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कैथल शहर के मशहूर चित्रकार रहे रामप्रसाद भारती की दास्तान

 कैथल शहर के मशहूर चित्रकार रहे रामप्रसाद भारती की दास्तान
वक्त और हालात ने मुझे जोकर बना दिया यारो

-राजकुमार अग्रवाल –

-कैथल। शहर में अजीब से जोकरों के लिबास में रंग बिरंगी साइकिल पर कई तरह के झंडे लगाए हुए आपको एक शख्स किसी भी चौराहे या सड़क पर मिल सकता है।

जब तक आप उससे बात नहीं करते या उसके नजदीक नहीं जाते तब तक आपको उसकी असली पहचान पता ही नहीं चलती। एक बार अगर बोलना शुरू हो जाए तो आप उसे चुप ही नहीं करा सकते।

अगर उसका मन किया तो वह किसी चौराहे पर झाड़ू लगाने लग जाएगा या शहर में लगे किसी भी बुत की सफाई करना शुरू कर देगा। दोपहर को अगर पेट भर खाना मिल गया है तो वह किसी पेड़ के नीचे आराम करने लगेगा।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह कहीं भी बैठकर अपने दिल का दर्द लोगों को सुनाने लग जाएगा। अक्सर लोग उसकी बातें सुनकर वहां से चल देते हैं।

भारती फिर अपनी धुन में कोई मुकेश का दर्द भरा गीत गुनगुनाने लग जाते हैं। किसी भी सुनने वाले को उसकी जिंदगी की दास्तान सुनने की फुर्सत ही नहीं। बस वह तो उसकी अजीब सी हरकतें देखकर तालियां मारकर बस हंस देते हैं।

यह दास्तान है शहर के मशहूर और चर्चित चित्रकार रहे रामप्रसाद भारती  की। वह शुरू से ऐसा नहीं था कभी उसका भी वक्त था। शहर में पटेल बाजार में भारती पेंटर की दुकान हुआ करती थी और दुकान में चित्रकारों की आवाजाही रहती थी।

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उसका दिल किया तो कभी खुद का पोर्ट्रेट बना लिया या किसी नेता की तस्वीर को बनाकर अपनी दुकान के बाहर लगा दिया। चित्रकारी के फन में माहिर लोगों का वह कदरदान था।

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वक्त ने बदले हालात सड़क पर ला दिया
भारती पेंटर गुनगुनाते हुए कहते हैं कि इस गुलशन में कभी अपना भी मकान था यारो, अब तो सड़क ही अपना आशियां है यारों। वे बताते हैं कि 1966 में 16 साल की उम्र में उन्होंने चित्रकार बनने के के लिए काम करना शुरू किया और उस समय शहर के मशहूर चित्रकार मोहन पेंटर के साथ काम करना शुरू कर दिया।

मोहन पेंटर के पास राजस्थान से गंगा नगर कॉलेज में आर्ट के अध्यापक रासबिहारी बोस आते थे। कैथल में उनकी ससुराल थी। वह अपने जमाने के मशहूर चित्रकार थे। वे पोट्रेट के माहिर चित्रकार थे। जिनकी छाप आज भी कैथल के अधिकतर चित्रकारों पर देखी जा सकती है।

1972 में भारती ने पटेल बाजार में स्वतंत्र रूप से अपना काम करना शुरू कर दिया। जहां में 1996 तक काम करते रहे। इस दौरान उनके पास काम सीखने और काम करने वाले चित्रकारों की एक खेप रहती थी। इसके बाद 1996 में वे डिप्रेशन में चले गए।

जिससे उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई। सब काम छोड़ कर गए डेरा ब्यास में चले गए। डेरा ब्यास में भी वे चित्रकार का ही काम करते थे। लेकिन वहां की मैनेजमेंट के बंधनों से परेशान होकर वे 2012 में कैथल वापस लौट आए। लेकिन 6 साल के इस समय में कैथल में बहुत कुछ बदल चुका था।


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अजीबोगरीब हरकतों के कारण रहते हैं सुर्खियों में
भारती पेंटर के नाम से मशहूर चित्रकार रहे रामप्रसाद भारती अक्सर अपने अजीबोगरीब हरकतों के कारण सुर्खियों में रहते हैं। शहर में किसी का धरना हो या कोई प्रदर्शन हो भारती वहां खुद ब खुद पहुंचकर उसमें शामिल हो जाते हैं। उनके अपने ही तर्क हैं जिनके कारण धरना दे रहे लोगों से उनका तकरार हो जाता है और वह फिर विरोध करना शुरू कर देते हैं।

विरोध करने का भी उनका अपना अलग ही तरीका है। सड़क पर या पेहवा चौक के बीच में खड़े होकर चिल्ला चिल्ला कर बोलना और लोगों को अपने विरोध की वजह बताने का उनका अंदाज है। वह बताते हैं कि 2010 में पत्नी की मृत्यु के बाद इकलौते बेटे ने उन्हें अपने साथ नहीं रखा। हर रोज की तकरार के बाद आखिर उन्हें घर छोड़ना पड़ा।

बेटे ने पुश्तैनी मकान बेच दिया। पत्नी ने पहले ही बेटी की शादी कर दी थी। अब भारती बिल्कुल अकेले थे। शहर के एक मोहल्ले में किराए पर मकान लिया, लेकिन कुछ दिनों बाद मकान की मालकिन महिला ने उनका सम्मान गली में फेंक कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। महीनों उनका सामान सड़क पर पड़ा रहा है।

आजकल वह कई रंगों के साइकल पर तरह-तरह के झंडे लगाकर और अजीबोगरीब पोशाक पहनकर सड़कों पर घूमते नजर आते हैं। उनका दिल करता है तो वह झाड़ू से सड़क साफ करने लगते हैं या सड़क किनारे लगे पेड़ों को पानी देने लगते हैं।

इनको टोकने का मतलब है कि भारती से बहस मोल लेना। उनके पास ऐसे ऐसे तर्क है कि कोई उनका जवाब नहीं दे सकता। कभी जोकर, कभी मजनू, कभी पठान तो कभी दूसरी ड्रेस में उन्हें देखा जा सकता है। उन्हें बस शहर के लोगों में सुर्खियों में रहना है इसके लिए अजीबोगरीब हरकतें करते रहते हैं।

भारती बताते हैं कि वे आजकल कैथल के गुरुद्वारा में खाना खाते हैं और सड़क पर रात बिताते हैं। एक सज्जन ने उन्हें किराए का मकान देने की पेशकश की है। उनसे बातचीत करके जब मैं चलने लगा तो वह मुझ पर भी तंज कसने से नहीं चूके और मेरे भी अतीत को कुरेदने लग गए।

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