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इनेलो अभी जिंदा है,”चौका” मारने से “चूक” गई झाड़ू उम्मीद से काफी “कम” सफलता मिली आम आदमी पार्टी को

इनेलो अभी जिंदा है,”चौका” मारने से “चूक” गई झाड़ू
उम्मीद से काफी “कम” सफलता मिली आम आदमी पार्टी को
कांग्रेस की गैर मौजूदगी का भरपूर “फायदा” उठाने में “नाकाम” रही आप
प्रत्याशियों के “गलत” चयन ने आप पार्टी की चुनावी संभावनाएं “खराब” की


-राजकुमार अग्रवाल –
चंडीगढ़। स्थानीय निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी हरियाणा में वह सफलता हासिल नहीं कर पाई जिसकी “उम्मीद” और “दावे” किए जा रहे थे।
आप पार्टी सिर्फ इस्माइलाबाद में ही जीत का खाता खोल पाई। बाकी जगह पर वह मौके पर चौका मारने में बड़ी “चूक” कर गई।
कांग्रेस की गैरमौजूदगी के कारण आम आदमी पार्टी के पास बीजेपी- जेजेपी गठबंधन का पहला विकल्प बनने का भरपूर चांस मौजूद था लेकिन आम आदमी पार्टी इस मौके का फायदा उठाने में पूरी तरह से नाकाम रही।
उत्तर हरियाणा के अंबाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र और कैथल जिलों में तो आम आदमी पार्टी पूर्व मंऊ निर्मल सिंह व चित्रा सरवारा की कड़ी मेहनत के कारण मुकाबले में रही लेकिन बाकी हरियाणा के शहरों में वह मजबूत दावेदारी नहीं पेश कर पाई। 46 में से सिर्फ 12 जगह पर ही जगह ही आम आदमी पार्टी जीत की दौड़ में शामिल रही।
आम आदमी पार्टी की “हल्की” परफॉर्मेंस के पीछे सबसे बड़ा कारण सही प्रत्याशियों का चयन नहीं कर पाना रहा।
आम आदमी पार्टी चुनाव जीत सकने वाले प्रत्याशियों को नहीं तलाश पाई। अधिकांश जगह पर गलत प्रत्याशियों को टिकट दी गई जिसके चलते पार्टी के अंदर ही माहौल खराब हो गया और इसलिए वोटिंग के दिन भी समालखा के पार्टी प्रत्याशी भरत सिंह छोकर ने आजाद प्रत्याशी का समर्थन करने का ऐलान किया।
अगर आम आदमी पार्टी मेरिट के आधार पर टिकट देने का काम करती तो हिसार, जींद, भिवानी और अहीरवाल में वह ज्यादा बेहतर प्रदर्शन करती।
बात यह है कि आम आदमी पार्टी स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी जेजेपी गठबंधन को बेहद “कड़ी” टक्कर देने के हालात में थी। कांग्रेस के चुनाव मैदान से “दूर” रहने के कारण वह जनता में विकल्प के तौर पर “पहली” पसंद बन सकती थी। लेकिन पार्टी की “खराब” रणनीति और “गलत” प्रत्याशियों ने उसकी संभावनाओं का “बंटाधार” कर दिया।
उत्तर हरियाणा के अलावा आम आदमी पार्टी सिर्फ दो चार जगह ही मजबूत पार्टी के तौर पर चुनाव लड़ती हुई नजर आई।
आम आदमी पार्टी को इस्माईलाबाद के जरिए हरियाणा में पहली बड़ी जीत मिल गई है लेकिन बीजेपी, जेजेपी और कांग्रेस के मुकाबले की पार्टी बनने के लिए उसे अभी काफी लंबा संघर्ष करना पड़ेगा।
अगर आम आदमी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनाव में की गई गलतियों को आगे जारी रखने का काम किया तो वह सत्ता की दावेदारी पेश नहीं कर पाएगी और अगर उसने स्थानीय निकाय चुनाव की गलतियों से सबक लेकर भविष्य की कारगर रणनीति को अमलीजामा पहनाया तो वह दूसरी पार्टियों के बराबरी खड़ा होने का मजबूती से दम भर सकेगी।

इनेलो अभी जिंदा है….
स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों ने इनेलो का बचाया अस्तित्व
ऐलनाबाद में हार से चुनौतियां और मुश्किल हुई

निकाय चुनाव इनेलो के लिए दुखदाई और सुखदाई दोनों ही रहे। पार्टी के एकमात्र विधायक अभय चौटाला के हल्के ऐलनाबाद में पार्टी प्रत्याशी का नहीं जीतना पार्टी के लिए बेहद खराब हालात को फिर से उजागर कर गया है।
डबवाली नगर परिषद में जीत और रानिया व नरवाना में समर्थित प्रत्याशियों की जीत ने इनेलो के लिए थोड़ी राहत पहुंचाने का काम किया है।
बहादुरगढ़ नगर परिषद में इनेलो प्रत्याशी का नंबर दो पर रहना भी यह बताया गया है कि इनेलो अभी जिंदा है।
बात है कि इनेलो उस दौर से गुजर रही है जहां उससे स्थानीय निकाय चुनाव में बड़ी उम्मीद करना बमानी है।
अभय चौटाला की अगुवाई में इनेलो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
स्थानीय निकाय चुनाव में इनेलो के लिए चुनाव परिणाम बेशक सुखदाई नहीं है लेकिन चुनाव के बहाने वह 40 शहरों में अपने इलेक्शन सिंबल को घर-घर तक पहुंचाने का काम कर गई है और यह बता गई है कि वह अभी भी मैदान में जुटी हुई है। ऐलनाबाद में हार ने अभय चौटाला के लिए अपने ही घर में “फंसने” की आशंका को और प्रबल कर दिया है।
एक सीट पर जीत, 2 सीट पर समर्थकों की जीत और एक सीट पर नंबर दो पर रहने से इनेलो का सफर जारी रहने के रास्ता खुल गया है।
इन चुनाव परिणामों से इनेलो के “सुखद” भविष्य की बात तो नहीं की जा सकती लेकिन उसके संघर्ष की संभावनाओं की “गुंजाइश” जरूर देखी जा सकती है।
अब देखना यह है कि अभय चौटाला मुश्किल हालात में किस तरह से पार्टी का “ग्राफ” उठाने का काम अंजाम देते हैं।

जेजेपी के लिए बज गई खतरे की घंटी
उचाना, नरवाना, बरवाला, टोहाना और डबवाली में हार बेहद चिंतनीय
शाहबाद, गुहला चीका और नूंह में जीत ने दी राहत की सांस

स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों ने गठबंधन सरकार के पार्टनर जेजेपी के लिए खतरे की घंटी बजाने का काम किया है।
जेजेपी को छह नगर परिषद में चुनाव लड़ने का अवसर मिला था इनमें से पांच में वह चुनाव हार गई और एक में ही जीत दर्ज कर पाई।
जेसीपी के लिए उचाना, नरवाना बरवाला, टोहाना और डबवाली में हारना बेहद चिंतनीय है।
जींद और हिसार के सबसे मजबूत गढों में हार ने जेजेपी के लिए खतरे की घंटी बजाने का काम किया है। इस खराब चुनाव परिणाम के दो कारण हो सकते हैं-
पहला
वोटरों में जेजेपी को लेकर गहरी नाराजगी हो
दूसरा
प्रत्याशियों का चयन सही तौर पर नहीं किया गया हो।
यह बात तो जगजाहिर है कि किसान आंदोलन और अग्नीपथ योजना के कारण बीजेपी जेजेपी गठबंधन के प्रति वोटरों में नाराजगी फैली हुई है। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में जेजेपी को वोटरों की बड़ी नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है।
टोहाना, नरवाना, उचाना, डबवाली और बरवाला सभी ग्रामीण विचारधारा के ही कस्बे हैं।
इन कस्बों में जेजेपी को बीजेपी का साथ होने के बावजूद चुनाव में समर्थन नहीं मिलना बेहद चिंतनीय है। लेकिन वोटरों की नाराजगी इतनी ज्यादा भी नहीं थी कि जेजेपी इन जगह पर जीत दर्ज नहीं कर पाती।
शाहबाद और गुहला चीका के चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि बाकी जगह पर प्रत्याशियों के चयन में जेजेपी से बड़ी गलती हुई है।
जेजेपी के हार के कारणों की जब इन सभी शहरों में पड़ताल की गई तो यह सामने आया कि टोहाना, नरवाना और बरवाला तीनों ही जगह पर स्थानीय विधायकों की पसंद के प्रत्याशी नहीं उतारे जाने के कारण जेजेपी को जीत से वंचित रहना पड़ा।
शाहबाद और गुहला चीका दोनों ही जगह विधायकों की पसंद के प्रत्याशी उतारे गए और दोनों ही जगह जेजेपी जीत हासिल करने में सफल रही।
नूंह में जेजेपी की जीत से यह आभास हो गया कि देवीलाल परिवार के साथ रहा मुस्लिम वोट बैंक जेजेपी की तरफ वापसी कर रहा है जो दुष्यंत चौटाला के लिए राहत की बात कही जाएगी।
बात यह है कि जेजेपी को स्थानीय निकाय चुनाव में दो कारणों से खराब चुनाव परिणामों का सामना करना पड़ा
पहला प्रत्याशियों के चयन में गलती रहना।
दूसरा
गठबंधन सहयोगी भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं का सहयोग नहीं मिलना।
जेजेपी को इन चुनाव परिणामों से सबक लेते हुए भविष्य की सियासत के लिए कारगर रणनीति बनानी होगी। अगर उसने सही रणनीति को अमलीजामा पहनाया तो वह रिकवरी करने में सफल रहेगी और अगर आकलन में गलती की गई तो आने वाले चुनाव में जेजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

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फीकी जीत का नहीं करना चाहिए भाजपा को गुमान
कांग्रेस के कारण हो गया भाजपा को बड़ा फायदा
कांग्रेस के चुनाव नहीं लड़ने के कारण स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी का पलड़ा रहा भारी

स्थानीय निकाय चुनाव मैं जीत को लेकर इस समय बेशक भाजपा में मिठाइयां बाटी जा रही हैं लेकिन हकीकत यही है कि मिठाई खाने के साथ-साथ भाजपा के नेताओं और रणनीतिकारों को चुनाव परिणामों पर “मंथन” जरूर करना चाहिए
भाजपा के लिए मंथन करना इसलिए बेहद जरूरी है क्योंकि 46 नगर परिषदों और नगर पालिकाओं में से उसे जेजेपी के साथ मिलकर 26 जगह सफलता हासिल हुई है यानी 60 फ़ीसदी भाजपा को सफलता मिली है।
यह सफलता भी भाजपा को तब मिली है जब मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस मैदान में नहीं थी।
भाजपा को 26 में से 18 सीटों पर 3000 से कम वोटों से जीत मिली है। भाजपा और जजपा के विरोधी वोट “बंट” जाने के कारण भी भाजपा-जजपा को इन सीटों पर जीत हासिल हुई। अगर वोटों के प्रतिशत पर ध्यान दिया जाए तो भाजपा को जेजेपी के साथ मिलकर 30 से 35% वोट ही मिले हैं यानी लगभग 65% वोट गठबंधन के खिलाफ पड़े हैं।
खास बात यह है कि मुख्यमंत्री के जिले करनाल में 4 शहरों में से तीन असंध तरावड़ी और निसिंग में भाजपा हार गई व सिर्फ एक घरोंडा पर ही जीत हासिल कर पाई। जब मुख्यमंत्री के खुद ही के जिले में ही भाजपा नहीं जीत पाई तो इससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी प्रदेश में भी भाजपा की जीत के लिए माहौल नहीं था। सिर्फ कांग्रेस के गैरहाजिर रहने के कारण भाजपा को जीत दर्ज करने का गोल्डन चांस मिल गया।
भाजपा को दो चीजों पर गौर जरूर करना चाहिए।
पहली
इस बात की छानबीन की जानी चाहिए कि सही प्रत्याशियों को टिकट क्यों नहीं दी गई। बीजेपी जेजेपी गठबंधन में टिकटों का आवंटन मेरिट के आधार पर नहीं हुआ जिसके चलते 6 सीटों पर इन पार्टियों के बागी प्रत्याशी जीते और खराब टिकट हासिल करने वाले लोग 15 लोग तीसरे से लेकर पांचवें स्थान पर रहे।
दूसरा-
बीजेपी जेजेपी में गठबंधन होने के बाद बावजूद अधिकांश स्थानों पर दोनों ही पार्टियों में तालमेल का काफी अभाव रहा। 80% सीटों पर दोनों ही पार्टियों के नेताओं और वर्करों ने एक दूसरे के साथ तालमेल नहीं किया जिसके कारण जीत का अंतर बेहद कम रहा और इसके अलावा हारी गई सीट अधिकांश सीटों पर तालमेल नहीं होना सबसे बड़ी वजह रही।
बात यह है कि भाजपा को जीत का जश्न मनाने के साथ-साथ चिंतन और मंथन भी करना चाहिए कि गठबंधन को वह सफलता हासिल क्यों नहीं हुई जो होनी चाहिए थी।
आंकड़े बता रहे हैं कि अगर कांग्रेस चुनाव मैदान में होती तो बीजेपी जेजेपी के लिए 10 सीटों पर भी जीत हासिल करना मुमकिन नहीं होता।
कांग्रेस के चुनावी दंगल में नहीं होने के बावजूद बीजेपी-जेजेपी प्रत्याशियों का जीत के लिए संघर्ष करना बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है।
अगर बीजेपी ने हालात का आकलन करने में गलती की तो आने वाले चुनाव में उसको भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

हुड्डा को फ्री हैंड देना पड़ गया कांग्रेस को भारी
कुलदीप बिश्नोई को अनदेखा करने से गैर जाट वोटरों ने कर दिया कांग्रेस को खारिज
कुमारी शैलजा को अध्यक्ष पद से हटाए जाने के कारण दलित वोटरों ने फिर लिया कांग्रेस से मुंह
रोहतक झज्जर और सोनीपत के गढ़ में भी हुड्डा नहीं जितवा पाए समर्थकों को
भूपेंद्र हुड्डा से गैर जाट वोटरों की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा किरण चौधरी और रणदीप सुरजेवाला के समर्थकों को

पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा को हरियाणा कांग्रेस की एक तरफा “फ्रीहैंड” देना कांग्रेस को “महंगा” पड़ता हुआ नजर आ रहा है।
प्रदेश के 18 नगर परिषदों और 28 नगर पालिकाओं के चुनाव परिणाम ने यह बता दिया है कि बीजेपी जेजेपी सरकार के खिलाफ वोटर कांग्रेस पर “भरोसा” नहीं कर रहे हैं।
कुमारी शैलजा को अध्यक्ष पद से हटाए जाने और कुलदीप बिश्नोई को अनदेखा किए जाने के चलते गैर जाट और दलित वोटर कांग्रेस को “रिजेक्ट” करता हुआ नजर आया है।
वैसे तो कांग्रेस ने सीधे तौर पर स्थानीय निकाय चुनाव में हिस्सेदारी नहीं की थी लेकिन अधिकांश स्थानों पर कांग्रेस के नेताओं ने अपने समर्थकों को चुनावी दंगल में उतरा हुआ था। नारायणगढ़ और ऐलनाबाद के अलावा कांग्रेस समर्थकों का पूरे प्रदेश में सफाया हो गया और इसके लिए पूरे तौर पर भूपेंद्र हुड्डा को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। क्योंकि खुद भूपेंद्र हुड्डा के गढ़ रोहतक, झज्जर और सोनीपत में कांग्रेस समर्थकों को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। सबसे खराब बात यह है कि 50% जगह कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे नंबर पर खिसक गए। प्रदेश के 46 स्थानीय निकाय चुनाव में 35 जगह पर कांग्रेस समर्थक प्रत्याशी तीसरे और चौथे नंबर पर रहे।
खास बात यह भी रही कि जिस उदयभान को भूपेंद्र हुड्डा ने प्रदेश अध्यक्ष बनाया उनके शहर होडल में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहा
भूपेंद्र हुड्डा ने कांग्रेस हाईकमान को यह भरोसा दिलाया था कि वह गारंटी के साथ हरियाणा में सरकार बना कर दिखाएंगे लेकिन पहले राज्यसभा चुनाव में हार और अब स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों का सफाया होना यह बताया गया है कि भूपेंद्र हुड्डा की गारंटी “फेल” होने जा रही है और कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी बेहद मुश्किल दिख रही है।
बात यह है कि भूपेंद्र हुड्डा को एकतरफा पावर देकर कांग्रेस हाईकमान ने बेहद बड़ी “गलती” की है।
यह सभी जानते हैं कि भूपेंद्र हुड्डा के कारण कांग्रेस से लगभग दो दर्जन बड़े नेता दूसरी पार्टियों में जा चुके हैं। इसके अलावा कांग्रेस में मौजूद आधा दर्जन बड़े नेताओं को भी भूपेंद्र हुड्डा ने “हाशिए” पर डालने का काम किया है।
खास तौर पर कुमारी शैलजा और कुलदीप बिश्नोई के साथ किया गया भूपेंद्र हुड्डा का खराब व्यवहार कांग्रेस को “भारी” पड़ रहा है। भूपेंद्र हुड्डा के अहंकार के कारण दलित और गैर जाट वोटर कांग्रेस से दूर हो गए हैं। जिसके चलते हरियाणा में कांग्रेस की सत्ता में दावेदारी बेहद “कमजोर” दिख रही है।
स्थानीय निकाय के चुनाव में रोहतक, झज्जर और सोनीपत में ही कांग्रेस समर्थकों की करारी शिकस्त ने बता दिया है कि जब हुड्डा अपने ही गढों में कांग्रेस को नहीं जितवा सकते हैं तो बाकी पूरे प्रदेश में उनके बलबूते पर सरकार बनने की उम्मीद करना “बेमानी” है।

 

छोटी सरकार के दंगल में बीजेपी जेजेपी गठबंधन का पड़ा रहा भारी

हरियाणा की 28 नगर पालिका और 18 नगर परिषद के परिणाम में बीजेपी जेजेपी गठबंधन बाजी मार गया। गठबंधन ने चुनाव निशान पर 46 में से 26 सीटों पर जीत हासिल की और 8 सीटों पर बीजेपी जेजेपी से बगावत करने वाले नेता विजयी रहे । इस तरह गठबंधन को 34 सीटों पर जीत हासिल हुई।
आम आदमी पार्टी ने इस्माइलाबाद नगर पालिका में जीत हासिल करके हरियाणा की सियासत में पहली बड़ी एंट्री मारी।
गर्दिश के दौर से गुजर रही इनेलो ने भी जहां डबवाली में चुनाव निशान पर जीत हासिल की वहीं रानियां और नरवाना में उसके समर्थक प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई।
कांग्रेस समर्थकों का पूरे प्रदेश में सफाया हो गया सिर्फ नारायणगढ़ और ऐलनाबाद में ही कांग्रेस विचारधारा के प्रत्याशीयों को जीत नसीब हुई
जीतने वाले प्रत्याशियों की लिस्ट इस प्रकार है


S 1. नारायणगढ़ रिंकी वालिया आजाद
U 2. रतिया प्रीति खन्ना आजाद
R 3. भुना अर्पणा पसरिचा आजाद


Y 4. फतेहाबाद राजेंद्र सिंह खींची बीजेपी
A 5. बरवाला रमेश बैटरी वाला आजाद
V 6. चरखी दादरी बक्शी राम सैनी बीजेपी


A 7. हांसी प्रवीण ऐलावादी आजाद
N 8. सफीदों अनिता रानी आजाद
S 9. उचाना विकास आजाद
H 10. झज्जर जिले सिंह बीजेपी
I 11. इस्माइलाबाद निशा गर्ग आप पार्टी
K 12. शाहाबाद गुलशन कुमार जेजेपी
A 13. पेहवा आशीष शर्मा बीजेपी
M 14. लाडवा साक्षी खुराना बीजेपी
A 15. घरौंडा हैप्पी लक़्क़ी गुप्ता बीजेपी
H 16. तरावड़ी वीरेंद्र कुमार उर्फ बिल्ला आजाद
A 17. निसिंग रोमी सिंगला आजाद
N 18. असंध सतीश कटारिया आजाद
D 19. चीका रेखा रानी जेजेपी
A 20. राजौंद बबीता बीजेपी


N 21. कैथल सुरभि गर्ग बीजेपी
A 22. महेंद्रगढ़ रमेश सैनी बीजेपी
T 23. नांगल चौधरी प्रिया सैनी बीजेपी


I 24. नारनौल कमलेश आजाद
O 25. फिरोजपुर झिरका मनीष कुमार जैन बीजेपी
N 26. पुन्हाना बलराज बीजेपी
A 27. नूंह संजय कुमार जेजेपी
L 28. कालका कृष्ण लाल लांबा बीजेपी
P 29. समालखा अशोक कुमार बीजेपी
R 30. पलवल यशपाल बीजेपी
E 31. होडल शीशपाल आजाद


S 32. महम भारती बीजेपी
I 33. बावल वीरेंद्र सिंह आजाद


D 34. गन्नौर अरुण बीजेपी


E 35. कुंडली शिमला बीजेपी


N 36. गोहाना रजनी विरमानी बीजेपी
T 37. ऐलनाबाद राम सिंह सोलंकी आजाद
A 38. रानियां मनोज सचदेवा आजाद
I 39. डबवाली मंडी टेकचंद छाबड़ा इनेलो


A 40. साढौरा शालिनी शर्मा बीजेपी
K 41. टोहाना नरेश कुमार आजाद
P 42. नरवाना मुकेश रानी आजाद


C 43. जींद अनुराधा सैनी बीजेपी
N 44. सोहना अंजू बीजेपी
D 45. बहादुरगढ़ *बीजेपी सरोज राठी


L 46. भिवानी निर्दलीय प्रीति *

कहां से कौन जीता
18 नगर परिषद भिवानी में निर्दलीय प्रत्याशी प्रीति भवानी सिंह, चरखी दादरी में भाजपा प्रत्याशी बख्शी सैनी, झज्जर में भाजपा के जिले सिंह, बहादुरगढ में भाजपा उम्मीदवार सरोज राठी, कैथल में भाजपा की सुरभि गर्ग, होडल में बीजेपी-जेजेपी की इंद्रेश कुमारी, गोहाना में भाजपा प्रत्याशी रजनी विरमानी, मंडी डबवाली में इनेलो समर्थित उम्मीदवार टेकचंद छाबड़ा, नारनाैल में निर्दलीय प्रत्याशी कमलेश सैनी, नूंह में जजपा उम्मीदवार संजय मनोचा, कालका में भाजपा उम्मीदवार कृष्ण लाल लांबा, फतेहाबाद में भाजपा के राजेन्द्र सिंह, टोहाना में आजाद उम्मीदवार नरेश कुमार, सोहना में भाजपा की अंजु, हांसी में आजाद उम्मीदवार प्रवीन ऐलवादी, नरवाना में निर्दलीय मुकेश मिर्धा, जींद में भाजपा की अनुराधा सैनी ने जीत दर्ज की। पलवल से भाजपा के यशपाल ने जीत दर्ज की है।

28 नगरपालिका
निसिंग में आजाद उम्मीदवार रोमी सिंगल, असंध में निर्दलीय उम्मीदवार सतीश कटारिया, चीका में जजपा उम्मीदवार रेखा रानी, राजौंद में भाजपा उम्मीदवार बबिता देवी, महेंद्रगढ़ में भाजपा प्रत्याशी रमेश सैनी, नांगल चौधरी में भाजपा समर्थित उम्मीदवार प्रिया सैनी, फिरोजपुर झिरका में भाजपा के मनीष जैन, पुन्हाना में भाजपा समर्थित बलराज सिंगला, इस्माइलाबाद में आम आदमी पार्टी की निशा कानो, शाहबाद में जजपा प्रत्याशी गुलशन कुमार, पिहोवा में भाजपा प्रत्याशी आशीष चक्रपाणि, नारायणगढ़ में निर्दलीय रिंकी वालिया, रतिया में आजाद उम्मीदवार प्रीति खन्ना, भूना में निर्दलीय प्रत्याशी अरपना पसरीजा, बरवाला में निर्दलीय उम्मीदवार रमेश, सफीदों में निर्दलीय अनीता रानी, उचाना में निर्दलीय विकास उर्फ काला, घरौंडा में भाजपा के हैप्पी लक गुप्ता, लाडवा में भाजपा प्रत्याशी साक्षी खुराना, समालखा में बीजेपी उम्मीदवार अशोक कुच्छल, महम में भाजपा समर्थित उम्मीदवार भारती पंवार, बावल में निर्दलीय बिरेंद्र उर्फ बिल्लू, गन्नौर में भाजपा समर्थित अरूण त्यागी, कुंडली में बीजेपी की शिमला देवी, ऐलनाबाद में कांग्रेस समर्थित राम सिंह सोलंकी, रानियां में आजाद प्रत्याशी मनोज बाबा, सढौरा में बीजेपी की शालिनी शर्मा और तरावड़ी में निर्दलीय वीरेंद्र कुमार जीते।

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