रेणु भाटिया का कार्यकाल: सक्रियता, विवाद और निष्पक्षता का ग्राउंड रिपोर्ट विश्लेषण
कैथल /09 जून 2026 /अटल हिन्द /राजकुमार अग्रवाल
हरियाणा राज्य महिला आयोग की पूर्व चेयरपर्सन रेणु भाटिया का कार्यकाल हमेशा से चर्चा और विवादों के केंद्र में रहा है। जून 2026 में कुरुक्षेत्र अस्पताल विवाद के बाद उनके इस्तीफे ने एक बार फिर उनके काम करने के तरीके पर बहस छेड़ दी है। क्या वे वाकई महिलाओं की मसीहा थीं या फिर केवल चुनिंदा मामलों में ही उनकी आक्रामकता दिखाई देती थी? आइए तथ्यों के आधार पर इसका निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं।
कौन हैं रेणु भाटिया और कब संभाली कमान?
रेणु भाटिया मूल रूप से फरीदाबाद की रहने वाली हैं और लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़ी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता रही हैं। महिला आयोग की चेयरपर्सन बनने से पहले वह फरीदाबाद नगर निगम की डिप्टी मेयर भी रह चुकी थीं और महिला आयोग में सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुकी थीं।
हरियाणा सरकार ने 17 जनवरी 2022 को उन्हें तीन वर्ष के लिए महिला आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था, जिसे बाद में आगे बढ़ाया गया। लगभग साढ़े तीन साल से अधिक समय तक इस पद पर रहने के बाद 9 जून 2026 को उन्होंने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
क्या है महिला आयोग का असली काम?
आम जनता में अक्सर यह भ्रम रहता है कि महिला आयोग किसी को जेल भेज सकता है, लेकिन कानूनी रूप से ऐसा नहीं है।
अधिकार क्षेत्र: महिला आयोग स्वयं पुलिस या अदालत नहीं है। यह सीधे सजा नहीं दे सकता।
असली काम: इसका काम पीड़ित महिलाओं की शिकायतों पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेना, पुलिस-प्रशासन से रिपोर्ट मांगना, एफआईआर दर्ज कराने के लिए दबाव बनाना और सरकार को नीतिगत सुझाव देना है।
धरातल पर रेणु भाटिया के बड़े कार्य
अपने कार्यकाल के दौरान रेणु भाटिया ने कई ऐसे बड़े मामलों में दखल दिया, जहां प्रशासन सुस्त था। उनके कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
हरियाणा राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन रेणु भाटिया ने इस्तीफा दे दिया
जींद स्कूल यौन उत्पीड़न मामला: एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा छात्राओं के यौन उत्पीड़न के मामले में आयोग ने कड़ा रुख अपनाया, जिसके बाद आरोपी की गिरफ्तारी संभव हो सकी।
कैथल स्कूल प्रकरण: यहाँ भी आयोग के दखल के बाद ही पुलिस ने तत्परता दिखाई और आरोपी को सलाखों के पीछे भेजा।
एनआईटी (NIT) कुरुक्षेत्र मामला: संस्थान में छात्राओं की सुरक्षा और शिकायतों को लेकर उन्होंने खुद संज्ञान लिया और कॉलेज प्रशासन को जवाबदेह बनाया।
सघन जनसुनवाई: पानीपत, पंचकूला और अन्य जिलों में जाकर उन्होंने घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और साइबर क्राइम से पीड़ित महिलाओं के मामलों का मौके पर निपटारा करवाया।
क्या हर पीड़ित महिला को न्याय मिला?
आपके द्वारा उठाया गया यह सवाल कि “क्या उन्होंने सभी मामलों में कार्रवाई की या रसूखदारों को छोड़ दिया?” बेहद संवेदनशील है। इसका पत्रकारिता के नजरिए से तटस्थ विश्लेषण यह है:
चुनिंदा आक्रामकता का आरोप
समीक्षकों और विपक्ष का आरोप है कि जब मामला आम जनता, छोटे कर्मचारियों (जैसे जूनियर डॉक्टर, नर्स) या आम अपराधियों का होता था, तो रेणु भाटिया का रौद्र रूप देखने को मिलता था। लेकिन जब बात पुलिस कस्टडी में प्रताड़ना, थानों में दुर्व्यवहार या सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं, मंत्रियों और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों पर लगे आरोपों की आती थी, तो आयोग का रुख वैसा कड़ा या आक्रामक नहीं दिखाई दिया। सार्वजनिक रिकॉर्ड में ऐसा कोई ऐतिहासिक उदाहरण नहीं है जहां उन्होंने सरकार के ही किसी रसूखदार मंत्री या बड़े पुलिस अफसर को उसी तरह सार्वजनिक रूप से फटकारा हो, जैसा कुरुक्षेत्र में नर्सों को फटकारा।
नैतिक पुलिसिंग’ का विवाद
उनके कार्यकाल में लाइव-इन रिलेशनशिप और ओयो (OYO) होटलों को लेकर दिए गए बयानों की काफी आलोचना हुई। मानवाधिकार समूहों का कहना था कि वे महिलाओं को न्याय दिलाने के अपने मूल काम से भटककर समाज को ‘नैतिकता का पाठ’ पढ़ाने में ज्यादा रुचि ले रही थीं।
कुरुक्षेत्र प्रकरण: जो इस्तीफे की वजह बना
जून 2026 में कुरुक्षेत्र के एलएनजेपी (LNJP) अस्पताल में एक नाबालिग पीड़िता के साथ हुए डॉक्टर द्वारा दुष्कर्म मामले की जांच करने रेणु भाटिया पहुंची थीं। यहाँ जवाबदेही तय करने के चक्कर में उन्होंने ड्यूटी पर तैनात महिला पीएमओ (PMO) और नर्सिंग स्टाफ को मीडिया के कैमरों के सामने सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित कर दिया।
नर्सिंग स्टाफ का पक्ष: एसोसिएशन का कहना था कि जिस वार्ड में यह घिनौनी वारदात हुई, वहां उन नर्सों की ड्यूटी भी नहीं थी। बिना जांच के उन्हें सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करना उनकी पेशेवर गरिमा पर हमला था। इसी आत्मसम्मान की लड़ाई ने पूरे हरियाणा में ‘पेन डाउन स्ट्राइक’ का रूप ले लिया, जिसके चौतरफा राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के आगे अंततः उन्हें 9 जून को इस्तीफा देना पड़ा।
रेणु भाटिया के कार्यकाल को न तो पूरी तरह ‘नाकाम’ कहा जा सकता है और न ही पूरी तरह ‘आदर्श’। वे हरियाणा महिला आयोग के इतिहास की सबसे सक्रिय, मुखर लेकिन उतनी ही विवादित चेयरपर्सन रहीं। उन्होंने जींद और कैथल जैसे मामलों में बेटियों को न्याय जरूर दिलाया, लेकिन कुरुक्षेत्र जैसी घटनाओं में बिना सोचे-समझे की गई प्रशासनिक बयानबाजी और रसूखदारों के सामने आयोग की कथित लाचारी ने उनके कार्यकाल के अंत को विवादित बना दिया।


