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मोदी सरकार को क्यों पिटवाना पड़ा अपना ही मोहरा?

WFI SUSPENSION: मोदी सरकार को क्यों पिटवाना पड़ा अपना ही मोहरा?

BY-विजय विनीत

“मोदी-शाह को पहलवानों की नहीं, फिलहाल लोकसभा चुनाव का फिक्र है। संजय सिंह की कमेटी भंग नहीं की गई है, अलबत्ता उसे सिर्फ़ निलंबित किया है। यह बहुत सख़्त फैसला नहीं है।”

WFI SUSPENSION: मोदी सरकार को क्यों पिटवाना पड़ा अपना ही मोहरा?

भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के निलंबन के साथ बीजेपी के बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह के पर कतरे जाने से पूर्वांचल की सियासत में जबदस्त हलचल है। सत्ता के गलियारों में यह सवाल जोरों से उछाल रहा है कि मोदी-शाह ने अपने उस मोहरे को क्यों पीट दिया, जिसकी हिफाजत वो पिछले एक साल से करते आ रहे थे? इस सवाल का जो जवाब निकलकर आया है वह यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सिर्फ चुनाव से डर लगता है। अपने जाट वोटबैंक को बचाने के लिए उन्होंने अपने उस दबंग सांसद की बलि दे दी जिसने बनारस और गोंडा समेत पूर्वांचल के कई शहरों में इस स्लोगन के साथ बैनर-पोस्टर लगवाया था, “दबदबा है और दबदबा रहेगा।”

बीजेपी सरकार ने भारतीय कुश्ती संघ की नव निर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह की कमेटी को अचानक इसलिए निलंबित किया क्योंकि वह गोंडा के दबंग सांसद बृजभूषण शरण सिंह के करीबी और उनके कारोबारी पार्टनर थे। बृजभूषण की गिनती पूर्वांचल के बाहुबलियों में होती है। जब महिला खिलाड़ियों ने उनके ऊपर यौन शोषण का आरोप लगाया तब भी सरकार उनके साथ खड़ी रही। कुश्ती लड़ने वाली खिलाड़ी सालों से मांग कर रही थी कि यौन शोषण के आरोपित बृजभूषण शरण सिंह पर सरकार सख्त एक्शन ले। महिला खिलाड़ियों ने जब जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया तो सरकार उनपर लाठीचार्ज कराने से भी नहीं चूकी। तमाम आरोपों के बावजूद मोदी सरकार ने बृजभूषण पर कोई एक्शन नहीं लिया। थाना पुलिस में रपट दर्ज होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी नहीं होने दी। बृजभूषण शरण सिंह को संरक्षण देने की दो बड़ी वजह रही हैं— पहली बात, पूर्वांचल की सियासत में उनकी पकड़ काफी मजबूत है। दूसरी, वह ठाकुरों के ऐसे नेता हैं जो मोदी-शाह की गुडबुक में हैं और उनकी सीएम योगी आदित्यनाथ से पटरी नहीं बैठती है।

भारतीय कुश्ती संघ के निलंबन के बावजूद बृजभूषण शरण सिंह खेलों में लगातार अपना सिक्का चलाते रहे। संघ के चुनाव का वक्त आया तो अपने ही बिजनेस पार्टनर को अध्यक्ष बनवा दिया। नतीजा उनके ऊपर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली खिलाड़ी डर गईं। कुश्ती लड़ने वाली लड़कियां इसलिए ज्यादा खौफजदां हो गईं कि जिनसे वो बचना चाहती थीं वही आदमी फिर कैसे आ गया? सिर से पानी गुजरने लगा तो जाट समुदाय से जुड़ी ओलंपिक विजेता साक्षी मलिक ने खेल की दुनिया से सन्यास लेने का ऐलान कर दिया।

बंद करानी पड़ी अपनी ही दुकान!

उत्तर भारत में साक्षी के आंसुओं और बजरंग पुनिया के पदमश्री वापसी ने ऐसा असर डाला कि पश्चिमी उत्तर ही नहीं, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान से लगायत पंजाब तक जाट समुदाय में मोदी-शाह और बीजेपी के प्रति गुस्सा बढ़ने लगा। नाराजगी का सैलाब और जोर पकड़ता, इससे पहले मोदी-शाह की जोड़ी ने अपने ही सांसद बृजभूषण शरण सिंह और उनके पार्टनर संजय सिंह का कद छोटा करने में तनिक भी देर नहीं लगाई। बीजेपी ने कड़ा फैसला लेते हुए अपने ही आदमी की दुकान बंद करा दी।

संजय सिंह उर्फ बबलू की अध्यक्षता वाली भारतीय कुश्ती संघ की कमेटी के निलंबन के बाद चंदौली के झांसी गांव के कुछ लोगों में मायूसी भी है। कुछ रोज पहले जिन लोगों ने झांसी और आसपास के जिन गांवों में मिठाइयां बांटी थी, पटाखे छोड़े थे और उनके स्वागत के लिए तैयारियां शुरू हो गई थी, उनके समर्थक चेहरों की मुस्कुराहट अब गायब है। चंदौली में संजय सिंह के करीबी अमित सिंह, रोहन सिंह और आलोक कहते हैं, “भारतीय कुश्ती संघ का अध्यक्ष बनकर संजय सिंह ने चंदौली जैसे जिले का नाम रोशन किया था। हम काफी खुश थे। हम उनके स्वागत की तैयारियों में जुटे थे, तभी खबर आई कि भारतीय कुश्ती संघ की समूची कमेटी ही निलंबित कर दी गई। एक झटके में समूचे चंदौली का जोश ठंडा पड़ गया।”

चंदौली जिले के झांसी गांव के मूल निवासी संजय सिंह बनारस के दुर्गाकुंड स्थित कबीरनगर इलाके में रहते हैं। खेती-किसानी के अलावा वह कृषि यंत्रों का कारोबार भी करते हैं। वह गेहूं और चावल के थोक कारोबारी भी हैं। साल 2008 में उन्हें वाराणसी कुश्ती संघ का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। पूर्वांचल में पहली बार उन्होंने लड़कियों की कुश्ती शुरू कराई। बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह से इनका रिश्ता तब गाढ़ा हुआ जब साल 2009 में बनारस के कैंट इलाके के एक तारांकित होटल में यूपी कुश्ती संघ का चुनाव हुआ और बृजभूषण शरण सिंह अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसी कमेटी में संजय सिंह को वरिष्ठ उपाध्यक्ष चुना गया। इसके बाद दोनों की जुगल-जोड़ी एक राह पर चलने लगी। तभी से संजय सिंह साए की तरह बृजभूषण शरण सिंह के साथ हैं।

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे संजय!

21 दिसंबर 2023 को भारतीय कुश्ती संघ के चुनाव के बाद माना जा रहा था कि विवाद का पटाक्षेप हो जाएगा। नव निर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह अब कुश्ती संघ का कामकाज देखेंगे, लेकिन ऐन वक्त पर बाजी पलट गई। संजय को इसलिए भी निलंबित किया गया है कि उन्होंने प्रशासनिक निकाय को सूचना दिए बगैर ही बृजभूषण के संसदीय क्षेत्र गोंडा में 28-30 दिसंबर के बीच अंडर-15 और अंडर-20 नेशनल कुश्ती कराने की घोषणा कर दी। खेल मंत्रालय ने भारतीय कुश्ती संघ को अगले आदेश तक अपनी सभी गतिविधियों को निलंबित करने का निर्देश दिया है। बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह का दाहिना हाथ समझे जाने वाले संजय सिंह की अध्यक्षता वाले कुश्ती संघ को मोदी सरकार ने एक झटके में निलंबित कर दिया।

भारतीय कुश्ती संघ निलंबन के बाद नूरा-कुश्ती का नया खेल शुरू हो गया है। वाराणसी में कुश्ती संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजीव सिंह ‘रानू’ संजय सिंह के काफी करीबी माने जाते हैं। ‘न्यूज़क्लिक’ ने उनसे बात की तो वो सरकार और खेल मंत्रालय की नीतियों से आहत नजर आए। बोले, ” जल्द ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। सियासत के ताल-तलैया में कुश्ती डुबोई जा रही है। नव निर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह की कमेटी का निलंबन असंवैधानिक और गैर-कानूनी है। उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है। बच्चों का करियर संवारने के लिए दिसंबर महीने में कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित की गई थी, ताकि उनका साल बर्बाद न हो। हम दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं। हमें बीजेपी वाले भी पसंद नहीं कर रहे हैं और विपक्ष को भी हमारी बातों पर भरोसा नहीं है।”

“बीजेपी सरकार को समझना चाहिए कि बृजभूषण शरण सिंह यूपी की करीब दर्जन भर सीटों पर लोकसभा चुनाव में सीधा असर डालते हैं। संजय सिंह के साथ उनका खड़ा होना गुनाह बन गया। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि बनारस समेत समूचे पूर्वांचल में महिला कुश्ती शुरू कराने श्रेय संजय सिंह को ही जाता है। दो बेटियों का पिता और गंवई आदमी होने के कारण वो लड़कियों की कुश्ती को लेकर बहुत संजीदा रहते हैं। 25 राज्यों की संस्तुति के बाद गोंडा में उन्होंने कुश्ती प्रतियोगिता कराने का निर्णय लिया था। संजय सिंह की कमेटी का निलंबन कुश्ती को बर्बाद करने की बड़ी साजिश है। सरकार के इस कदम से खिलाड़ियों में काफी मायूसी है।”

क्यों बौखला रहे हैं बृजभूषण

खेल मंत्रालय ने संजय सिंह के नेतृत्व वाली कमेटी के निलंबन पर आरोप चार्ज किए हैं। मंत्रालय की एक विज्ञप्ति में कहा गया है, “भारतीय कुश्ती संघ के संविधान की प्रस्तावना के खंड 3 (ई) के अनुसार, सीनियर, जूनियर और सब जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप का निर्णय कार्यकारी समिति करती है। अनुराग ठाकुर के नेतृत्व वाले खेल मंत्रालय ने पाया कि डब्ल्यूएफआई के महासचिव गोंडा के नंदिनी नगर में अंडर-15 और अंडर-20 नेशनल को अंतिम रूप देने वाली कार्यकारी समिति की बैठक में शामिल नहीं थे। खेल संहिता की अवहेलना करते हुए पूर्व पदाधिकारी मनमाने तरीके से कामकाज कर रहे थे, जिन पर महिला खिलाड़ियों का यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। यह मामला कोर्ट में अभी विचाराधीन है। निष्पक्ष खेल, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए शासन मानदंडों का पालन महत्वपूर्ण है।”

भारतीय कुश्ती संघ के निलंबन के बाद खेल मंत्रालय ने भारतीय ओलंपिक संघ को तदर्थ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। पहलवानों से जुड़े सभी मामलों का फैसला अब यही समिति करेगी। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में भारतीय कुश्ती संघ का नए सिरे से चुनाव होगा। भारतीय कुश्ती संघ में हुई उठा-पटक के बाद बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह अब बौखलाए नजर आ रहे हैं। वह कहते हैं, ”मैंने 12 साल तक कुश्ती के लिए काम किया। मैंने अच्छा काम किया या बुरा काम किया, इसका मूल्यांकन वक्त करेगा। मैं एक तरह से कुश्ती से संन्यास ले लिया है। कुश्ती से अपना नाता मैं तोड़ चुका हूं। अब मेरा कुश्ती से कोई लेना-देना नहीं है।”

दूसरी ओर, ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक ने कहा है, “मेरी लड़ाई सरकार से नहीं थी और आगे भी नहीं रहेगी। हमारा विरोध इस बात को लेकर था कि संजय सिंह ने गोंडा में लड़कियों की प्रतियोगिता आयोजित की थी। गोंडा बृजभूषण का इलाक़ा है और उन पर यौन शोषण के आरोप चस्पा हैं। गौर करने की बात यह है कि जूनियर महिला पहलवान किस माहौल में कुश्ती लड़ने वहां जाएंगी? कुश्ती प्रतियोगिता कराने के लिए गोंडा के नंदनी नगर के अलावा देश में क्या कोई दूसरी जगह नहीं थी? बृजभूषण शरण का बिजनेस पार्टनर भारतीय कुश्ती संघ का अध्यक्ष होगा तो वह अच्छा आदमी कैसे हो सकता है?”

“हमारी लड़ाई महिलाओं के लिए थी। फेडरेशन में जो बेटियां थी उनकी इज्जत और मान-मर्यादा महफूज रखने की थी। हम नहीं चाहते कि वही व्यक्ति कुश्ती संघ का परोक्ष रूप से सर्वे-सर्वा बना रहे जिस पर यौन शोषण के मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। कितनी अजीब बात है कि महिला खिलाड़ियों का यौन शोषण करने वाले अभियुक्त को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। हम लगातार यह मांग उठा रहे थे कि बृजभूषण शरण सिंह और उनसे जुड़े लोग संघ में न आएं। महिला को कुश्ती संघ का अध्यक्ष बनाया जाए।”

सियासी ताप नापने के बाद कार्रवाई

दबंग सांसद बृजभूषण शरण सिंह को बीजेपी सरकार ने घोड़े से उतारकर क्यों पटक दिया? इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक अमरेंद्र राय कहते हैं, ” बृजभूषण अहंकार और सत्ता के मद में चूर थे और मोदी को अपनी पार्टी में अहंकारी नेता कतई पसंद नहीं हैं। दूसरी बात, मोदी देश के इकलौते ऐसे नेता हैं जो तभी झुकते हैं जब चुनावी रेस में उनके हारने का डर सताता है। ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक ने विरोध का जो स्वर जगाया उससे मोदी-शाह तिलमिला उठे। उन्हें लगा कि इस मामले ने तूल पकड़ा तो जाट समुदाय उनसे नाराज हो सकता है। बृजभूषण के नाराज होने से बीजेपी को दो-चार सीटों पर मामली नुकसान हो सकता है, जबकि जाट वोटों का ध्रुवीकरण होने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा से लगायत पंजाब तक में उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।”

“भारतीय कुश्ती संघ में जनता वोट नहीं करती। संघ में सभी के अपने-अपने प्यादे होते हैं। पैनल होते हैं और वही वोट करते हैं। जीतता वही है जिसे दबदबे वाली मजबूत लाबी चाहती है। बृजभूषण पर ढेरों आरोप थे, इसलिए उनकी जगह उन्हीं के प्यादे संजय सिंह को चुन लिया गया। एक पहलवान ने तो प्रधानमंत्री आवास के सामने फुटपाथ पर अपना मेडल ही पटक दिया। कई अन्य पहलवानों ने अपनी पद्मश्री लौटाने की घोषणा कर दी। महिला खिलाड़ियों के आंसुओं ने असर दिखाया और जाट समुदाय गुस्से में आ गया। लोकसभा चुनाव के तीन महीने बचे हैं। बीजेपी को लगा कि चारो तरफ जाट नाराज हो गए तो उसे भारी नुकसान हो सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटें उसे खोनी पड़ सकती थी।”

“जाट वोटबैंक की नाराजगी का सैलाब रोकने का एक ही उपाय था-भारतीय कुश्ती संघ में बृजभूषण शरण सिंह के प्रतिरूप संजय सिंह की कमेटी का निलंबन। बीजेपी को बृजभूषण शरण सिंह की जब तक जरूरत थी तब तक उनकी हर बुराई शिरोधार्य थी। उनकी हर बुराई पर पर्दा डाला जाता रहा, जो आम जनता को स्वीकार नहीं था। संजय सिंह के चुनाव जीतने के बाद अहंकार में चूर बृजभूषण शरण सिंह ने अयोध्या में शक्ति का प्रदर्शन किया। पीएम मोदी को वह भी रास नहीं आया। सियासी ताप नापने के बाद मोदी सरकार ने अपने उस बाहुबली सांसद के पर कतरने में तनिक भी संकोच नहीं किया जिसे वह लंबे समय से बचाती आ रही थी।”

वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र यह भी कहते हैं, “खिलाड़ी बेटियों से टकराने के बाद बृजभूषण की साख बहुत गिर गई थी। संजय सिंह पर इसलिए एक्शन लिया गया, क्योंकि वह दबंग सांसद बृजभूषण के सिर्फ मुखौटा थे। चुनावी बेला में वो कैसे सुरक्षित रह सकते थे? वह भी आम लोकसभा चुनाव जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी कोई रिस्क लेने की स्थिति में नहीं हैं। वैसे भी हरियाणा, पंजाब, यूपी, राजस्थान में जाट लाबी पलटवार के मूड में है। लोकसभा चुनाव मोदी के अस्मिता से जुड़ा है। इस स्थिति में वह एक नहीं, बृजभूषण जैसे तमाम बाहुबलियों का वजूद मिटा सकते हैं। बदली हुई परिस्थियों में बृजभूषण शरण सिंह बीजेपी के टिकट हासिल कर लें और वह चुनाव जीत जाएं, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। जाट वोटबैंक के नाराज होने की शर्त पर पीएम नरेंद्र मोदी कोई जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं थे। महिला खिलाड़ियों के आंसू जाटलैंड में असर दिखाने लगा तो वो खासे भयभीत हो गए। आखिर में उन्हें बृजभूषण की बलि लेनी पड़ी।”

डैमेज कंट्रोल की कोशिश

Why did Modi government have to defeat its own pawn? काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव संजय सिंह के निलंबन को दूसरे नजरिये से देखते हैं। वह कहते हैं, “बीजेपी सांसद बृजभूषण के पार्टनर संजय सिंह की समूची कमेटी का निलंबन डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश भर है। उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को लेकर बीजेपी ने जो जाट कार्ड खेला था, महिला खिलाड़ियों ने उसकी हवा निकाल दी। खिलाड़ियों ने पद्मश्री लौटाने का ऐलान किया तो धनखड़ की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। बीजेपी सरकार ने संजय सिंह की कमेटी भंग नहीं की है, अलबत्ता उसे सिर्फ निलंबित किया है। यह बहुत सख्त फैसला नहीं है। जिस बृजभूषण को बचाने के लिए मोदी सरकार महिला खिलाड़ियों पर लाठीचार्ज करा सकती है और उनके टेंट उखड़वा सकती है, जिस किसान आंदोलन को समाप्त कराने के बाद किए गए वादों को लागू कराने से साफ इनकार कर सकती है, वह सिर्फ चुनाव के समय ही झुकती है। जाट वोटबैंक को साधने के बाद वह पहले की तरह तनकर खड़ी होने की हिम्मत रखती है। लोकसभा चुनाव के बाद कमेटी बहाल कर दी जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।”

“संजय सिंह की कमेटी के निलंबन की कार्रवाई नूरा-कुश्ती का खेल जैसा है। हमें लगता है कि मोदी सरकार तो आज भी बृजभूषण के साथ खड़ी है। बृजभूषण पर मुकदमा भी तब दर्ज हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किया। इससे पहले मोदी सरकार लगातार आंख बंद किए हुए थी। पुलिस की चार्जशीट में दोषी ठहराए जाने के बावजूद बीजेपी ने उनकी गिरफ्तारी नहीं होने दी। निलंबन से हलका सरकार का दूसरा स्टैंड क्या हो सकता था? लोकसभा चुनाव नजदीक आ गया तो राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए संजय सिंह की अध्यक्षता वाले कुश्ती संघ को निलंबित किया गया। यूपी विधानसभा चुनाव के समय जिस तरह किसान आंदोलन का पटाक्षेप करने के लिए सरकार ने झूठे समझौते किए, कुछ उसी तरह का खेल इस बार भी होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। बीजेपी अगर सत्ता में आ जाएंगी तो वह भारतीय कुश्ती संघ को बहाल करने में तनिक भी संकोच नहीं करेगी। ऐसे स्थिति में मोदी सरकार का कोई क्या कर लेगा? “

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कहते हैं, “हमें लगता है कि बृजभूषण को समझा दिया गया होगा कि उनके प्रतिरूप संजय सिंह का निलंबन वक्ती तौर पर किया गया है। लोकसभा और हरियाणा चुनाव के बाद फिर से बहाली कर दी जाएगी। फिलहाल बीजेपी सरकार खिलाड़ियों के आंसू पोंछते दिख रही है, लेकिन किसानों की तरह उन्हें उसकी नीति-रीति पर भरोसा नहीं है। मोदी-शाह को पहलवानों की नहीं, फिलहाल लोकसभा चुनाव का फिक्र है। इन्हें यह भी पता है कि यूपी में जाटों का डबल इंजन की सरकार से मोह भंग होता है तो उनके पांव तले जमीन खिसक सकती है। शायद यही वजह है कि शतरंजी बिसात पर शह और मात के खेल में उन्हें अपने ही मोहरे को पिटवाना पड़ा है।”

(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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