गांव नड़ाना में प्लास्टिक, घरेलू कचरा और सड़ता हुआ मलबा फैला रहा है दुर्गंध
गूगामाड़ी मार्ग पर कूड़े के पहाड़, नरकीय जीवन जीने को मजबूर ग्रामीण
एक समय था जब गांवों की पहचान हरियाली, स्वच्छ वातावरण, खुले आंगन और शुद्ध आबोहवा से होती थी। गांव की गलियों में अपनापन था और खेतों की मिट्टी से जीवन की खुशबू आती थी। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। विकास और स्वच्छता के बड़े-बड़े दावों के बीच ग्रामीण इलाकों की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
तरावड़ी के निकटवर्ती गांव नड़ाना में गूगामाड़ी की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग पर फैली गंदगी इसी बदहाल व्यवस्था की कहानी कह रही है। सड़क किनारे लगे कूड़े के ढेर अब छोटे-मोटे नहीं, बल्कि पहाड़ का रूप ले चुके हैं। प्लास्टिक, घरेलू कचरा और सड़ता हुआ मलबा पूरे क्षेत्र में दुर्गंध फैला रहा है।
यहां से गुजरने वाला हर व्यक्ति नाक पर रूमाल रखने को मजबूर है। सबसे अधिक परेशानी गांव के लोगों को झेलनी पड़ रही है। सुबह-शाम इस रास्ते से गुजरने वाले बुजुर्ग, महिलाएं, स्कूली बच्चे और वाहन चालक बदबू व गंदगी के बीच सफर करने को विवश हैं। आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि गर्मी बढ़ने के साथ दुर्गंध और भी असहनीय हो जाती है।
ऐसे माहौल में संक्रामक बीमारियों का खतरा भी लगातार बना हुआ है। विडंबना यह है कि जिस गांव को स्वच्छ और सुंदर बनाने की जिम्मेदारी पंचायत की होती है, वहीं पंचायत की अनदेखी ने हालात बद से बदतर कर दिए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायतों के बावजूद न तो कूड़ा उठाया गया और न ही स्थायी समाधान की कोई पहल की गई। ऐसा लगता है मानो जिम्मेदारों ने इस समस्या से आंखें मूंद ली हों।
सरकार गांवों को स्वच्छ बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है और स्वच्छ भारत अभियान के तहत लगातार जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। लेकिन नड़ाना की यह तस्वीर इन दावों की जमीनी सच्चाई पर सवाल खड़े करती है। जब मुख्य सड़क ही कूड़े का अड्डा बन जाए तो स्वच्छता अभियान की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
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गांवों की आबोहवा भी हो गई दूषित :- गांव केवल मकानों का समूह नहीं होते, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों की पहचान होते हैं। यदि गांवों की आबोहवा ही दूषित हो जाए और लोग गंदगी के बीच नरकीय जीवन जीने को मजबूर हों, तो यह केवल एक गांव की समस्या नहीं बल्कि ग्रामीण विकास व्यवस्था पर गंभीर चिंता का विषय है।
अब सवाल यह है कि क्या पंचायत और प्रशासन इस बदहाली पर ध्यान देंगे या फिर ग्रामीणों को इसी गंदगी, बदबू और बीमारी के खतरे के बीच जीवन बिताना पड़ेगा? नड़ाना के लोग अब सफाई नहीं, बल्कि जिम्मेदारों की जवाबदेही भी मांग रहे हैं। गांव की पहचान कूड़े के ढेर नहीं, बल्कि स्वच्छ गलियां और स्वस्थ वातावरण होना चाहिए। यही ग्रामीणों की सबसे बड़ी अपेक्षा है।
ग्रामीण इलाकों में दम तोड़ रहे स्वच्छता अभियान : अधिकतर गांवों में लोग गंदगी के ढेरों से नरकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं। तरावड़ी के निकटवर्ती गांव नड़ाना में गूगामाड़ी की तरफ जाते हुए मुख्य सड़क पर गदंगी के ढेर अटे पड़े हैं। जिसके कारण लोगों ओर गांववासियों का जीना दुर्भर है। आने-जाने वाले वाहन चालकों के अलावा अन्य ग्रामीण गंदगी के ढेरों से उठने वाली बदबू से परेशान है।

