चिता आंदोलन:मोदी की महत्वाकांक्षी योजना पर मोहन सरकार की बेरुखी*
==पवन वर्मा-विनायक फीचर्स===
25 दिसंबर 2024, खजुराहो की ऐतिहासिक धरती, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती का अवसर, मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। देशभर से आए संत-महात्मा, जनप्रतिनिधि और हजारों लोगों के बीच उन्होंने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का भूमिपूजन किया। प्रधानमंत्री ने इसे केवल एक बांध या सिंचाई परियोजना नहीं बताया, बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी के सपनों को साकार करने वाली योजना कहा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह उनकी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है, जो बुंदेलखंड की दशकों पुरानी प्यास बुझाएगी और इस क्षेत्र की तकदीर बदल देगी।
मंच पर विकास के बड़े-बड़े दावे थे। करोड़ों लोगों के बेहतर भविष्य की तस्वीर खींची जा रही थी। इस समय का मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी था। परियोजना के भूमि पूजन कार्यक्रम को कवर करने भोपाल से खजुराहो गया था। अपार जनसमूह के बीच इस परियोजना पर बात करते हुए प्रधानमंत्री के चेहरे पर तेज देखते ही बनता था। शायद उस वक़्त उन्हें उम्मीद होगी कि उनका प्रयास अटल बिहारी वाजपेयी का सपना पूरा करने जा रहा है,
लेकिन महज डेढ़ वर्ष बाद उसी परियोजना की पहचान विकास नहीं, बल्कि “चिता आंदोलन” बनती दिखाई दे रही है। भारी बारिश के बीच पानी में खड़े आदिवासी किसान, आसपास से लकड़ियां बटोरकर प्रतीकात्मक चिता तैयार करते लोग और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते परिवार,ये दृश्य किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होने ही चाहिए। पहली नजर में ही लगता है कि यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि उस भरोसे के टूटने का प्रतीक है, जो इस परियोजना के साथ लोगों के मन में जगाया गया था।
सरकार दावा करती है कि यह परियोजना बुंदेलखंड की तस्वीर बदल देगी। इसमें दो चरण होंगे और इसे पूरा होने में लगभग आठ वर्ष लगेंगे। पहले चरण में पन्ना जिले में केन नदी पर 77 मीटर ऊंचा दौधन बांध बनाया जाएगा। 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए केन नदी का अतिरिक्त पानी बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा।
परियोजना से 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिलेगी। लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध होगा। 103 मेगावाट जल विद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन भी होगा। मध्य प्रदेश के पन्ना, छतरपुर, दमोह, टीकमगढ़, सागर, विदिशा, रायसेन, शिवपुरी और दतिया सहित उत्तर प्रदेश के कई जिलों को इसका लाभ मिलेगा।
इन आंकड़ों को सुनकर यह परियोजना हर दृष्टि से ऐतिहासिक परियोजना लगती है। लेकिन इन चमकदार आंकड़ों के पीछे एक दूसरा सच भी है। इस परियोजना की सबसे बड़ी कीमत वे आदिवासी परिवार चुका रहे हैं, जिनकी जमीन, खेत, जंगल और गांव जलाशय में समा जाएंगे। विकास की इस पूरी कहानी में सबसे कमजोर पक्ष वही लोग बन गए हैं, जिनके जीवन पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने वाला है।
छतरपुर जिले के दौनी सहित प्रभावित गांवों के लोग पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि पुनर्वास को लेकर उन्हें लगातार भ्रम में रखा गया। पहले पांच लाख रुपये की सहायता तय थी। लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने पन्ना जिले के लिए अतिरिक्त 202.50 करोड़ रुपये मंजूर कर पुनर्वास पैकेज बढ़ाकर 12 लाख 50 हजार रुपये कर दिया।
सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है। लेकिन प्रभावित परिवारों का कहना है कि केवल राशि घोषित कर देने से पुनर्वास पूरा नहीं हो जाता। उन्हें रहने योग्य जमीन चाहिए, खेती का विकल्प चाहिए, रोजगार चाहिए, सामाजिक सुरक्षा चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि उनका भविष्य उजड़ने वाला नहीं है। यही वह बिंदु है, जहां मध्य प्रदेश सरकार सबसे कमजोर दिखाई देती है।
केंद्र सरकार की ओर से इस परियोजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। प्रधानमंत्री स्वयं इसका भूमिपूजन करते हैं। करोड़ों रुपये स्वीकृत होते हैं। लेकिन पुनर्वास जैसी सबसे संवेदनशील जिम्मेदारी राज्य सरकार के हिस्से आती है। यदि पुनर्वास ठीक ढंग से होता, प्रभावित लोगों से लगातार संवाद होता और प्रशासन उनकी शिकायतों का समय पर समाधान करता, तो शायद आज पानी के बीच खड़े होकर “चिता आंदोलन” करने की नौबत नहीं आती।
किसी भी बड़ी परियोजना में विरोध होना असामान्य नहीं है। लेकिन यह विरोध जब इस स्तर तक पहुंच जाए कि लोग अपने जीवित रहते अपनी ही चिता का प्रदर्शन करने लगे,ऐसे में इसे केवल एक साधारण नागरिक की पीड़ा की पराकाष्ठा माना जाना चाहिए। यदि कोई प्रशासन सामान्य नागरिकों की पीड़ा को न समझ सके तो फिर यह शासन की संवेदनहीनता पर आरोप-पत्र बन जाता है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास स्वयं खनिज, राजस्व और प्रशासन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विभागों की प्रत्यक्ष निगरानी है। ऐसी परियोजनाओं की समीक्षा नियमित रूप से होती है।
प्रभावित गांवों की स्थिति, आंदोलन की जानकारी और प्रशासनिक रिपोर्टें लगातार मुख्यमंत्री तक पहुंचती होंगी। फिर भी यदि आंदोलन चार दिन से अधिक चलता है, आदिवासी परिवार पानी में उतरकर प्रदर्शन करते हैं और सरकार की ओर से कोई प्रभावी पहल दिखाई नहीं देती, तो इसे केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि राजनीतिक उदासीनता भी मानी जाएगी।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि मुआवजा बढ़ा दिया गया है लेकिन यहां प्रश्न केवल पैसों का नहीं है। आदिवासी समाज के लिए जमीन बैंक बैलेंस नहीं होती। वह उसकी पहचान होती है। जंगल उसकी संस्कृति है। नदी उसका जीवन है। गांव उसका सामाजिक ताना-बाना है। इन सबका मूल्य केवल 12 लाख 50 हजार रुपये से नहीं आंका जा सकता।
यही कारण है कि पुनर्वास केवल नकद भुगतान नहीं होता। सफल पुनर्वास का अर्थ होता है कि विस्थापित परिवार नए स्थान पर पहले से बेहतर जीवन जी सके। यदि उसके बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाएं, खेती समाप्त हो जाए, रोजगार छिन जाए और सामाजिक ताना-बाना टूट जाए, तो मुआवजे की राशि कुछ वर्षों में समाप्त हो जाती है, लेकिन विस्थापन की पीड़ा पीढ़ियों तक चलती है।
इस पूरे मामले का राजनीतिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। केन-बेतवा परियोजना का बड़ा लाभ उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र को भी मिलना है। भाजपा इस परियोजना को विकास की बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखना चाहती है। लेकिन यदि इसी परियोजना की पहचान आदिवासी असंतोष, पुनर्वास विवाद और चिता आंदोलन बन गई, तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला बोला है। उनका आरोप है कि भाजपा सरकार ने आदिवासियों को न्याय नहीं, संघर्ष दिया है। कांग्रेस इसे “जल, जंगल और जमीन” के अधिकार से जोड़ रही है। स्वाभाविक है कि चुनावी राजनीति में ऐसे दृश्य भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकते हैं।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस परियोजना को अपनी महत्वाकांक्षी योजना बताया, क्या मध्य प्रदेश सरकार उसी गंभीरता से उसे लागू भी कर रही है?
यदि केंद्र सरकार की प्राथमिकता और राज्य सरकार के क्रियान्वयन के बीच तालमेल मजबूत होता, तो शायद आज यह स्थिति नहीं बनती। परियोजना का निर्माण कार्य जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण लोगों का विश्वास जीतना है। विकास केवल मशीनों, बांधों और नहरों से नहीं होता। विकास तब होता है, जब परियोजना से प्रभावित व्यक्ति भी यह महसूस करे कि सरकार उसके साथ खड़ी है।
आज जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे ठीक इसका उलटा संदेश देती हैं। सरकार बार-बार कहती है कि यह परियोजना बुंदेलखंड का भविष्य बदल देगी। लेकिन प्रभावित परिवार पूछ रहे हैं कि हमारा वर्तमान कौन संभालेगा? यह प्रश्न सरकार के पास अब तक अनुत्तरित है।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि यदि इस आंदोलन को समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह केवल केन-बेतवा परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश में आने वाले समय में जिन भी बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण होगा, वहां लोग इसी उदाहरण का हवाला देंगे। तब सरकार के लिए विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाना और कठिन हो जाएगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने अभी भी अवसर है। उन्हें केवल प्रशासनिक बैठकों तक सीमित रहने के बजाय प्रभावित गांवों के प्रतिनिधियों से सीधे संवाद करना चाहिए। पुनर्वास पैकेज की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। जिन लोगों को राशि मिली है, उसका विवरण सामने आना चाहिए। जिनकी शिकायतें हैं, उनका समयबद्ध निराकरण होना चाहिए। केवल प्रेस विज्ञप्तियों से विश्वास नहीं बनता, विश्वास जमीन पर दिखाई देने वाले निर्णयों से बनता है।
यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि केन-बेतवा परियोजना प्रधानमंत्री मोदी की सबसे सफल योजनाओं में गिनी जाए, तो उसे यह समझना होगा कि किसी भी परियोजना की सफलता का पहला पैमाना बांध की ऊंचाई नहीं, बल्कि विस्थापित परिवारों की संतुष्टि होती है।
खजुराहो में प्रधानमंत्री मोदी ने जिस दिन इस परियोजना का भूमिपूजन किया था, उस दिन इसे बुंदेलखंड के स्वर्णिम भविष्य की शुरुआत बताया गया था। आज उसी परियोजना के विरोध में पानी के बीच खड़े आदिवासी किसानों की तस्वीरें सरकार से पूछ रही हैं कि क्या विकास का अर्थ केवल निर्माण कार्य पूरा कर लेना है, या फिर उन लोगों का भविष्य सुरक्षित करना भी है, जिनकी कीमत पर यह विकास खड़ा हो रहा है?
यदि मध्य प्रदेश सरकार ने इस सवाल का संवेदनशील उत्तर नहीं दिया, तो इतिहास केन-बेतवा परियोजना को केवल नदी जोड़ने वाली योजना के रूप में नहीं, बल्कि उस परियोजना के रूप में भी याद रखेगा, जहां विकास के दावों के बीच विस्थापितों की पीड़ा की आवाज सबसे अधिक सुनाई दी। *(विनायक फीचर्स)*

