AtalHind
गुरुग्रामजम्मू और कश्मीरटॉप न्यूज़

लाल गुलाब से भी अधिक सुर्ख है पुलवामा की सड़क 14 को वैलेंटाइन डे नहीं बल्कि शहीदी दिवस ही मनाया जाए

लाल गुलाब से भी अधिक सुर्ख है पुलवामा की सड़क
14 को वैलेंटाइन डे नहीं बल्कि शहीदी दिवस ही मनाया जाए
14 फरवरी के दिन सीआरपीएफ के 44 जवान देश ने खोए
पुलवामा में हुआ आतंकी हमला आज भी बना हुआ है अबूझ पहेली
बेशक पुलवामा आतंकी हमला 4 वर्ष पुराना लेकिन जख्म वर्षों रहेंगे हरे
14 फरवरी को मातृ और पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाया जाए

अटल हिन्द ब्यूरो /फतह सिंह उजाला
हमारी अपनी प्राचीन संस्कृति और संस्कार श्रेष्ठ है या फिर पाश्चात्य कलर बेस्ट है ! अक्सर इस मुद्दे पर बहस भी होती रहती है । पूरब और पश्चिम की संस्कृति सहित संस्कार दोनों ही अलग-अलग है। इस मुद्दे को लेकर जब भी कभी गंभीर चर्चा या बहस होती है तो डंके की चोट पर भारतीय सनातन संस्कृति और संस्कार को ही श्रेष्ठ बताते हुए विश्व जगत के लिए अनुकरणीय बताया जाता आ रहा है। लेकिन जब से संपर्क करने और सूचना के आदान-प्रदान के लिए इंटरनेट जैसी सुविधा उपलब्ध हुई है, उसके बाद से पाश्चात्य संस्कृति और संस्कार का एक प्रकार से अंधानुकरण किया जाना महसूस हो रहा है। laal gulaab se bhee adhik surkh hai pulavaama kee sadak 14 ko vailentain de nahin balki shaheedee divas hee manaaya jae
एक दिन बाद बुधवार को 14 फरवरी है। 14 फरवरी का दिन वैलेंटाइन डे(Valentine’s Day) के तौर पर मनाने के लिए पिछले कई दिनों से एक अलग ही उत्साह और उमंग हर तरफ विशेष रूप से युवा वर्ग और सोशल मीडिया पर देखी जा सकती है । लेकिन यहां डंके की चोट पर कहते हुए ध्यान आकर्षित कर बताया जा रहा है कि (Pulwama road is redder than red roses)”लाल गुलाब से भी अधिक सुर्ख है

पुलवामा की सड़के और शहादत का खून” वैलेंटाइन डे के लिए एक सप्ताह पहले से ही तैयारी आरंभ हो जाती हैं । लेकिन जांबाज सुरक्षा वालों की शहादत को याद करने के लिए किसी तैयारी की जरूरत नहीं। जांबाज सुरक्षा बलों की शहादत के स्मृति दिवस के लिए हर दिन और हर पल तैयारी ही रहती है । यहां याद दिला दिया जाए 14 फरवरी के दिन सीआरपीएफ के सुरक्षा बलों के काफिले पर सबसे अधिक घातक आतंकी हमला किया गया।terrorist attack in Pulwama
इस आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 44 जांबाज जवान शहादत को प्राप्त हुए। क्या यह प्रत्येक भारतीय का पहला कर्तव्य नहीं है कि 14 फरवरी को शहीदी दिवस के तौर पर मनाते हुए वर्तमान युवा पीढ़ी और आने किशोरवय वर्ग को प्रेम का सही भावार्थ बताया जाए । 14 फरवरी के दिन को मातृ पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाते हुए भारतीय सनातन संस्कृति और संस्कार का बीजारोपण आने वाली पीढ़ी में किया जाए। 14 फरवरी के दिन ही अनेक प्रख्यात प्रबुद्ध लोगों का जन्म भी हुआ। इनमें मुख्य से 1952 सुषमा स्वराज / राजनीतिज्ञ / भारत, 1908 केंगल हनुमंथैया / राजनीतिज्ञ / भारत, 1921 दामोदरम संजीवय्या / राजनीतिज्ञ / भारत, 1926 शिव चंद्र मथुर / राजनीतिज्ञ / भारत, 1952 सुषमा स्वराज / राजनीतिज्ञ / भारत, 1975 किकू शारदा / अभिनेता / भारत, 1990 दीक्षित सेठ / अभिनेत्री / भारत के नाम शामिल है ।
14 फरवरी को वैलेंटाइन डे शहीदी दिवस या फिर मातृ पितृ दिवस या फिर किसी अन्य विशेष दिवस के रूप में देखा जाए ? इसी विषय पर चर्चा के दौरान वेद पुराणों के मर्मज्ञ महामंडलेश्वर स्वामी धर्मदेव महाराज ने कहा हम भारतीय हैं और हमारी सभ्यता और संस्कृति अनादि काल से सनातन परंपरा के अनुरूप चली आ रही है। पाश्चात्य संस्कृति और सनातन संस्कृति का कोई कोई मेल नहीं है।
हमारे अपने यह संस्कार भी हैं कि सभी संस्कृतियों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन भारतीय प्राचीन सभ्यता और संस्कृति जो हजारों वर्षों से चली आ रही है और अनंत समय तक चलती ही रहेगी। यही हमारी अपनी पहचान है। सही मायने में प्रेम की व्याख्या को समझना जरूरी है । प्रेम वास्तव में एक भावना है, प्रेम समर्पण है, लेकिन जहां भी कहीं वासना हो, वह प्रेम नहीं हो सकता। युवा वर्ग और युवा पीढ़ी बहुत जल्द भ्रमित होकर रास्ता भी भटक जाते हैं ।
सही मायने में 14 फरवरी को शहीदी दिवस के रूप में मनाते हुए शहीदों को याद किया जाना चाहिए । प्रेम वह कड़ी है जो परिवार समाज और राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य करती है। यही प्रेम हमारे अपने जीवन को सार्थक भी बनता है। 14 फरवरी के दिन हम सभी को अपने आसपास जहां कहीं भी शहीदों की प्रतिमाएं हैं , शहीद स्मारक हैं, वहां पर शहीदों को याद कर नमन करते हुए उनकी याद में दीपक अवश्य जलाना चाहिए। ऐसा किया जाने से युवा वर्ग में राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रभक्ति की अलख हमेशा के लिए जलता ही रहेगी।

Advertisement
पूर्व कांग्रेस एमएलए स्वर्गीय भूपेंद्र चौधरी की पुत्री कांग्रेस नेत्री और सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट पर्ल चौधरी का इस विषय में कहना है कि दुनिया में विभिन्न देशों में अपनी संस्कृति के मुताबिक खास तिथि पर सेलिब्रेशन अपने ही तरीके से किए जाते हैं।
हमारे भारत देश का अपना एक गौरवमय इतिहास रहा है । कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो गौरवमय और दुखदाई इतिहास बन जाती हैं । इसी कड़ी में हमें यह नहीं भूलना चाहिए 14 फरवरी को ही पुलवामा में आतंकी हमला सीआरपीएफ के सुरक्षा बलों पर किया गया। घातक आतंकी हमले के तौर पर सीआरपीएफ या सुरक्षाबल के काफिले पर यह सबसे अधिक घातक हमला ही माना गया है ।
इस हमले में करीब 44 जांबाज सुरक्षा बल देश के काम आए । लेकिन दुख और अफसोस आज भी इस बात का है कि पुलवामा आतंकी हमले जिस में की विस्फोटक से भरे हुए वाहन को सुरक्षा बलों के वाहनों से टकराया गया। इस प्रकार के दुस्साहसिक हमले का सच आज भी सामने नहीं आ सका है । इस मामले में पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी बार-बार आवाज उठाते आ रहे हैं की पुलवामा हमले के पीछे कौन लोग और क्या कारण रहे ?
इसकी जांच अवश्य होनी ही चाहिए । या फिर यह कहा जाए पुलवामा का आतंकी हमला और इस हमले में देश के काम आने वाले जवान जवानों का बलिदान हमेशा रहस्य ही बना रहेगा। हम और हमारे देश की सीमाएं तब ही सुरक्षित हैं , जब बिना किसी स्वार्थ के सभी प्रकार के हालात में सुरक्षा बल सीमाओं पर अपनी छाती तान कर 24 घंटे खड़े रहते हैं।

 

महंत लक्ष्मण गिरि गौ सेवा सदन के संचालक महंत विट्ठल गिरी महाराज का कहना है कि सबसे पहले हमें अपने जन्मदाता माता-पिता या अभिभावक के प्रति समर्पण और प्रेम होना चाहिए। इसके साथ-साथ वर्ष में 1 दिन ऐसा भी होना चाहिए , जब माता-पिता की उनके जीवित रहते हुए एक साथ पूजा की जाए।
प्रकांड विद्वान, ऋषि, मुनियों, साधु, संतों ने भी इस बात को कहा है कि माता-पिता के चरणों में स्वर्ग है । माता-पिता का आशीर्वाद हर प्रकार की विपदा को दूर करता है। जीवन में सबसे पहले गुरु भी माता और पिता ही होते हैं। माता-पिता का कर्ज़ किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता है । दुर्भाग्य की बात है कि युवावस्था आते आते माता-पिता से दूरियां भी बनने लग जाती हैं ।
वास्तव में प्रेम और स्नेह को देखना और समझना है तो बेजुबान जानवरों, पक्षियों से सीखा जाए । हमारी अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की जड़े बेहद गहरी और मजबूत है। फिर पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का अंधा अनुकरण क्यों किया जाए ? 14 फरवरी वैलेंटाइन डे हमारी अपनी भारतीय संस्कृति नहीं है । इस दिन प्रेम और स्नेह लूटाना ही है तो अपने परिजनों, समाज और राष्ट्र सहित माता-पिता की पूजा करते हुए उन पर ही लुटाया जाए। प्रकृति से प्रेम किया जाए । जितना अधिक संभव हो सके पौधारोपण किया जाए पर्यावरण को शुद्ध रखा जाए । यह सब कार्य भी हमारे अपने खुशहाल और सुख में जीवन के लिए बहुत जरूरी है।
Advertisement
Advertisement

Related posts

20 अक्टूबर को अग्रोहा धाम में शरद पूर्णिमा पर विशाल मेला लगेगा- रामकुमार बंसल

atalhind

आखिर  फादर स्टेन स्वामी मर ही गए , एनआईए अदालत को कहता रहा  बीमारी के कोई ‘ठोस सबूत’ नहीं हैं

admin

मोदी राज में कितना बदला भारत , जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और लोकतंत्र की स्थिति

editor

Leave a Comment

URL