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सोच-समझकर वोट दें, ताकि वर्ष 1977 के चुनाव की तरह तानाशाह को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके.

भाजपा का तीसरी बार सत्ता में आना भारत के लिए गंभीर खतरा
सोच-समझकर वोट दें, ताकि वर्ष 1977 के चुनाव की तरह तानाशाह को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके.
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नरेंद्र मोदी दुनिया के उन कुछ नेताओं में से हैं, जिन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए जान-बूझकर इस देश के लोगों को बांट दिया है
आज जब लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में है, तब भी छोटे राजनीतिक कद लेकिन विराट अहंकारी विपक्षी नेता आपसी सहमति और एकजुटता से चुनाव लड़ने को इच्छुक नहीं हैं.
भाजपा का तीसरी बार सत्ता में आना भारत के लिए गंभीर खतरा
मैथ्यू जॉन
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यह चुनाव हमारे लोकतंत्र के लिए निर्णायक घड़ी है. विकल्प बहुत कठिन है- आजादी और निरंकुश शासन के बीच से किसी एक को चुनना है. हमारी स्थिति इससे अधिक निराशाजनक नहीं हो सकती कि चारों तरफ धार्मिक कट्टरपंथी, जबरन वसूली करने वाले, दलाल, रैकेटियर और सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाले हावी हैं, और उन्हें शासन की अराजक जांच एजेंसियों और सहभागी तत्वों का समर्थन प्राप्त है.  ‘अबकी बार 400 पार’ का उनका नारा हमारे देश पर तलवार की तरह लटक रहा है.Today, when the existence of democracy is in crisis, even small political stature but huge egoistic opposition leaders are not willing to contest elections with mutual consent and unity.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) द्वारा लोकसभा की 400 सीटें जीतने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास उनकी सरकार की आक्रामकता का प्रमाण है या अपनी कठोर और वर्चस्ववादी शासन-नीति के आधार पर वह यह दावा कर रहे हैं? एक बड़े दैनिक अखबार के संपादक ने चेतावनी देते हुए कहा कि ‘400 पार’ की जीत के नारे में विपक्ष मुक्त भारत पर स्थायी बहुमत प्राप्त करने का भाव है, जो उस भारत के विचार को ही खतरे में डालता है, जिसकी संकल्पना स्वतंत्र  भारत के हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी. सीधे-सीधे कहें तो उनका  ध्येय देश के संविधान को समाप्त कर वीर सावरकर के आदर्शों के हिंदू राष्ट्र का निर्माण है.Vote wisely and remove the dictator
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‘400 पार’ के नारे के पीछे हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करने वाला एक खेल भी चल रहा है, जिसे क्रिकेट के एक उदाहरण से समझा जा सकता है. टेस्ट क्रिकेट के सर्वकालीन सफल कप्तान स्टीव वॉ, जिनकी जीत/हार का आंकड़ा 4.55 है, अपनी विपक्षी टीम पर दबाव बनाने के लिए एक रणनीति अपनाते थे. इसके तहत विपक्षी टीम को मनोवैज्ञानिक रूप से डराने की कोशिश की जाती थी, उसका उपहास उड़ाया जाता था, उसे विश्वास दिलाने का पूरा प्रयत्न होता था कि वह बुरी तरह हारेगी. परिणामस्वरूप, मैदान पर विपक्षी टीम बिखर जाती थी. ठीक उसी तरह, 400 से अधिक सीटें जीतने की नरेंद्र मोदी की डींग, और तीसरी बार सत्ता में आने पर शुरुआती 100 दिनों की योजना के लिए अपने मंत्रिमंडल और रिजर्व बैंक को तैयार रहने से संबंधित प्रचार दरअसल चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही विपक्ष के आत्मविश्वास को ध्वस्त करने की रणनीति है. सभी सरकारी अधिकारियों को यह एकतरफा संदेश देने की कोशिश तो और भी खतरनाक है कि अगर वे अपनी भलाई चाहते हैं, तो सरकार के निर्देशों का पालन करें, अन्यथा…
भाजपा का तीसरी बार सत्ता में आना इस देश के लिए गंभीर खतरा होगा, लेकिन विपक्ष इस खतरे से निपटने के लिए क्या तैयारी कर रहा है? मुझे याद है कि 2019 के चुनाव से पहले अरुण शौरी ने कहा था कि मोदी की भाजपा को सत्ता में लौटने से रोकने का एकमात्र तरीका यह है कि हर लोकसभा सीट पर भाजपा के खिलाफ विपक्ष का साझा उम्मीदवार हो. लेकिन तब कांग्रेस की कमजोरी तथा आधारहीन आत्मविश्वास के कारण विपक्ष पूरी तरह बिखर गया था, जिससे भाजपा को आसान जीत हासिल हुई थी.BJP coming to power
इस बार जब लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में है, तब भी छोटे राजनीतिक कद लेकिन विराट अहंकार वाले विपक्षी नेता आपसी सहमति और एकजुटता से चुनाव लड़ने को इच्छुक नहीं हैं, जबकि इस अशुभ शक्ति को बाहर करने के लिए एक साथ मिलकर लड़ना आवश्यक है. लेकिन स्थिति यह है कि पश्चिम बंगाल, पंजाब और कश्मीर घाटी में विपक्ष बिखरा हुआ है,BJP coming to power for the third time is a serious threat to India
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जबकि दक्षिण भारत से बाहर ये तीन क्षेत्र ऐसे हैं, जहां विपक्ष अगर साझा उम्मीदवार उतारे, तो करीब 50 सीटें जीत सकता है. लेकिन इन तीनों जगहों में त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय चुनाव हो रहे हैं. ऐसे में भाजपा के लिए सीटें जीतना आसान हो जाएगा. राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर का मानना है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सबसे बड़ी विजेता के रूप में सामने आएगी. इसी तरह महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वीबीए (वंचित बहुजन अघाड़ी) कई सीटों पर जीत में बड़ी भूमिका निभा सकती है, लेकिन वह महाविकास अघाड़ी के साथ नहीं है, जो ‘400 पार’ का नारा लगाने वालों के लिए उत्साह बढ़ाने वाली बात है.
हमारे प्रधानमंत्री दुनिया के उन कुछ नेताओं में से हैं, जिन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए जान-बूझकर इस देश के लोगों को बांट दिया है(Narendra Modi is one of the few leaders in the world who has deliberately divided the people of this country to remain in power.). ज्यादा डरावनी बात यह है कि देश के लोगों में यह धारणा बन गयी है कि वह मुस्लिमों को उनकी असली जगह दिखा रहे हैं. यह उनका विशिष्ट गुण है. चुनाव के समय वह अपनी विभाजनकारी राजनीति का अचूक इस्तेमाल करते हैं, जैसा कि इस चुनाव में कांग्रेस के घोषणापत्र को उन्होंने ‘मुस्लिम लीग से प्रभावित’ बताकर किया है.
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मोदी की तीसरी पारी, जो फिलहाल तय भले लगती हो, अभी वास्तविकता में नहीं बदली है. आधुनिक राष्ट्र की नींव रखने वाले हमारे संस्थापकों ने जिस भारत की संकल्पना की थी, उसे वापस पाने के लिए किसी क्रांतिकारी आंदोलन की जरूरत नहीं है. यह चुनाव एक सत्तावादी से, जो भ्रष्ट तो है ही, विभाजनकारी नीति के जरिये सरकार चला रहा है, छुटकारा पाने के लिए ईश्वर द्वारा प्रदान किया गया आखिरी अवसर है (बहुत लोग इसे आखिरी चुनाव मान रहे हैं).
इंडिया गठबंधन से अलग-अलग लोकसभा सीटों पर आपसी सहयोग और दरियादिली की अपेक्षा थी, लेकिन इसके बजाय वे अपने सहयोगियों के लिए मुश्किलें ही खड़ी कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, वाम (लेफ्ट) दलों को क्या तिरुवनंतपुरम और वायनाड में अपने उम्मीदवार खड़े करने से परहेज नहीं करना चाहिए था? इसकी भरपाई वे कहीं और कर ही सकते थे. इस तरह वे अपने सहयोगियों और समर्थकों समेत बाहरी दुनिया में यह संदेश दे सकते थे कि जीवन और मृत्यु की इस निर्णायक लड़ाई में असली शत्रु कौन है. अपने अहं से चालित इन राजनीतिक दलों को, जो छोटे और तात्कालिक हितों से ऊपर उठने में सक्षम नहीं हैं,
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यह याद दिलाने की जरूरत है कि अगर मोदी तीसरी बार सत्ता में आते हैं, तो सबसे पहले उन्हें कुचलेंगे और कोई आंसू  बहाने वाला नहीं होगा. मोदी के तीसरी बार सत्ता में आने की संभावना पहले से कहीं ज्यादा है, जिससे देश के भविष्य के बारे में अंदाज लगाया जा सकता है. आखिर हमने देखा ही है कि हमारी आजादी को संरक्षित करने वाली संस्थाओं ने पिछले कुछ वर्षों में सत्तावादी शासन के खिलाफ संघर्ष करने के बजाय किस तरह आत्मसमर्पण कर दिया है. अगर ‘तीसरी बार मोदी सरकार’ आई, तो यह स्पष्ट है कि चापलूसों और क्षुद्र लोगों की ताकत बढ़ेगी और हर संस्थान भगवा रंग में रंग जाएगा.
एक समय था, जब हमारे समाज विज्ञानी यह मानते थे कि विधायिका, राजनीतिक कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्थापित सत्ता केंद्रों से बाहर की ताकतों में से सिर्फ चौथे स्तंभ यानी प्रेस और मीडिया में ही समाज में रूपांतरणकारी बदलाव लाने की शक्ति है. महान मानवतावादी और चिंतक हावर्ड ज़िन ने आम नागरिकों को ही ‘अंतिम शक्ति’ और ‘सरकार की गाड़ी को समानता व न्याय की दिशा में ले जाने वाला इंजन’ बताया है, वह मानते थे कि आम जनता ही सीधी और अहिंसक कार्रवाइयों के जरिये अन्यायकारी संस्थाओं और भेदभाव भरी नीतियों को उखाड़ फेंक सकती है.
हावर्ड ज़िन को आजादी के हमारे आंदोलन, मार्टिन लूथर किंग के नागरिक अधिकार आंदोलन और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद-विरोधी आंदोलन की याद तो थी ही, इनके अलावा हुए उल्लेखनीय आंदोलन भी उनके दिमाग में थे. ‘मैं इतना पुराना तो हूं कि एक और आंदोलन को गर्व के साथ याद कर सकता हूं. मैंने 1977 का वह आंदोलन देखा है,
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जब इस देश की जनता ने आजाद भारत के पहले तानाशाह को उखाड़ फेंका था. मगर वह सीधे-सीधे ‘लुंपेन फासीवाद’ या गुंडा राज था, जिसने विरोधियों में डर पैदा करने और उन्हें निहत्था करने के लिए सर्जन के चाकू (नसबंदी), डंडे और दमन का इस्तेमाल किया. संजय गांधी और उनके गुंडों ने आपातकाल को दमनकारी बना दिया था, राहत (यदि आप इसे ऐसा राहत का नाम दे सकें) बस इतनी थी कि उस दौरान दमन के लिए लोगों को जाति या पंथ के आधार पर नहीं चुना गया था. सिर्फ राजनीतिक विरोधियों को कीमत चुकानी पड़ी थी.
तब से बहुत कुछ बदल चुका है. सामाजिक और आर्थिक ढांचे के रणनीतिक पदों पर कब्जा जमाए शक्तिशाली अभिजात वर्ग ने सबक सीख लिए हैं, लिहाजा उन्होंने ताकतवरों और सुविधाभोगी वर्ग के हितों को उन लोगों से बचा कर रखा है, जो बढ़ती सामाजिक और आर्थिक असमानता के खिलाफ विरोध कर रहे हैं. नतीजतन, न्याय के लिए सामान्य नागरिकों द्वारा हाल के वर्षों में लड़ी गई लड़ाई में सफलता की तुलना में विफलता ज्यादा हाथ लगी है.
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कॉरपोरेट दादागिरी और लालच के खिलाफ 2008 के ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन’ ने दुनिया भर को चकित-स्तंभित कर दिया था, इसके बावजूद न तो समाजों में बदलाव आया, न ही बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानता के खिलाफ जनाक्रोश दिखा, जो पाशविक ताकत और कुलीन तंत्र के बने रहने का ही उदाहरण है. अपने यहां वर्ष 2020 में महिलाओं ने सीएए के खिलाफ जिस आंदोलन को बल प्रदान किया था, उसे बहुसंख्यकवादी राष्ट्र की पाशविक ताकत, हिंसक भीड़ और सुनियोजित दंगों के जरिये बेअसर कर दिया गया था.
जन आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब लक्ष्य समान हों और सिविल सोसाइटी के अलग-अलग वर्ग के बीच तालमेल हो. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पिछले एक दशक में सत्तारूढ़  राजनीतिक-धार्मिक पार्टी ने देश को तो रसातल में डाल ही दिया है, इसने आम नागरिकों के बीच भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर सुनियोजित तरीके से समाज को विभाजित भी कर दिया है. सामाजिक एकजुटता को व्यवस्थित ढंग से कमतर करने के कारण हम सरकार के खिलाफ वैसा आंदोलन नहीं देख पा रहे, जैसा 2011-12 में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ था.
समाज का एक वर्ग – यानी मध्यम वर्ग – उस संघर्ष से पूरी तरह कटा हुआ है, जिसके जरिये लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाती है और उनके कल्याण को प्रोत्साहित किया जाता है. यह सिविल सोसाइटी का वह असामाजिक हिस्सा है, जो या तो एक वर्ग के खिलाफ हिंसा में सक्रिय हिस्सेदार है या फिर उस हिंसा का मूकदर्शक है.
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लेकिन सबसे निंदनीय दरअसल समाज के वे डरपोक तत्व हैं, जो वैसे तो खुद को उदारवादी मूल्यों के हिमायती बताते हैं, लेकिन सत्ता की हिंसा पर चुप रहकर वे मान बैठते हैं कि वे हिंसक भीड़ से अलग हैं. ये वे लोग हैं, जो लगातार अन्याय की घटनाओं की अनदेखी करते हैं या कतराकर निकल जाते हैं. यहां तक कि ये लोग अनौपचारिक बातचीत में भी सत्ता के खिलाफ अपनी नाराजगी जताने में डरते हैं.
औपचारिक बैठकों में उनसे सत्ता के खिलाफ टिप्पणी की अपेक्षा करना बेशक ज्यादा है, लेकिन ध्यान रहे कि न्याय के लिए उठी हर आवाज, चाहे वह कितनी भी धीमी क्यों न हो, मायने रखती है. ऐसी भयभीत चुप्पी तानाशाह और उसके लाखों समर्थकों को प्रोत्साहित करती है, जो बखूबी जानते हैं कि ये तटस्थ लोग उनके सबसे बड़े सहयोगी हैं. इन अप्रतिबद्ध लोगों में से कुछ प्रकारांतर से मोदी का समर्थन करते हुए पूछते हैं कि ‘मोदी जी का विकल्प क्या है?’ इस पर मेरा जवाब है: ‘मोदी जी के नेतृत्व में यह देश जिस बदतर हालत में पहुंचा है, क्या पूरी दुनिया में इससे भी बदतर कोई जगह है?’
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यह चुनाव देश की आत्मा को वापस लौटाने की लड़ाई से कम नहीं है. यह उन सबका नैतिक दायित्व है, जिन्हें इस देश की परवाह है और जो सहिष्णुता, समानता व न्याय जैसे जीवन मूल्यों की चिंता करते हैं और अपने स्वार्थ व छोटे-मोटे मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय राजनीति में लोकतंत्र और शालीनता की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. मैं आपको, और खासकर अपने गुजराती भाइयों को याद दिलाना चाहता हूं कि इस देश की जनता के तौर पर हम महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे दो सर्वोत्कृष्ट गुजरातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि उन दो धोखेबाजों का, जो हमारा जीवन बर्बाद करने पर तुले हैं. इसलिए मेरा अनुरोध है कि सोच-समझकर वोट दें, ताकि वर्ष 1977 के चुनाव की तरह तानाशाह को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके.Vote thoughtfully so that the dictator can be shown the way out like in the 1977 elections.
(मैथ्यू जॉन एक सेवानिवृत्त लोक सेवक हैं)
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