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गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान मौतें धर्म को सड़क पर लाने और हुड़दंगी भीड़ों का परिणाम

गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान मौतें धर्म को सड़क पर लाने और हुड़दंगी भीड़ों का परिणाम
कई सवाल जिन्हें जवाब की दरकार है
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Foto credit by google
BY कृष्ण प्रताप सिंह
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गत शुक्रवार को देश के उन राज्यों में, जहां दस दिनों के गणेशोत्सव का कुछ ज्यादा ही जोर था, भीड़-भाड़ भरे जुलूसों के साथ गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान अघटनीय घटनाओं की बाढ़-सी आ गई. जब यह पंक्तियां लिख रहे थे, उत्तर प्रदेश व हरियाणा से लेकर तेलंगाना व महाराष्ट्र तक इन घटनाओं में तीन दर्जन जानें चली जाने की खबर आ चुकी थी. घायलों की संख्या इनके अतिरिक्त है.
अफसोस की इससे भी बड़ी बात यह है कि इन जानों के जाने को अचानक हो गए ऐसे हादसों का परिणाम भी नहीं कहा जा सकता, जिनमें शिकार होने वालों को बचाने के लिए ऐन वक्त पर कुछ करते न बना हो. क्योंकि यह मानने के एक नहीं, अनेक कारण हैं कि इन जुलूसों में भागीदारी करने वालों को परिस्थिति को लेकर आगाह करने के साथ बचाव के पर्याप्त उपाय करके इन मौतों को रोका जा सकता था.

ऐसे उपाय इस कारण भी बहुत जरूरी थे कि इनमें गंवाई गई ज्यादातर जान युवाओं व बच्चों की थीं, जिन्हें देश का वर्तमान और भविष्य कहा जाता है. मौत जब भी किसी युवक का शिकार बनाती है, अकेले उसका नहीं करती, देश के वर्तमान पर भी झपट्टा मारती है. इसी तरह बच्चों के अकालकवलित होने की कीमत देश के भविष्य को भी चुकानी पड़ती है.
विडंबना यह कि इसके बावजूद गणेशोत्सव के दौरान न तो उसके आयोजकों और न ही संबंधित स्थानीय प्रशासनों ने ऐसा कुछ करने की जरूरत समझी जिससे विसर्जन जुलूसों में भाग लेने वाले युवक व बच्चे सुरक्षित रहें. इन दोनों को अपने इशारों पर नचाने वाले सत्ता प्रतिष्ठान की बात करें तो जब से उसे बहुसंख्यकों के धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल के लाभ कुछ ज्यादा ही रास आने लगे हैं, उसने जानबूझकर उनकी अपने धर्म को सड़क पर लाने और हुड़दंगी भीड़ों के हवाले करने की कवायदों को पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ दिया है.
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दूसरी ओर, इससे उपकृत महसूस कर रहे उनके एक तबके ने यह मानकर स्थिति को अपने विशेषाधिकार में बदल डाला है कि ‘सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का.’
भुक्तभोगी जानते हैं कि यह तबका जब भी चाहता है, किसी ‘उत्सव’ के बहाने जबरिया चंदा वसूलने में या यातायात वगैरह अवरुद्ध करने में लगकर शांतिप्रिय सामान्य नागरिकों को परेशानी में डाल देता है. इसी तरह वह जब भी चाहता है, जोर-जोर से ऐसे भड़काऊ और सौहार्द बिगाड़ू नारे लगाकर या गीत बजाकर, जिनका किसी उत्सव से कोई वास्ता नहीं होता, सामाजिक अमन-चैन में खलल डालने लगता है.
भाजपा की सरकारों में तो अब इस सबका नोटिस लेने का रिवाज भी नहीं बचा है, लेकिन कई बार यह तबका अपने बड़े-बुजुर्गों औैर पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की भी नहीं सुनता. क्योंकि उसे प्रशिक्षित ही इस मान्यता के तहत किया गया है कि उसके लिए उसका यह ‘धरम का काम’ (पढ़िए कर्मकांड) ही सबसे जरूरी व पवित्र है और उसकी रक्षा के लिए उसे न पाप-पुण्य के चक्कर में पड़ना चाहिए, न उसके आड़े आने वाले देश या सभ्य समाज के नियम-कायदों या परंपराओं की परवाह करनी चाहिए.
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अकारण नहीं कि उसे इस गणेशोत्सव के दौरान इतनी मौतें होने को लेकर भी कोई अपराधबोध नहीं सता रहा. यहां तक कि जान गंवाने वाले युवकों व बच्चों के लिए उसके पास दो बूंद आंसू तक नहीं है. फिर कोई यह कहने के लिए ही क्यों आगे आएगा कि जो कुछ हुआ, उसकी जिम्मेदारी में उसका भी कोई छोटा या बड़ा हिस्सा है और उसे लेकर वह दूसरों को तो क्या, अपने आपको भी जवाब नहीं दे पा रहा.
ऐसे में एक यह सवाल भी जवाब की मांग करता ही है कि धर्म जिम्मेदार होना सिखाता है या गैरजिम्मेदार?

दूसरी ओर, जान गंवाने वाले युवकों व बच्चों के माताओं-पिताओं व पत्नियों वगैरह को ऐसी हालत में छोड़ दिया गया है, जहां उनके पास यह मानकर संतोष कर लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं है कि यही भगवान की मर्जी थी.
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निस्संदेह, यह मान्यता उन प्रशासनों के पक्ष में जाती है, जिनकी जानकारी में या जिनकी इजाजत लेकर उक्त जुलूस निकाले गए और जिनकी जिम्मेदारी थी कि वे उनके सकुशल संपन्न होने की व्यवस्था करते और ऐसी व्यवस्था संभव नहीं थी तो उन पर रोक लगाते या कोई भी अघटनीय न घटने देने की हद तक नियंत्रित रखते.
लेकिन क्या पता, उन्होंने अपनी खुद की या जिनका वे खुद पर अंकुश मानते हैं, उनकी मर्जी से ऐसा करने का अपना कर्तव्य नहीं निभाया.
सवाल है कि जब एक ओर ऐसी कर्तव्यहीनता थी और दूसरी ओर गणेशोत्सव से जुड़ी देश के सामान्यजन की उत्सवधर्मिता उक्त तबके के अविवेक व जुनून की शिकार होती, तो ऐसे अघटनीय क्यों नहीं घटते?
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यहां याद किया जा सकता है कि लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र के पुणे में 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा शुरू की, तो उसे राष्ट्रीय या कि लोक जागरण के अभियान का रूप दिया था और भले ही वह सर्वथा अनालोच्य नहीं था, उसे अलग पहचान दिलाने में सफल रहे थे. लेकिन अब यह उत्सव न सिर्फ स्वार्थी राजनीति का हथियार बन गया है, बल्कि सारे सामाजिक सरोकारों से विमुख और सरकारों की बदनीयती से प्रेरित भी हो चला है.
इसकी एक मिसाल पिछले दिनों कर्नाटक सरकार की बेंगलुरु के ईदगाह मैदान में ही गणेशोत्सव की जिद में भी दिखी. कर्नाटक उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय पीठ ने उसे इससे रोक दिया तो वह उसकी दो सदस्यीय पीठ के पास जाकर उससे इजाजत ले आई. वह तो भला हो, सर्वोच्च न्यायालय का कि उसने समय रहते यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दे दिया.
लेकिन हुबली में ईदगाह मैदान की मिल्कियत सरकारी संस्था के पास होने के बहाने उसने वहां गणेशोत्सव करके ही दम लिया. गौरतलब है कि उस वक्त कर्नाटक का बड़ा हिस्सा बाढ़ से जूझ रहा था. फिर भी इस सरकार की पहली प्राथमिकता ईदगाह मैदानों में ऐसे गणेशोत्सव के आयोजन में थी, जिससे वितंडा छोड़ कतई कोई सद्भाव या सौहार्द नहीं पैदा होने वाला था.
कोढ़ में खाज यह कि अब ऐसे उत्सवों में जो भीड़ आती, कहना चाहिए बुलाई जाती है, वह भी धर्मप्राण कम और धर्मभीरु व प्रदूषित राजनीति, कहना चाहिए निहित स्वार्थप्रेरित ज्यादा होती है. आयोजकों का इरादा भी उसे वैसी ही बनी रहने देना होता है- बदलना नहीं.
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इसलिए वे उसे यह तक नहीं समझने देते कि प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी गणेश प्रतिमाएं विसर्जित होकर जलाशयों में जाती हैं तो उनमें जहर घोल देती हैं. या कि प्रतिमाएं विशाल हों, तो उनके विसर्जन के वक्त अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है. अन्यथा विसर्जन करने वालों की जान पर आ बनती है.
इस भीड़ को यह भी नहीं ही बताया जाता कि धार्मिकता न स्वच्छंदता का पर्याय है और न हर नियम कानून या व्यवस्था को नकारने का. एक प्रेक्षक ने ठीक ही लिखा है कि इस भीड़ को संस्कारित किया जाता तो आज धार्मिक उत्सवों के लिए बिजली चोरी धर्म का काम न होती और हमारे पास आतिशबाजी के अपेक्षाकृत कम नुकसानदेह सामान होते. इसी तरह कम जहरीले रंग व अबीर-गुलाल भी. तब बाजार की शक्तियां इन सबको ज्यादा से ज्यादा हानिकारक बनाकर हमारे जीवन और भविष्य से यों खेल न कर पातीं.
लेकिन क्या कीजिएगा, अभी तो यह उम्मीद करना भी संभव नहीं दिखता कि कुछ दिनों बाद जब दुर्गापूजा का उत्सव शुरू होगा, उनके आयोजक इस गणेशोत्सव के हादसों से सबक लेंगे और प्रतिमाओं के निर्माण से लेकर उनके विसर्जन तक की आदर्श आचार संहिता बनाकर उस पर अमल करेंगे, ताकि और किसी चीज का नहीं तो युवकों व बच्चों की जानों को होने वाला नुकसान टाला जा सके.
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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