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66 रूपए खर्च कर नेताओं को यह समझाओ की सविधान किसी सरकार को  नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ लापरवाही करने की अनुमति नहीं देता 

66 रूपए खर्च कर नेताओं को यह समझाओ की सविधान किसी सरकार को  नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ लापरवाही करने की अनुमति नहीं देता
स्वास्थ्य के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्षी दल दोनों कटघरे में !
स्वास्थ्य को राज्य स्तरीय मुहीम बनाने का प्रयास
चंडीगढ़ 8 जून 2021 (अटल हिन्द/राजकुमार अग्रवाल )सबका मंगल हो’ के ‘सेंटर फॉर राईट टू हेल्थ’ हरियाणा के अलग अलग जिलों के निवासियों का समूह है स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज, विपक्षी दल का नेता भूपिंदर सिंह हुडा और स्वास्थ्य सचिव  को  पत्र लिखते हुए हरियाणा भर के सभी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओ से सम्बंधित स्टाफ को पूरा करने और अन्य सुविधाएँ देने की गुहार लगाई है! पत्र में कहा गया है कि मौजूदा हालातों में लोग कोरोना महामारी के अलावा रोज़मर्रा की अन्य बीमारियों से झूझ रहे हैं ! हमारा संविधान भारतीय नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ लापरवाही करने की अनुमति किसी सरकार को नहीं देता। संविधान का अनुच्छेद-21 सीधे-सीधे भारतीय नागरिकों के जीवन का दायित्व सरकार पर डालता है।  इसमें हर व्यक्ति की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करना सरकार का काम माना गया है। यदि आम आदमी को वक्त पर इलाज नहीं मिलता, तो यह उसके जीने के अधिकार पर अतिक्रमण  है ।
‘सबका मंगल हो’ के चेयरमैन और पंजाब & हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट प्रदीप रापडिया ने एक विडियो रिलीज़ में लोगों से स्वास्थ्य के नाम पर लैटर पोस्ट करने के लिए रजिस्टर्ड पोस्ट पर 66 रूपए खर्च करने की प्रार्थना करते हुए कहा है कि हर जिले से लोग सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं की माँग करते हुए सरकार को तीन चिठियाँ स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज, विपक्षी दल का नेता भूपिंदर सिंह हुडा और स्वास्थ्य सचिव  को  भेजनी चाहिएं । और अगर सरकार कोई कार्यवाही नहीं करती तो उनका ग्रुप लोगों को हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करेगा ।
जिस तरह निजी क्षेत्र ने चिकित्सा में पांव पसारे हैं, उससे सेवा का यह क्षेत्र एक बड़ी मंडी बनकर रह गया है। न्यायपालिका ने समय समय पर जिम्मेदारी निभाते हुए राज्यों और केंद्र को सांविधानिक बोध कराया है। लेकिन उसका परिणाम कुछ खास नहीं निकला। कोरोना काल में भी अनेक राज्यों के उच्च न्यायालय इस बात को पुरजोर समर्थन देते रहे हैं कि चुनी हुई सरकारें अपने नागरिकों के इस मौलिक अधिकार से बच नहीं सकतीं। मेडिकल इमरजेंसी के नाम पर अवाम के मौलिक अधिकारों को कुचलने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
लोगों को लैटर का प्रारूप देते हुए लिखा गया है की हरियाणा के हर  जिले के सिविल अस्पताल, कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर व प्राइमरी हेल्थ सेंटर आदि में लोग सेहत सुविधाओं से कोसों दूर हैं। अस्पताल में न डॉक्टर हैं और न ही अन्य पूरा स्टाफ। हाल यह है कि स्थानीय लोगों को इलाज करवाने के लिए दूर-दराज के प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। सेंटर में डॉक्टरों और स्टाफ नर्सों की कमी के कारण मरीजों को पूरी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। कोरोना संक्रमण बढ़ने के साथ ही अस्पतालों में तकनीकी रूप से दक्ष कर्मचारियों का घोर संकट पैदा हो गया है । अमीर लोग तो फिर भी प्राइवेट अस्पतालों में इलाज़ करवा लेते हैं, लेकिन मौजूदा हालातों में आप गरीब आदमी की हालात का अंदाज़ा लगाएं! दरअसल स्वास्थ्य सुविधाएँ अमीरों और गरीबों के लिए समान होनी चाहिए और ये तभी संभव है जब सभी स्वास्थ्य सुविधाएं सरकार के नियंत्रण में हों!
सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हर चुनाव में बड़ा मुद्दा बनते हैं। सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, लेकिन हालात नहीं बदले। हर सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के आश्वासन देकर आती है, लेकिन जिस अनुपात में मरीजों की संख्या बढ़ रही डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने की बजाय कम होती हा रही है। जिले के सभी सरकारी अस्पताल डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियन व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की कमी से जूझ रहे हैं। मुख्य अस्पताल सहित ज्यादातर स्वास्थ्य केंद्रों पर वेंटीलेटर, सी.टी. स्कैन ,अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे जैसी सुविधाएं नहीं है। बहुत सारे मामलों में कोर्ट की फटकार के बाद भी लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। बीमारी के इलाज पर लोगों की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है।
कोरोना की रफ्तार कुछ धीमी होने के बाद भी पिछले एक साल से अन्य बीमारियों से ग्रस्त मरीज अभी भी इलाज की बाट जोह रहे हैं। गंभीर बीमारियों से पीड़ित ये मरीज आपरेशन, सर्जरी अथवा अन्य प्रकार के रोगों से निदान के लिए अस्पतालों के चक्कर लगा-लगाकर थक गये हैं। उन्हें हर बार नई तारीख दे दी जाती है। जब वे अस्पताल पहुंचते हैं तो डाक्टर या स्टाफ द्वारा उन्हें यह कहा जाता है कि अभी कोरोना खत्म नहीं हुआ है इसलिए उन्हें इंतजार करना होगा। पिछले साल भी कोरोना महामारी के चलते ही लोगों का सरकारी अस्पताल में अन्य बीमारियों का इलाज नहीं हो पाया।
अनगिनित फैंसलों में न्यायपालिका ने साफ-साफ कहा  है कि किसी की हालत गंभीर हो और उसे समय से इलाज न मिले, तो यह फांसी पर लटकाने से भी ज्यादा क्रूर है। यही नहीं, राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में भी अनुच्छेद 47 के हवाले से कहा गया है कि लोगों के स्वास्थ्य सुधार को राज्य प्राथमिक कर्तव्य मानेगा। पर हम देखते हैं कि शनैः शनैः राज्य ग्रामीण और अंदरूनी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बनाने से मुंह मोड़ते जा रहे हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर चुनिंदा शहरों में एम्स या मेडिकल कॉलेज खोलकर दायित्व निभाया जा रहा है।
पत्र में विपक्षी दल के नेता भूपेंदर सिंह हुडा का ध्यान आकर्षित करवाते हुए लिखा है कि लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलवाने के लिए लोकतंत्र में सत्ता से बाहर दलों की भी सत्तासीन राजनितिक दल के बराबर की ही भूमिका होती है  और विपक्षी दल से सवाल पुचा है कि आज तक सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आपकी पार्टी व आपके कार्यकर्ताओं ने कितने प्रदर्शन किए हैं? स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की चेतावनी देते हुए कहा गया है लोगों को हर बात पर कोर्ट जाने के लिए मजबूर ना करें।

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