको रूबरू करवाते हैं। वे वर्ष 1991 में कलायत नगर पालिका के निर्वाचित पार्षद भी रहे हैं।
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राजकुमार कंसल का कहना है कि जब भारत गुलाम था उस समय कलायत के पुराने बाजार में स्थित उनकी हवेली के परिसर में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा थाना स्थापित किया गया था। उस दौर में अकसर बड़े अंग्रेज अधिकारियों का आना जाना यहां रहता था। उस समय लोगों में पुलिस के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा खौफ था। इसलिए लोग संबंधित गली से बचकर निकलते थे।
======================पत्नी मूर्ति देवी के साथ राजकुमार कंसल=================================
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गुलाम भारत के पुलिस थाना के साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। काफी समय से नरवाना में रह रहे राजकुमार कंसल इन दिनों अपनी पुरानी हवेली की रिपेयर करवाने में लगे हैं। कंसल की बुजुर्ग पत्नी कलायत नगर पालिका की पहली महिला पार्षद मूर्ति देवी भी उनका हाथ बंटा रही हैं।
राजकुमार कंसल बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को भारत देश के आजाद होने की खबर उन्होंने रेडियो के माध्यम से सुनी। उस समय जनसंचार के बेहद कम साधन थे। आजादी के जश्न की खुशी में हर कोई झूम उठा था हर तरफ वीरों और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा दिए गए बलिदान के चर्चे थे।
भारत का स्वशासन स्थापित होने के बाद उन्होंने विदेशी हुक्मरानों को वापिस अपने देश लौटते हुए देखा। भारत की आजादी के बाद व्यवस्था में हुए बदलाव के चलते पुलिस स्टेशन भट्ट दरवाजे के पास शुरू हुआ। वर्तमान में पुलिस स्टेशन रेलवे रोड पर चल रहा है। कलायत में आजादी का पहला पर्व रेलवे रोड पर स्थित सरकारी स्कूल में मनाया गया। इसमें हर किसी ने जोश और उत्साह के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।
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जागरण मंडल ने जगाई समाज सेवा की लौ
राजकुमार कंसल ने बताया कि पुराने दौर में भी जन सेवा का जज्बा लोगों में था। श्री कपिल मुनि तट पर स्थित शमशान भूमि में चारदीवारी, मुख्य द्वार व अन्य संसाधन उपलब्ध नहीं थे। 1980 के दशक में मां कात्यानी जागरण मंडल ने धार्मिक कार्यक्रमों से हुई आय के संसाधनों से शमशान भूमि का व्यापक कायाकल्प करवाया। कंसल उस समय जागरण मंडल के प्रधान होते थे। 7 जून 1984 में सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए थे। हादसे में वे अपने पांवों पर चलने फिरने के लायक नहीं रहे। वे बैसाखी के सहारे वे चलते हैं। उनकी स्मृतियों में गुलाम और आजाद भारत की अनगिनत खट्टी-मीठी यादें हैं।
नाते में कंसल के फूफा थे पेप्सू के मुख्यमंत्री बाबू वृष भान
बुजुर्ग राजकुमार कंसल ने बताया कि कलायत विधानसभा से 1950 के दशक में विधायक चुने गए बाबू वृष भान नाते में उनके फूफा थे। वे पेप्सु राज्य के मुख्यमंत्री बने। अकसर वे कंसल परिवार की पुरानी हवेली व इलाके के विभिन्न स्थानों पर जनता दरबार लगाकर समस्याएं सुनते थे। उन्होंने कलायत विकास के लिए प्रभावी कदम उठाए। उपरांत उन्होंने खनौरी विधानसभा को अपनी राजनीतिक रणभूमि चुना।
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